कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
सत्यनाम
शब्दावली-पांचवाँ खंड ।
वसंत प्रारम्भः ।
वसंत १-ऐसो वसंत नहिं बार बार । खेलि लेहु दिन चार चार ॥टेक॥ करि साथ संगति गडवा मंझारि । मन मोरि राखि जायै संभारि ॥ प्रीति वसन सो ढोंकि लेह । लै सुमति सखीकै हाथ देह ॥ सुन्न महले मैं रचो खेल । चित चोवा परमारथ फुलेल ॥ अभै अरगजा लेहु हाथ । तुम या विधि चरचा प्रान नाथ ॥ सुकृत नीरमै नहाय लेह । भरम भार टरै सुध होय देह ॥ कहैं कवीर ऐसे खेले संत । तब कुसल होयगी आदि अंत ॥
वसंत २-तुम देखो सन्तो थिर वसंत । सतगुरु संगति सुख अनंत ॥ टेक ॥ थिर वसंत नहिं जाने भेद । पार न पावे सुमृति वेद ॥ आदि विष्णु ब्रह्मा महेस । पार न पावे पुरान सेस ॥ थिर वसंत नहिं जाने सार । उपजै विनसै बारम्बार ॥ थिर नाहिं जहाँ झरै है पात । पवन सरूपी जम करै घात ॥ निरगुन सरगुन दोय उपाय । षट दर्शन सब येही लौ लाय ॥ भँवर जाल फिरि फिरि भुलाय । जंजाल रंग सब मिटि न जाय ॥ जहाँ निसि वासर नहिं चंद सूर । नहीं तीन लोक वैकुंठ सूर ॥ नहीं जहाँ सून्य नहीं जहाँ कार । नहीं जहाँ निरंजन निराकार ॥ थिर वसंत जहाँ थिर शरीर । थिर तरवर जहाँ पात थीर ॥ थिर वसंत जो जाने भेद । ताकी भवजल नहीं है खेद ॥ थिर वसंत जो जाने रहै ।
(६५२)
कवीरपंथी—
अमर होय पद अमर लहै ॥ कहै कवीर थिर कहो बुझाय । थिर समाय अमृत फल पाय ॥
वसंत ३—अनभै बसंत खेलो सुजान । भरम भाव नहि होय हानि ॥ टेक ॥ प्रथम वसंत मेल्यो शरीर । गुरु संजम मन धरो धीर ॥ पिचकारी करि हेत लीन्ह । काम कोधको टारि दीन्ह ॥ दूजे मेरो मन महामंत । ताको काहु न लह्यो अन्त ॥ कुबुधि गुलाल उड़ावै सोय । सुर नर सुनि सब गये विगोय ॥ नाद विंद तहां लागे बंद । यह वसंत थिर होय कंद ॥ थिर होय विंद प्रकासे चंद । परम ज्योति परगट अनन्द ॥ कहै कवीर यह परम खेल । सत्सुकृत सो भय मेल ॥ काल जाल सब दीन्ह मेट । तब पार ब्रह्मसो भई भेट ॥
वसंत ४—जहां सुरति सुहागनि खेले फाग । पार ब्रह्म तहां करै राग ॥ टेक ॥ अनहद सुरली बाजे तूर । विन रसना सुर ऊठत पूर ॥ ध्वनि सुनि सीतल भयो गात । सरवन रुचत नहीं और बात ॥ लौकर भूषन पहै अंग । सीलको सिंदुर दियो है मंग ॥ लखि दर्पन सतगुरुके बैन । ज्ञानको अंजन दियो है नैन ॥ लोक लाज सब डारि दीन्ह । प्रेम छाड़ी गह हाथि लीन्ह ॥ सुमति सखीको कियो संग । रच्यो खेल जहां विविध रंग ॥ घेरि घारि जब होरी कीन्ह । ब्रह्म अग्नि जहां लेस दीन्ह ॥ सब जरि गई उड़ानी धूरि । ब्रह्म निरंतर रह्यो पूरि ॥ गगनि गली जहां मगन रुयाल । तहां लखि पायो अलख लाल ॥ हिलि मिलिकै किन्हौ विलास । जनम जनमकी मिटी भास ॥ रसातल भूतल अरु अकास । प्रेम सुगन्धकी फैली वास ॥ कहै कवीर मोहि भावै संत । जो या विधि खेलै रिनु वसंत ॥
शब्दावली
(६५३)
वसंत ५-को का को पुरुष को काकी नारि । ये सब संगी दिवस चारि ॥ टेक ॥ को काको पिता कोउ काको पूत । जन्म जन्मके उरइयो सूत ॥ जो सुरझावै सोई सुजान । मेरि मेरि करता तजै प्रान ॥ को काकी माय को काकी धीय । समझि देखि नर अपने जीय ॥ अंत काल जब पहुँचे आय । बाँह पकड़ि जम लिये जाय ॥ को काको कुटुम्ब को काकी जाति । अंतकाल कोई संग न साथि ॥ यामैं नहीं अपनो है कोइ । सत शब्द सुनि लेहो लोइ ॥ हैर उगौरी बड़ धोखा कीन । झूठी माया संग लीन ॥ या बाजीको लखै जु कोय । कहैं कवीर जन भेदी होय ॥
