भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६४७)

चार वाक्य ।

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ पुनि, वानप्रस्थ संन्यास । आश्रम चार बखानिये, देह स्थूल विलास ॥ ७२ ॥

स्थूल देहका प्रमाण ।

स्थूल देह परमान है, हाथ सु साढे तीन । लोक सो मृत्यु लोक है, एता वरण प्रवीन ॥ ७३ ॥

स्थूल देहको सम्बन्ध ।

जागृतमे यहि जीवको, नेत्र अहै अस्थान । गुण सु रजो गुण जानिये, सकती किया मान ॥ ७४ ॥

शिव्य प्रश्न ।

जागृतको अब भेद प्रभु, मोको देहु बताय । केहि विधि जड स्थूल सो जागृत कहु समझाय ॥ ७५ ॥

गुव उत्तर सूक्ष्म इन्द्रियोंको उत्पत्ति ।

पहिले सुनु शिष भेद अब, अपंचीकृत पसार । जाके परगट होतही, भयो जगत विस्तार ॥ ७६ ॥ अपंचीकृत भूतके, रजगुण अंश प्रपंच । पांच करम इन्द्री भये, भये प्राण सो पंच ॥ ७७ ॥ गुदा लिंग पग हाथ मुख, बिलग बिलग भय आप । कर्म इन्द्री तासों कहै, जपे कर्मको जाप ॥ ७८ ॥

पांच प्राणके नाम ।

प्राण अपान समान है, व्यान उदान प्रमान । पांच प्राण यहि कहत हैं, वायु प्रधान बखान ॥ ७९ ॥

पंच उपप्राणके नाम ।

नाग कूर्म किरकल कहे, देवदत्त पुनि जान । पंचवे धनञ्जय जानिये, उपप्राण तेहि मान ॥ ८० ॥

पांच अन्तःकरणके नाम ।

अपंचीकृत भूतके, सतगुन अंश मिलाप । अन्तःकरण परगट भये, अन्तर इन्द्री आप ॥ ८१ ॥ मन बुद्धि चित्त हंकाररू, अन्तः करण सुजान । यही पांच सो जानिये, अन्तर ज्ञान परमान ॥ ८२ ॥