कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
पांच ज्ञानेन्द्रियोंके नाम ।
श्रोत्र त्वचा चक्षु कही, जिह्वा जान प्राण । पाँचों इन्द्री ज्ञानकी, साधन ज्ञान समान ॥ ८३ ॥
त्रिपुटी व्याख्या ।
अब इन्द्रिनके विषय अरु, देवहुँ कहौँ बखान । सुनियो शिष्य सु ध्यान दे, प्रत्यक्ष बचन प्रमान ॥ ८४ ॥ इन्द्रीसो अध्यात्म है, विषय जानु अधिभूत । अभिमानी अधिदेव है, सो त्रिपुटी समझत ॥ ८५ ॥ पाँच कर्म पंच ज्ञान रु अन्तःकरणहु जो पाँच । इन्द्री पन्द्रह जानिये, कहौँ त्रिपुटी सु बाच ॥ ८६ ॥
पांच कर्म इन्द्रियोंकी त्रिपुटी ।
गुदा विषय मल त्याग है, देव अहे यमराज । उपस्थ विषय सो भोग है, परजापति महाराज ॥ ८७ ॥ गमन विषय है पाँवका, वामन देव कहाय । पाणि विषय आदान है, देव इन्द्र बलराय ॥ ८८ ॥ बाक विषय है बोलना, अग्नि देव अधिकार । त्रिपुटी इन्द्री कर्मकी, मनमें राखु विचार ॥ ८९ ॥
पांच ज्ञानेन्द्रियोंकी त्रिपुटी ।
देव अश्विनी कुमार है, इन्द्री प्राण प्रमान । विषय गहत् है गंधको, इन्द्री ज्ञान समान ॥ ९० ॥ जिह्वा इन्द्री ज्ञान है, देव वरुण पहिचान । ग्रहण करै रसको विषय, अद्भुत कला निधान ॥ ९१ ॥ चक्षु देखे रूपको, देव सूर्य भगवान । इन्द्री त्वचा विषय स्पर्श, वायु देव पिछान ॥ ९२ ॥ शब्दहि गहे सो श्रोत्र है, देव अहे दिकपाल । त्रिपुटी इन्द्री ज्ञानकी, महा कठिन भ्रमजाल ॥ ९३ ॥
पांच अन्तःकरणकी त्रिपुटी ।
० अन्तःकरण अध्यात्म है, स्फुरण सो अधिभूत । महा विष्णु अधिदेव है, व्यापक विश्व विभूत ॥ ९४ ॥ मन जहाँ अध्यात्म है, अहे चन्द्र तहाँ देव । कल्प विकल्प अधिभूत है, जगका कारण भेव ॥ ९५ ॥ बुद्धि स्वतः अध्यात्म है, है निश्चय अधिभूत । ब्रह्मा तहाँ अधिदेव है, अनुभव लागू सूत ॥ ९६ ॥ चित अध्यात्म