वसंत ६-वन माली जाने बनकी आदि । राम भजन बिना जनम वादि ॥ टेक ॥ एक फूल जो फुल्यो रितु वसंत । जामैं मोहि रहे सब जीव जन्तु ॥ फूलनमें ज्यों वसत वास । ऐसे घट घट गोविंद निवास ॥ उड उड रे भौरा जायओ देस । मेरे हरि प्रीतम सोक हो संदेस ॥ चोली पुरानी जीवन भार । मोहि विरह सतावे बार बार ॥ ऊंचा पर्वत विषम घाट । अगम पंथ न सूझे वाट ॥ पर बेली रातयो मेरा कंत । मैं का संग खेलौं रितु वसंत ॥ रितु वसंतकी परी झूल । अंब मोरे कचनार फूल ॥ कहैं कवीर मन भयो आनंद । मोहि हरषि मिलै गुरु रामानंद ॥
वसंत ७-कोइ हैरे हमारा गांवका । जासु परचै बूझूं हाँवका ॥ टेक ॥ विन बादल बरषै अखंड धार । बिन बीज चमकै अति अपार ॥ शशि भानु बिना होय प्रकास । सतगुरुके शब्द लियो निवास ॥ वृच्छ एक जहां अति अनूप । जाके साखा पंचम छाँह धूप ॥ बिन फूलन भौरा करै गुंजार । फल लाग्यो जाके निराधार ॥ ऊंच नीच नहीं जाति पांति । जहां त्रिगुन न व्यापे सदा सांति ॥ हरष शोक नहीं राग दोष । सदा आनंद संसे न
(६५४)
कवीरपंथी-
सोग ॥ अखण्ड पूरी एक नगर नाम । जहाँ वसिये साथो सहज धाम ॥ उपजे न बिनसे आवे न जाय । कहैं कवीर तहाँ रहो समय ॥
वसंत ८-सतगुरु खेले रितु वसंत । परम पुरुष जहाँ साधु संत ॥ टेक ॥ तीन लोकते भिन्न राज । जहाँ अनहद बाजा बजे बाज ॥ जहाँ चहुँ दिशि जोति उगे अपार । तहाँ विरलो जन कोह उतरे पार ॥ जहाँ कोटि कृष्ण नवाँँ माथ । कोटि विष्णु खड़े जोड़े हाथ ॥ कोटि महादेव धैर ध्यान । कोटि ब्रह्मा जहाँ पड़े पुरान ॥ जहाँ कोटि सरस्वति करै राग । कोटि इन्द्र फिरे गोहन लाग ॥ कोटि दुरगा जहाँ करै सिंगार । कोटि कुबेर जहाँ भैर भंडार ॥ जहाँ चोवा चंदन अरु अबीर । पुहुप बासरस गहर गंभीर ॥ सुरति सुरंग सुवास लीन्ह । सत्यलोकमें वास कीन्ह ॥ अजर द्रौपमें पहुँचे जाय । अजर पुरुषको दरस पाय ॥ कहैं कवीर लीजो विचार । नरक उधारन नाम हमार ॥
वसंत ९-या सुन्दर तनमें मनुआ भुलान । जाते जम धरि करै हान ॥ टेक ॥ कुबुद्धि सखी सो ताको नेह । भरि पिचकारी कुमति देह ॥ निसि दिन भ्रमको खेले खेल । आसा तृष्णा संग मेल ॥ दम्भ कपट डफ बाजे ताल । कंठ विषयकी डारि माल ॥ नाचत गति लिये और और । करै निरति गति लहै न ठौर ॥ आप आपको जानै नाहिं । परचो भरम गति भीर माँहिं ॥ सतगुरुको जो संग होय । लहै अमरपद अमर घर सोय ॥ छाडो खेल विकार मूल । भरम माँहिं कयूँ रहे भूल ॥ कहै कवीर विचारि देख । सत शब्द गहि कर विवेक ॥
वसंत १०-जहाँ नित वसंत अमृत निधान । सतपुरुष जहाँ सत् ध्यान ॥ टेक ॥ अगम अगाध लीला अपार । सुर नर मुनि सब रहे हार ॥ पुहुप अखंडित सेत भास । सत् पुरुष तहाँ कीयो
शब्दावली
(६५५)
बास ॥ बाजै नाद अखण्ड घोर । ताल मृदंगका बहुत सोर ॥ बिन पग निरति तहाँ होय नाच । बिन मुख बोले शब्द सांच ॥ फुले वसत बिन पुष्टुप वेल । सेत भँवर तहाँ करै केल ॥ नाना वरन अरु नाना रंग । बिन सरवर तहाँ उठे तरंग ॥ उनमुनिता जो होय नैन । सो लखि पावे संत सैन ॥ कहै कबीर कोई लहै न अन्त । मुखसागरमें मुखख बसंत ॥
वसंत ११-ऐसो खेलो संतो मन भये बिसारि । जम जालमकी मेटो रागि ॥ टेक ॥ जहाँ पांच मवासी घेरै गैल । मन राजा तहाँ करै खेल ॥ सखी पञ्चीस तहाँ करै सोर । अनहद बाजा बजै घोर ॥ ज्ञान गलीमें बाढै आय । सुरति निरति कोसंग लाय ॥ करि सनेह जो खेले फाग । भवसागरका करहु त्याग ॥ होय अचिंत जो चिन्ता मिटाय । सतगुरु पद मैं रहै समाय ॥ कहै कबीर गुरु किरपा कीन । भय छूटा तब फगवा दीन ॥
