भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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सत्यनाम

शब्दावली-पांचवाँ खंड ।

वसंत प्रारम्भः ।

वसंत १-ऐसो वसंत नहिं बार बार । खेलि लेहु दिन चार चार ॥टेक॥ करि साथ संगति गडवा मंझारि । मन मोरि राखि जायै संभारि ॥ प्रीति वसन सो ढोंकि लेह । लै सुमति सखीकै हाथ देह ॥ सुन्न महले मैं रचो खेल । चित चोवा परमारथ फुलेल ॥ अभै अरगजा लेहु हाथ । तुम या विधि चरचा प्रान नाथ ॥ सुकृत नीरमै नहाय लेह । भरम भार टरै सुध होय देह ॥ कहैं कवीर ऐसे खेले संत । तब कुसल होयगी आदि अंत ॥

वसंत २-तुम देखो सन्तो थिर वसंत । सतगुरु संगति सुख अनंत ॥ टेक ॥ थिर वसंत नहिं जाने भेद । पार न पावे सुमृति वेद ॥ आदि विष्णु ब्रह्मा महेस । पार न पावे पुरान सेस ॥ थिर वसंत नहिं जाने सार । उपजै विनसै बारम्बार ॥ थिर नाहिं जहाँ झरै है पात । पवन सरूपी जम करै घात ॥ निरगुन सरगुन दोय उपाय । षट दर्शन सब येही लौ लाय ॥ भँवर जाल फिरि फिरि भुलाय । जंजाल रंग सब मिटि न जाय ॥ जहाँ निसि वासर नहिं चंद सूर । नहीं तीन लोक वैकुंठ सूर ॥ नहीं जहाँ सून्य नहीं जहाँ कार । नहीं जहाँ निरंजन निराकार ॥ थिर वसंत जहाँ थिर शरीर । थिर तरवर जहाँ पात थीर ॥ थिर वसंत जो जाने भेद । ताकी भवजल नहीं है खेद ॥ थिर वसंत जो जाने रहै ।

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