भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

लीजिये, मन बुधि संग सहाय ॥ १०९ ॥ ऐसे सत्रह तत्त्वकी, सूक्ष्म देह परमान । औरो यहि विधि जानिये, सब जो करत बखान ॥ ११० ॥

उत्तीस तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।

उपर्युक्त सत्रह तत्त्वमें, अहं अरु चित्त मिलाय । उनइस इमि सो भाषते, औरो सुनो बनाय ॥ १११ ॥

पचीस तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।

इन्द्री ज्ञान अरु कर्म जो, विषय प्राण समुदाय । अन्तःकरण सो पाँच मिलि, कहत पचीस सुनिराय ॥ ११२ ॥

साठ तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।

पन्द्रह इन्द्री विषय सहित, पन्द्रह देव मिलाय । पाँच विकार दश प्राण युत, भये साठ समुदाय ॥ ११३ ॥ कारन कारज भेदते, भयो अनेक समुदाय । एक बातकी बातको, बहु विधि मानत आय ॥ ११४ ॥ हेतु सबनको एक है, होय बोध परकास । स्वप्नावस्था जानिके, छुटे अविद्या भास ॥ ११५ ॥

कारण शरीर ।

कारण शरीर अज्ञान है, सुषुप्ति अवस्था जाहि । सृष्टि मूल बखानिये, शून्य रूप जहँ आहि ॥ ११६ ॥ तत्त्व दर्शन वर्णन किये, सूक्ष्म रूप बखान । सविस्तार सो देखिये, टीका माहि निदान ॥ ११७ ॥ अध्यात्म दर्शन नाम है, पंची करन विरुध्यात । बूझे विचारे जो उसे, छुटे अविद्या घात ॥ ११८ ॥ चराचर अनुचर जानिये, युगलानन्द अविद्यान । हेतु सुमुक्षु सो लिखे, दया धर्म परधान ॥ ११९ ॥ जो चाहत जानन अधिक, पंची करन परेखु । आतम दर्शन नाम जिहिँ, लेहु सुमुक्षु सरेखु ॥ १२० ॥ कवीर आश्रम विदित है, पोस्ट खरसिया जाहि । जिला अहै विलास पुर, मध्य प्रदेशके माहि ॥ १२१ ॥

इति श्री अध्यात्मदर्शनका प्रथमखंडतत्त्वदर्शन नामक ग्रन्थ कबीराश्रमाचार्य्य स्वामी श्रीयुगलानंद बिहारी विरचित समाप्त शुभम् ।

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