वसंत १२-तुम सुनियो संतो जुग वसंत । कोई अगम विवेकी बूझै संत ॥ टेका ॥ बसे नगर तहाँ उठै घोर । पांच सखी तहाँ करै सोर ॥ रंग रंगीली नौऊ नारि । विषम सरोवर रची धमारि ॥ नाना विधि सों करै कलोल । ताल मृदंग अरु बाजै ढोल ॥ चौरासी पिचकारी हाथ । लिये सखी सब फिरै साथ ॥ अहं गुलाल लिये गोद माँहि । सुर नर मुनि कोइ बच्यो नाहि ॥ मन राजाके सबही संग । बाढे भये तहाँ जमुना गंग ॥ उततैं आये ज्ञान बीर । सुरति निरति लिये संग धीर ॥ पिचकारी हित प्रेम लीन । सुमति सखीके हाथ दीन ॥ सेत अबीर उडावै हेल । ऐसा अद्वुत अगम खेल ॥ कहै कबीर कोई लखै साथ । जिन त्रिगुन तापकी तजी उपाधि ॥
(६५६)
कबीरपंथी-
वसंत १३-खेलत वसंत मन महा मोह । विषय फाँस तन देह छोह ॥ टेक ॥ आलस महलमें करै केल । आशा तृष्णा संग मेल ॥ अहंकार मद मंत्री संग । कुबुधि सखी सुं करै रंग ॥ लिये हाथ डफ डिम्भ करै । ब्रह्मादिक जिन लिये घेरि ॥ करै उलाहल काम वीर । महादेव कौ मारचो तीर ॥ इन्द्रासन लुटचो बनाय । सुर नर मुनि सब लिये खाय ॥ नर नारी नहीं देवैं चैन । निसि दिन बोलै विषय बैन ॥ सब बन फूले विषय वसंत । ताहि जरावै विवेकी संत ॥ उग्र ज्ञान मिलि मता कीन । सुरति सखी तिहि साथ दीन ॥ ब्रह्म अग्नि औटावे रंग । विषय बान सब कीये भंग ॥ सत् शील संतोष चैन । सत् शब्द मुख बोलै बैन ॥ सत् संतोष सुखमें समाय । गुरु मुख खेलै वसंत गाय ॥ कहैं कबीर मिटचो गरभ जंत । सुख सागर सुख निधि वसंत ॥
वसंत १४-मोह निरपति खेलै वसंत । सुर नर मुनि कोइ लहै न अंत ॥ टेक ॥ काम प्रधान तिहि राव साथ । सकल सभा मिली रच्यो राथ ॥ पांच बान पिचकारी लीन । पांचू पांच मिलि खेल कीन ॥ संकट करि करि मोरचो उजासु । होय अकरण न रहचो उदासु ॥ मोहनी होय सब हरचो ज्ञान । मारचो शिवको पुहुप बान ॥ कुमति सखी तहां खेलै खेल । चौरासी सब दीये ठेल ॥ सुभ असुभ तहां गावे गीत । लालच लोभमें सबै भात ॥ जोगी वनमें करै जोग । मारे बान तहां जाय लोभ ॥ जोग जुगति कछु रहै न थीर । पुहुप बान लग्यो शरीर ॥ रावन मारचो महा मोह । भक्त जना सों कियो द्रोह ॥ माया मोह लाग्यो राय । सबकूं मोह नरेस खाय ॥ अभिमान बान डुरजोधन लीन । वचन हेत नहीं भयो अधीन ॥ ताको लालच लाग्यो बान । मोह नृपतिने मारचो तानि ॥ एक ओर भयो मोह राव । इत विवेकने लायो दाव ॥
शब्दावली
(६५७)
सुरति निरति पिचकारी प्रेम । शील संतोष अति बचन हेम ॥ खेलन लागे मगन होय । तहां मोह पुनि चलयो रोय ॥ छिकत छिमां छबीले रंग । सुमति सखि तहां लीये संग ॥ काम क्रोध तहां परे छीन । महा मोह तहां भय हीन ॥ खेलै विवेक संतोष संत । कहै कवीर सुख निधि वसंत ॥
वसंत १५-चल भौरा जहां नित वसंत । अवसर गये न फिर मिलंत ॥ टेक ॥ सुख सागर जहां सुख निधान । तहां ग्रीषम नहीं करत हान ॥ जहां कुमुद फूले अनंत हो । तहां भँवरा खेलत वसंत ॥ कुंज सवन तहां कुहके मोर । प्रेम बुंद सागर हिलोर ॥ स्वतः प्रकास सो बन फूलंत । सुख निधान तहां करू बसंत ॥ यहि बन विषय विकार भोग । जहां व्यापै संसै महा सोग ॥ चलो वहाँ यहां तजो संत । जहां जोग जीत खेलै बसंत ॥ तहां यह पुहप अगर महाँके सुवास । सेत गुलाल अरू सेत भास ॥ सत पुरुष जहां मिलै कंत । कहै कवीर तहां करो बसंत ॥
