भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६५३)

वसंत ५-को का को पुरुष को काकी नारि । ये सब संगी दिवस चारि ॥ टेक ॥ को काको पिता कोउ काको पूत । जन्म जन्मके उरइयो सूत ॥ जो सुरझावै सोई सुजान । मेरि मेरि करता तजै प्रान ॥ को काकी माय को काकी धीय । समझि देखि नर अपने जीय ॥ अंत काल जब पहुँचे आय । बाँह पकड़ि जम लिये जाय ॥ को काको कुटुम्ब को काकी जाति । अंतकाल कोई संग न साथि ॥ यामैं नहीं अपनो है कोइ । सत शब्द सुनि लेहो लोइ ॥ हैर उगौरी बड़ धोखा कीन । झूठी माया संग लीन ॥ या बाजीको लखै जु कोय । कहैं कवीर जन भेदी होय ॥

वसंत ६-वन माली जाने बनकी आदि । राम भजन बिना जनम वादि ॥ टेक ॥ एक फूल जो फुल्यो रितु वसंत । जामैं मोहि रहे सब जीव जन्तु ॥ फूलनमें ज्यों वसत वास । ऐसे घट घट गोविंद निवास ॥ उड उड रे भौरा जायओ देस । मेरे हरि प्रीतम सोक हो संदेस ॥ चोली पुरानी जीवन भार । मोहि विरह सतावे बार बार ॥ ऊंचा पर्वत विषम घाट । अगम पंथ न सूझे वाट ॥ पर बेली रातयो मेरा कंत । मैं का संग खेलौं रितु वसंत ॥ रितु वसंतकी परी झूल । अंब मोरे कचनार फूल ॥ कहैं कवीर मन भयो आनंद । मोहि हरषि मिलै गुरु रामानंद ॥

वसंत ७-कोइ हैरे हमारा गांवका । जासु परचै बूझूं हाँवका ॥ टेक ॥ विन बादल बरषै अखंड धार । बिन बीज चमकै अति अपार ॥ शशि भानु बिना होय प्रकास । सतगुरुके शब्द लियो निवास ॥ वृच्छ एक जहां अति अनूप । जाके साखा पंचम छाँह धूप ॥ बिन फूलन भौरा करै गुंजार । फल लाग्यो जाके निराधार ॥ ऊंच नीच नहीं जाति पांति । जहां त्रिगुन न व्यापे सदा सांति ॥ हरष शोक नहीं राग दोष । सदा आनंद संसे न