कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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चित्तन करे, सो अधिभूत विचार । वासुदेव अधिदेव है, सबका मूल अधार ॥१७॥ अहंकार अध्यात्म जो, अधिभूत अभिमान । रुद्र कहो अधि देवता, सकल सृष्टि मंडान ॥ १८ ॥
त्रिपुटीकी स्पष्ट व्याख्या ।
करणसो अध्यात्म अहे, विषय अहे अविभूत । देव सोई अधिदेव है, त्रिपुटी कहै अवभूत ॥ १९ ॥
जागृत अवस्था स्वरूप ।
अपंचीकृत भूतकी, एती भई संतान । जागृत अवस्था अब कहूँ, सुनूँ शिष्य दे कान ॥ १०० ॥ इन्द्री कर्म अरु ज्ञान पुनि, मन बुधि चित्त हंकार । इनहीकी तिरपुटीसो, व्यालिस तत्त्व विचार ॥ १०१ ॥ पांच पचीसों संग मिलि, व्यालिस तत्त्व समुदाय । विश्वात्म जब कारज करे, जागृत सोई कहाय ॥ १०२ ॥
चार प्रकारकी वाणी ।
परा पश्यन्ति मध्यमा, सहित बैखरी चार । वाणी सोई पिछानिये, मूल जगत व्यवहार ॥ १०३ ॥
बैखरी स्वरूप ।
बैखरी कहिये बोल जो, मुखसे निकसे आय । स्थूल जगतमें प्रगट है, सबही देत लखाय ॥ १०४ ॥
सूक्ष्म देह वर्णन ।
सूक्ष्म देह अब कहत हौं, सुनु शिष्य दे कान । भिन्न भिन्न बरनत तेही, सज्जन बुद्धि निधान ॥ १०५ ॥
सूक्ष्म देहके तत्त्व ।
सूक्ष्म देहको कहत हैं, पन्द्रह तत्त्व प्रधान । कोइ कहत उन्नीस हैं, कोइ पचीस विधान ॥ १०६ ॥ कोइ कहत चालीस हैं, कोइ कहत हैं साठ । सत्तर कोई कहैं, कोई एक सौ आठ ॥ १०७ ॥ छियानवे कोई कहैं, नवहिं बतावे कोय । एक बातकी बात है, बहु विधि वरनत सोय ॥ १०८ ॥
पन्द्रह तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।
पांचो इन्द्री कर्म अरु, पांच ज्ञान समुदाय । प्राण पांच पुनि