भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 668, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 668

(६५४)

कवीरपंथी-

सोग ॥ अखण्ड पूरी एक नगर नाम । जहाँ वसिये साथो सहज धाम ॥ उपजे न बिनसे आवे न जाय । कहैं कवीर तहाँ रहो समय ॥

वसंत ८-सतगुरु खेले रितु वसंत । परम पुरुष जहाँ साधु संत ॥ टेक ॥ तीन लोकते भिन्न राज । जहाँ अनहद बाजा बजे बाज ॥ जहाँ चहुँ दिशि जोति उगे अपार । तहाँ विरलो जन कोह उतरे पार ॥ जहाँ कोटि कृष्ण नवाँँ माथ । कोटि विष्णु खड़े जोड़े हाथ ॥ कोटि महादेव धैर ध्यान । कोटि ब्रह्मा जहाँ पड़े पुरान ॥ जहाँ कोटि सरस्वति करै राग । कोटि इन्द्र फिरे गोहन लाग ॥ कोटि दुरगा जहाँ करै सिंगार । कोटि कुबेर जहाँ भैर भंडार ॥ जहाँ चोवा चंदन अरु अबीर । पुहुप बासरस गहर गंभीर ॥ सुरति सुरंग सुवास लीन्ह । सत्यलोकमें वास कीन्ह ॥ अजर द्रौपमें पहुँचे जाय । अजर पुरुषको दरस पाय ॥ कहैं कवीर लीजो विचार । नरक उधारन नाम हमार ॥

वसंत ९-या सुन्दर तनमें मनुआ भुलान । जाते जम धरि करै हान ॥ टेक ॥ कुबुद्धि सखी सो ताको नेह । भरि पिचकारी कुमति देह ॥ निसि दिन भ्रमको खेले खेल । आसा तृष्णा संग मेल ॥ दम्भ कपट डफ बाजे ताल । कंठ विषयकी डारि माल ॥ नाचत गति लिये और और । करै निरति गति लहै न ठौर ॥ आप आपको जानै नाहिं । परचो भरम गति भीर माँहिं ॥ सतगुरुको जो संग होय । लहै अमरपद अमर घर सोय ॥ छाडो खेल विकार मूल । भरम माँहिं कयूँ रहे भूल ॥ कहै कवीर विचारि देख । सत शब्द गहि कर विवेक ॥

वसंत १०-जहाँ नित वसंत अमृत निधान । सतपुरुष जहाँ सत् ध्यान ॥ टेक ॥ अगम अगाध लीला अपार । सुर नर मुनि सब रहे हार ॥ पुहुप अखंडित सेत भास । सत् पुरुष तहाँ कीयो