कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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बास ॥ बाजै नाद अखण्ड घोर । ताल मृदंगका बहुत सोर ॥ बिन पग निरति तहाँ होय नाच । बिन मुख बोले शब्द सांच ॥ फुले वसत बिन पुष्टुप वेल । सेत भँवर तहाँ करै केल ॥ नाना वरन अरु नाना रंग । बिन सरवर तहाँ उठे तरंग ॥ उनमुनिता जो होय नैन । सो लखि पावे संत सैन ॥ कहै कबीर कोई लहै न अन्त । मुखसागरमें मुखख बसंत ॥
वसंत ११-ऐसो खेलो संतो मन भये बिसारि । जम जालमकी मेटो रागि ॥ टेक ॥ जहाँ पांच मवासी घेरै गैल । मन राजा तहाँ करै खेल ॥ सखी पञ्चीस तहाँ करै सोर । अनहद बाजा बजै घोर ॥ ज्ञान गलीमें बाढै आय । सुरति निरति कोसंग लाय ॥ करि सनेह जो खेले फाग । भवसागरका करहु त्याग ॥ होय अचिंत जो चिन्ता मिटाय । सतगुरु पद मैं रहै समाय ॥ कहै कबीर गुरु किरपा कीन । भय छूटा तब फगवा दीन ॥
वसंत १२-तुम सुनियो संतो जुग वसंत । कोई अगम विवेकी बूझै संत ॥ टेका ॥ बसे नगर तहाँ उठै घोर । पांच सखी तहाँ करै सोर ॥ रंग रंगीली नौऊ नारि । विषम सरोवर रची धमारि ॥ नाना विधि सों करै कलोल । ताल मृदंग अरु बाजै ढोल ॥ चौरासी पिचकारी हाथ । लिये सखी सब फिरै साथ ॥ अहं गुलाल लिये गोद माँहि । सुर नर मुनि कोइ बच्यो नाहि ॥ मन राजाके सबही संग । बाढे भये तहाँ जमुना गंग ॥ उततैं आये ज्ञान बीर । सुरति निरति लिये संग धीर ॥ पिचकारी हित प्रेम लीन । सुमति सखीके हाथ दीन ॥ सेत अबीर उडावै हेल । ऐसा अद्वुत अगम खेल ॥ कहै कबीर कोई लखै साथ । जिन त्रिगुन तापकी तजी उपाधि ॥