वसंत १६-काम कला खेलै वसंत । गिने न काहू अति मैमंत ॥ टेक ॥ नैन सैन पिचकारी लीन । ले इन्द्रिनके हाथ दीन ॥ सकल संग ये मारे खाय । सुर नर सुनि सब दिये ढाय ॥ देख रूप मन करै भंग । कुबुधि सखी लिय धावै संग ॥ बदन देखि मति भये हीन । करै क्रोध सब देह छीन ॥ गुन अवगुन कछु गिने नाहिं । सबही को करै एक राहि ॥ अन्त न जानै कहा होय । जम द्वारे ले करै विगोय ॥ मोह रूपकी कला बनाय । जहैं तहैं फंदा रह्यो फंदाय ॥ मैं तू खेलको करत रारि । बाँह पकड़ि डारे पछारि ॥ तीन लोकमें डारे रोर । व्यापित करै अधियारै घोर ॥ गति मति सबहि गई हिराय । मदन बान तन रह्यो समाय ॥ अरे नर मूरख अबकी चेत । अब जानौ कछु याको हेत ॥ विष
(६५८)
कवीरपंथी—
अमृत निरवारो भेद । छोड़ो बाद विवाद खेद ॥ जो विष खाये सो परलय होय । विन अमृत नहीं बाँचे कोय ॥ था औसर तू मुट मान । सत शब्दको गहो प्रमान ॥ मिलि सतगुरु सो खेलो खेल । जरा मरनकी मिटे जेल ॥ कहैं कवीर गहो सत भाव । बहुरि न ऐसो पावो दाव ॥
वसंत १७—बाबासो जोगी जाके सहज भाव । अकलि प्रीति की जिच्छा खाय ॥ टेक ॥ शब्द अनहद सौगी नाद । काम क्रोध विषीयान बाद ॥ मन सुद्रा जाके गुरुका ग्यान । त्रिकुटि कोट में धरै ध्यान ॥ मन करनीको करै अस्नान । गुरुको शब्द लै धरै ध्यान ॥ काया काशी खोजौ बास । ज्योति स्वरूप जहाँ भयो परकास ॥ ग्यान मेखला सहज भाव । वंक नालि कौ रसहि खाय ॥ जोग मूलका देत बंद । कहैं कवीर थिर होय कंद ॥ १७ ॥
वसंत १८—मगन रूप निरखत वसंत । विविधि प्रकास महिमा अनंत ॥ टेक ॥ सरवन सुनत सोहं ग्यान । रसना बरनत आपु ध्यान ॥ नेत्र छकै लखि आप रूप । वरनत अमि छवि अति अनूप ॥ भोग नासिका सुखद वास । हिरदय कमलकी लै सुवास ॥ तुचा मेल कियो नासा संग । संग समान कियो परसंग ॥ ध्यान लिये है प्रेम प्रीति । सेवा बंदन संत रीति ॥ विषय पंथ नहीं चाले पाय । सुखित धाम बसि कहूं न जाय ॥ दरशन दरसत आप ब्रह्म । जल घटमें जल मध्य विम्ब ॥ तेज जोतिमें जोति तेज । विलसत सुख यह अमर सेज ॥ कहै कवीर मन मगन ग्यान । सोधि शब्द लेहु तत छान ॥ प्रान पिंडमें पिंड प्रान । शब्द रीति ब्रह्मत सुजान ॥
वसंत १९—चेतन रूप निरखत वसंत । प्रेम अमीरस आदि अंत ॥ टेक ॥ मन अज्ञा बस प्रेम संग । बुधि अस्थिर गति एक
शब्दावली
(६५९)
अंग ॥ चित अमी रस पिये अघाय । अहं कृत तब चित मिटाय ॥ सुरति लिये सोहं जाप । कुमति काम तजि भय संताप ॥ जीव सीव है ब्रह्म आप । सहज मिटि तन मनकी ताप ॥ द्वैत मिटी निज पदको पाय । यह सतगुरु सतपद लखाय ॥ तन मन मन तन रह्यो छाया । ततलौ वित वित तत समाय ॥ तूं पद ततको छुटचो धंध । पाय धाम पद नित अनंद ॥ कहै कवीर आनंद कंद । स्थिर घर मिलि भान चंद ॥
वसंत २०—सदा वसंत मन राखो थिर । मेटि कल्पना धरो धीर ॥ टेक ॥ काया नगर बसि करि विलास । आपा चिन्हो तजि सकल आस ॥ झूठी आसा तनको नास । ताते जगत है काल त्रास ॥ कहा भवर होय फिरौ उदास । यहि संपुट देखो कमल वास ॥ चारि पहरको रंग रास । सुरझत कमल करि ले हुलास ॥ केतिक है तेरे जिवको त्रास । घोखे लेत कयों अनत बास ॥ तूही फूल तूही अगर बास । का द्वंद्वै बन बन होय उदास ॥ अजहूं चेत है तन में स्वास । सुरति सुमति गुन राखि पास ॥ सकल मही गुरु है निवास । अटल राज जुग जुग विलास ॥ हरष शोक नहीं भूख प्यास । रैन दिवस नहीं सदा उजास ॥ सही धाम निरमल शरीर । सदा अखंडित कहै कवीर ॥
