भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(६४६)

कबीरपंथी—

सात धातु ।

स्थूल देहमें धातु है, सात कहत परमान । षट विकार पुनि याहिमें, बरनत ज्ञान निधान ॥ ६२ ॥ खाद्य अन्न परिणाम जो, सात रूप धर सोय । सप्त धातु तेहि कहत हैं, मूल देहको होय ॥ ६३ ॥ रस रक्त अरु मांस है, भेद अस्थि पुनि सोय । मजा षट बखानिये, सप्तम शुक्र सु होय ॥ ६४ ॥

चार खानि ।

चारि खानि जग विदित है, स्थूल जगत विस्तार । अचल उषमज अंडज कही, पुनि पिंडज संचार ॥ ६५ ॥

षट विचार ।

अस्ति जन्म औ वृद्धि पुनि, विपरिणाम क्षय नास । षट विकार ये देहके, स्थूल जगत परकास ॥ ६६ ॥

लिंग ।

नारि पुरुष औ नपुंसक, तीन लिंग प्रधान । स्थूल कला सो जानिये, प्रगट करे पहिचान ॥ ६७ ॥

शरीरका लक्षण ।

गोरा श्याम गोड्डुमना, काला जानु सुजान । पीत लाल रंग देहका, प्रत्यक्ष देखु प्रमान ॥ ६८ ॥

शरीरका रङ्ग ।

बौन नाट मंझोल पुनि, लम्बा चार प्रमान । गढन स्थूल विचारिये, रूप कुरुष निधान ॥ ६९ ॥

शरीरका वर्ण ।

अंधा काना पाँगुला, बहिरा गुंग बखान । लूला लंगडा कूबडा, स्थूल विशेषण जान ॥ ७० ॥

चार वर्ण ।

ब्राह्मण क्षत्री वैश्य युत, शूद्र वर्ण जो चार । स्थूल देहके कारणे, भये जगत विस्तार ॥ ७१ ॥