वसंत २१—कहा अरुझि रहै मायाके जाल । निसि दिन जीवको संशय काल ॥ टेक ॥ अनंत भूप अलेख साध । सिद्धि न पाई गये अगाध ॥ भरम मिल्यो नहीं मिटी व्याधि । ब्रह्म ब्रह्म रटि ठान्यो वाद ॥ ब्रह्म कौन कहु मन है कौन । कौन शब्द कहु कौन पौन ॥ भिनि भिनि करि त्यागये भौन । भरम रच्यौ जिमि पानी लौन ॥ प्रगट सिद्धिपात लखै जो कोइ । सर्व यथा भरि पूरि सोइ ॥ बीज विरछ यक संग जोय । जस चंदा एक संग
( ६६० )
कवीरपंथी—
लोय ॥ ब्रह्म वदन धुनि तत रूप । सकल साज सरगुन सरूप ॥ उदित भान यक संग धूप । सरब मूल यक बीज रूप ॥ सोई दृष्टि है सोई नैन । सोई तेज तन मनमें सैन ॥ सोई पेड फल सोई कैन । सुख निधान आनंद चैन ॥ यही जम करताको साज । मरम मिलै तो सरे काज ॥ विना मरम गुरु देत राज । भेद न पायो भयो अकाज ॥ अगम ग्यान चित भरम जान । लख सरूप तजिदूरि ध्यान ॥ कहै कवीर गहो सत्त जान । अमीतत गुरु पान पान ॥
वसंत २२—देखो देखो रे या नरकी भूल । सींचत साखा तजत मूल ॥ टेक ॥ प्रगट ब्रह्म है घट समान । ताहि छांड़ि पूजे पखान ॥ जल पीवै पाषाण धोय । सो तो आदि अंत पाषाण होय ॥ स्वर्ग सीस पाताल पाय । सो कैसे सम्पुट समय ॥ अलख पुरुष आवे न जाय । सो कैसे दिये तुम्हारो खाय ॥ जुगन जुगन मैं कहो पुकारि । नर शब्द न चीन्हे करे रागि ॥ कहै कवीर नर कियो न खोज । भटकि मन्यो जैसे वनकी रोज ॥
वसंत २३—कोई संत विवेकी मनही जान । जामें अरुझि रहो सगरी जहान ॥ टेक ॥ मन पंछी होय उड़ै अकास । मनही जल थल सकल बास ॥ मनही चहुँ दिशि रहो छाय । कोइ न चिन्हे मन सबको खाय ॥ मनही पाप अरु मनही पूजा । मनही रूप धन्यो यह इजा ॥ मन मध्य मन आदि अंत । मनही लीला रची अनंत ॥ मनके बस सुर सकल देव । मनहीकी सब करै सेव ॥ मनही धाम जो रच्यो बनाय । मन जनम्यो नौ बेर आय ॥ ब्रह्म फूटि मन भयो अंस । तीन लोक मन कियो विध्वंस ॥ कहै कवीर जो मनही जान । सत शब्द गहि ले पहिचान ॥
वसंत २४—खेलत वसंत तन मन विरह रंग । भव सागर नाना तरंग ॥ टेक ॥ कोई जोग करे कोइ जज्ञ दान । कोई नेम धर्म
शब्दावली
(६६१)
पूजे पषान ॥ कोई गिरही कोई फिरै उदास । कोइ नग्र त्वचा गुफामें वास ॥ कोई डंड कमंडल धूमपान । कोई उरध तपस्या गोड तान ॥ कोई दूधारी पवन आस । कोई अग्नि जराचे चहुँ पास ॥ कोई छत्र धारी धज निशान । कोइ सुरासन मुख खेत ठान ॥ कोई पीर औलिया करै मिजाद । कोई षट् दरसनमें करै बाद ॥ कोइ उदय अस्त दहना वल देय । कोई चारि मास जल सैन लेय ॥ कोई बहुत भेष धरि करै स्वांग । कोई साधे धतूरा पोस्त भांग ॥ कोई उरध कपाली आसन राधि । कोई निशि वासरकी निद्रा साधि ॥ कोई रिद्धि सिद्धि करामाति जान । कोई जोगी सुद्रा पहिरै कान ॥ कोई अलह कहै कोई कहे राम । हिन्दू तुर्क दोय धर नाम ॥ सकल ब्रह्म समान एक । कहैं कवीर लीला अनेक ॥
वसंत २५-ऐसे सबै मद माते कोई न जाग । संगहि चार घर मूसन लाग ॥ टेक ॥ जोगी माते जोग ध्यान । पंडित माते पंडि पुरान ॥ तपसी माते तपके भेव । संन्यासी माते अह भेव ॥ माते ऊधो औ अकरूर । हनुमत माते लिये लंगूर ॥ शिव माते हरि चरन सवे । कलि माते नामा जय देव ॥ जैनी माते करम बाद । जंगम माते घंट नाद ॥ सुल्या माते देदे बांग । राम विमुख सब भूले सांग ॥ राजा माते भरि भंडार । रानी माती करि सिंगार ॥ दानी माते दे दे दान । प्रजा माती विषया पान ॥ ब्रह्म रटत है चारों वेद । रावन गइयो घरके भेद ॥ या मनुवाको अध्यक्षम काम । ताते कहै कवीर भजु सत्त नाम ॥
वसंत २६-नारि नाहि संतो हरि तुम्हार । बिना मूल जैहो जनम हार ॥ टेक ॥ हरिश्र्वंद समान नहि दानी आन । निज रानी सहित पुत्र विकान ॥ विन विचार चित लियो है मानि । हरिचंद भरो डोम घर पानि ॥ पांडव कहिये सब सौ जोर । तिनका पाँव
(६६२)
कवीरपंथी—
नरकमें बोर ॥ राजा बलि करनी जो कीन्ह । बावन रूप छली बाहु लीन्ह ॥ रावन भयो चहुँ खलके राल । तिनको काल कियो पैमाल ॥ मथुरा कंस सिर छत्र ढार । कृष्ण किस्ना काल धरि चोटी मार ॥ यही भांति सब गये है बीति । काहु न मानी शब्दकी रीति ॥ कहैं कवीर यह हरि विचार । शिव विरंचि सब खायो झार ॥
वसंत २७—इस घरमें बाबा बाढी रारि । नित उठि लगै चपल नारि ॥ टेक ॥ एक बडी जाके पांच हाथ । पांचनके पचीस साथ ॥ पचीस बतावे और और । और बतावे कई ठौर ॥ इक अन्तर बैठि अन्त लेय । इक झक झोरि झोटा देय ॥ अपनों अपनों चाहैं भोग । कहैं कैसेके यह सधै जोग ॥ नियरे रहन न पाऊँ दूरि । चहुँ दिशि बाबरि रही पूरि ॥ लाख अहेरी एक जीव । ताते पुकारे पीव पीव ॥ घर बांधु नहिं मांछु भीख । बहुत दिननको लागी सीख ॥ अबकी जो कहुँ होय बचाव । कहैं कवीर परै पूरा दाव ॥ २७ ॥
वसंत २८—मोपै मोह मृग मारचो न जाय । मेरी बुद्धि वारीमें वसो खाय ॥ टेक ॥ मेरी बुद्धि वारीमें मुकती मैन । मोहि देखत चरि गयो केन केन ॥ रहन न पावे फूल पात । सौंचत हारी पटक हाथ ॥ सुरति निरतिके लिये है वान । ग्यान धनुष सधै सधान ॥ अब मारूं तो ताकि ताकि । होय विदेह तहां गयो विलाप ॥ सुर नर मुनि सब थकै हारि । मोह मृग नहीं सके मारि ॥ कहैं कवीर हम दियो टारि । गुरुकै शब्दकी करी बारि ॥
वसंत २९—मोहि ऐसे बनिज सो नहिं काज । जामें घटत मूल नित बढत व्याज ॥ टेक ॥ नायक एक बनिजरे पांच । बैल पचीस वाके संग साथ ॥ नौ वहिया दस गौनि आहि । कस निवेहे तरि लागी ताहि ॥ सात सूत लै बनिज कीन । कर्म टहलुवा संग लान ॥ चारि जगातो माड़ी रारि । ताते नायक चाल्यो हारि ॥ खरच
शब्दावली
(६६३)
खुटान बनिज टूट । चहुँ दिशि टांडो गयो फूट ॥ कहै कवीर विष यह बनि बादि । पड़ि गोनिको देय लादि ॥
वसंत ३०—ऐसो नगर निरंजन बसो न जाय । जहाँ धरम राये मांगै धराय ॥ टेक ॥ काया पुर पटन दसूँ हुवार । ऊँची कुलफ दिठ लगे के वाँहू ॥ पांच जना नहि माने कोय । सुसै चोर घर बेग सोये ॥ तत वदरे आये प्रचंड । घर मोदीको कियो है वंघ ॥ भाजि चले पाँचूँ घरधान । ले मोदी गुदरी दीवान ॥ सहली घाट अरु झीनी बाट । द्ररग जगाती रोके घाट ॥ डांड लगेका पूछे मोहि । पूछे जावों कहा देव तोहि ॥ सब अनाथ मैं कहूँ काय । कहौ कौन विगुचे इहां आये ॥ मैं तो बहूँ चरन धीर । सुखसागर होय मिले कबीर ॥
वसंत ३१—ऐसो संगवास मोहि वस्यो न जाय । जहाँ आप स्वारथी पांचू भाय ॥ टेक ॥ अटपट कुनबा बारह बाट । फिरि फिरि जल पीवै दसो घाट ॥ नैन नासिका जीभ्या कान । इद्री स्वाद चाहे आन आन ॥ काम क्रोध को कठिन जार । भवसागर सुझे वार न पार ॥ चहुँ दिसि पसरचो माया फांसि । जहाँ मन बंधे करम बास ॥ दुख सुख व्यापे दोनो भांति । काया नगरमें परिहै भांति ॥ कहैं कवीर कहा कथिये ज्ञान । दो तलवारको एकहि म्यान ॥
वसंत ३२—मेरो हार हिरानौ मैं लजांव । सांस दुराचर्नी पीव डरांव ॥ टेक ॥ हार गयो मेरो राम धाग । बिच बिच मानिक लाल लाग ॥ तरन पियाला परम जोति । अंतर अंतर लगे है मोति ॥ पांच सखी मिलिहैं सुजान । चलि जइये तीर वेनी नहान ॥ नहाय धोय सिर तिलक दीन्ह । ना जानो हार मेरी कौन लीन्ह ॥
(६६४)
कवीरपंथी—
हार हरचो जिन विमल कीन्ह । ले पारोस निहार दीन्ह ॥ तीन लोककी जाने पीर । सब देव सिरोमनि कहै कवीर ॥
वसंत ३३--जिन पतित उधारै सो संभारि । आदि अन्त राखे सुरारि ॥ टेक ॥ यक गनिका होती नगर माहिं । जाको राम कहनकी सुधि नाहिं ॥ खरचे दाम सुवा लियौ मोल । तुम पढौ परबते राम बोल ॥ एक अजा मिल पंडित असाच । सो तो गनिकाके संग रहगे रांच ॥ राम नारायण पुत्र साखि । सो तो जमद्वन्तनसे लियो राखि ॥ एक बधिक हते कोटिन जीव । जिन सपनेहु नहिं भज्यो पीव ॥ हरिके चरण लखि मारचो बान । सो बधिक चढ़ि गयो विमान ॥ पतित उधारण विरदा तोर । सरन आय लज्जा राख मोर ॥ कहै कवीर देवा न देव । सुर नर मुनि जाके लह्यो न भेव ॥
वसंत ३४--नाहि छाडो बाबा राम नाम । मोहि और पठनसों कौन काम ॥ टेक ॥ प्रह्लाद पधारे पठन शाल । संग सखा लिये बहुत बाल ॥ कहा पढावे पांडे आल जाल । मेरी पाटीमें लिखिदे श्रीगोपाल ॥ कहे पंडित तुम सुनौ राय । तेरो पुत्र चलत है अपने दाय ॥ मैं मारूं डारै बुझान । ये तो नेक न मानै मेरी कान ॥ संडेमरके कह्यो जाय । प्रह्लाद बंधायो बेगि आय ॥ राम कहनकी छाड बान । अबही छुड़ाऊँ मेरो कहा मान ॥ कहा डरावे पांडे बार बार । जिन जल थल गिरिको कियो प्रहार ॥ मार डार भावे देह जारि । राजाराम तजूं मेरे गुरुहिं गारि ॥ काहि खडग कोप्यो रिसाय । तोरे राखन हारो मोहि बताय ॥ कहैं प्रह्लाद कछु शंका नाहिं । मोमें तोमें सकल माहिं ॥ खडग खम्भमें रहो पूरि । मेरो राखन हारो नाहिं दूरि ॥ खम्भ फारि प्रगटे सुरारि । हिरनाकुस मान्यो नख विडारि ॥ आदि पुरुष देवानदेव । धारच्या
शब्दावली
(६६५)
भक्त हेत नरसिंह भेव ॥ कहै कवीर हरि भगती प्यार । प्रहलाद उबान्यो अनेक वार ॥
वसंत ३५--बाजि बाजि रे मधुर वा मधुरि तान । तेरो तान मेरो बसो ग्रान ॥ टेक ॥ प्रथम सहनाई बाजे नाद । मिटि गये मनके विषै वाद ॥ ह्रम ह्रम खुली सुखकी खान । जन्म सुफल कियो अपनो जानि ॥ दूजे घंटा बाजे घोर । तिमीर नासि भयो दिवस भोर ॥ सुकृत वैन भयो थकित गात । बिसरे मनको पाँच सात ॥ तीजे संख ध्वनी पडचो कान । गति पलटी मति भई आन ॥ जन्म जन्मके पाप फंद । नास भये सब दुख द्रन्द्व ॥ चौथे नाद जो बाजे झांजि । कसमल मनके डारे मांजि ॥ अहंकारको काटचो सीस । चित्त चंचल गति घटत दीस ॥ पाँचवें तंती सुर सोहाय । राग अखंडित गीत गाय ॥ लगे सुहावन होय आनंद । जम जालिमके कटै फन्द ॥ छठवें बाजे मंजीरा ताल । जरा मरनका मिटै साल ॥ पाँच सखिनके भयो चैन । सरवन सुनत सुख पीवके बैन ॥ सतवें बाजे सरस बीन । तन हारचो मन भयो लीन ॥ निगम निरंतर धरचो ध्यान । सुधि विसरी बुधि भई विज्ञान ॥ आठवें तूर मोहि बहुत प्यार । तू मति मोते होय न्यार ॥ साधु संत तेरा ध्यान लेहिं । तेरे सुनत पीव दरश देहिं ॥ नवमें बाजे करनाली भेरि । अगम अगोचर निरखि हेरि ॥ जागत जागत रैन जाय । हेरत हेरत दिन विहाय ॥ बड भागी सुनै दसूं नाद । जिहि सुनि भागै सकल वाद ॥ मेघ नादमें रहै समाय । सुरति निरन्तर अग्र जाय ॥ यकादस बाजे नौबत घोर । गगन बंब बहु उठै सोर ॥ शब्द सुरति तहां करि विचार । पैठि गये गहि मकर तार ॥ द्वादस मध्ये भयो प्रगास । मन मनसाको भयो नास ॥ बाजे अनंत नहि अंत ओर । सेत पुहुप अरु सेत भौर ॥ देख्यो
(६६६)
कवीरपंथी-
दीप अमान ठौर । थकत भयो मन मिटि दौर ॥ जहो सुघर सुरन बाजे रबाब । जोग जीत तहाँ खेले फाग ॥ अघर दीप अरु अघर वास । सत पुरुष सोहै प्रगास ॥ तहाँ हंस पहुँचे जो कोय । जरा मरनसो रहित होय ॥ अघृत फल तहाँ सदा भोग । मिटि गये क्षुधा तृषा सोग ॥ कहैं कवीर गुरु दीयो लखाय । अच्छ फल रह्यो छाय ॥
वसंत ३६-वसंत आरति करि सुजान । भौ सागर नहि होय हानि ॥ टेक ॥ गुरु मुख साजो अमी पान । चौदह पवन आरति प्रमान ॥ अनहद बाजे घंटा ताल । भवसागर छूटे जंजाल ॥ आरति करि खेलो वसंत । जम जालिमको छूटे दंत ॥ अघर जोति दीपक निशान । गगन बंब गरजे सुजान ॥ घट माहिं उपजो ज्ञान ध्यान । पूरन ब्रह्म सब माहिं जान ॥ कहैं कवीर गुरु मिले खेलि । दुर्गदानीको दीन्ह पेलि ॥
वसंत ३७-तकि मारचो सतगुरु सुजान । मेरे हिरदे लागो शब्द बान ॥ दसहुँ दिसा मन करत दौर । चित न चले मन रहौ ठौर ॥ चल न सके मन पांव एक । मेरे कठिन करेजे भयो छेक ॥ ऊपर घाव न दीसे कोय । नख सिख व्यापे साले मोय ॥ को जाने मेरे तनकी पीर । सो जाने जेहि लागो तीर ॥ पलव्यो तन मन पलव्यो अंग । पांच पचीसक लीन्हे संग ॥ उलट समाने आपु माहि । कहैं कवीर बलि जाऊँ ताहि ॥
वसंत ३८-चल भौरा खेलहि बसंत । पुढुष बास महके अनंत ॥ बन मोरे भये हरियर झार । पियरे पियरे पात सार ॥ बेल नबेली आस पास । जुग मरनको भयो नास ॥ निस चंदा परकास कीन्ह । बासर मूरज गवन लीन्ह ॥ अब न मिली गत भये विनास । विकस कँवल देखो प्रकास ॥ संपुट खोल भौरा उद्धान । गई
शब्दावली
(६६७)
रजनी जब भये विहान ॥ रुन झुन भौरा लाये सोर । पुहुप वास महँ करे घोर ॥ निसि वासर नहि चंदा सूर । पुरुष रूप अविगत है पूर ॥ सर्व सार रस भिन्न अंग । जम कंटकके छूटे संग ॥ सुख सागर निरभयको धाम । पुहुप अखंडित सत्त नाम ॥ कहें कवीर ऐसे खेले साथ । पुरुष दरस पावे अगाध ॥
वसंत ३९--चल चलरे भौरा कँवल पास । तेरी भौरी डोले अति उदास ॥ दिना चारको सुरंग फूल । ताहि देख भौरा रहो भूल ॥ सब फूलनको लियो भोग । सुख न भयो तन बाढे रोग ॥ जित देखो तित बन पलास । मोहि कतहुँ न दीसे जीवको वास ॥ बनसपती जब लागी आग । अब भौरा कहाँ जैहो भाग ॥ पोहप पुराने गयो सूख । भौराको लागी अधिक भूख ॥ उड़ न सके बल गयो टूट । भौरी रोवे सीस कूट ॥ जब मैं बरज्यों बार बार । तोहे बन दूँब्यों डार डार ॥ कहें कवीर यह मनको भाव । सत्त शब्द बिन जमको दाव ॥
वसंत ४०--कहाँ जइये ग्रह लागो रंग । चित न चले मन भयो अपंग ॥ जहाँ जाय तहाँ जल पखान । पूरि रहो प्रभु सबहिं समान ॥ बेद स्मृति सब देखो जोय । उहाँ जाय सो इहाँ न होय ॥ एक दिन मनमें भये उमंग । घसि चोवा चन्दन चरजे अंग ॥ पूजन चली सब ठाहिं ठाहिं । ब्रह्म बतावे गुरु आप माँहि ॥ अंजन मंजन तजु विकार । अरसठ तीरथ एक द्वार ॥ काहेको नर अन्ते जाय । घटहीमें तीरथ काहे न न्हाय ॥ सतगुरु मैं बलिहारी तोर । सकल कर्म भर्म मेटो मोर ॥ कहें कवीर सुन रामानंद । गुरुको शब्द काटे कोट फंद ॥
वसंत ४१--नगर निरंजन बसो जाय । धरमराय मांगे बेध राय ॥ काया पुर पाटन दस दुवार । कूँजी कुलफ दिठ लागे किवार ॥
( ६६८ )
कवीरपंथी—
पांच जना नहि माने काहु । मूसे चोर घर बांधो साहु ॥ तलबदार आये परचंड । परमोधी पर कीन्है डंड ॥ भाग चले पांचों परधान । ले मोदी गुजरे दीवान ॥ आगे अगम है विषम घाट । दुर्गदानी जगाती रोके घाट ॥ दान देहु का पूछो मोहि । रीते जाव की देऊँ तोहि ॥ सबे अनाथ मैं कहों काहि । को कोन बिगूचे इहाँ आहि ॥ सब सुख चाहो धरो धीर । सुखसागर जब मिलो कवीर ॥
वसंत ४२—कोई सन्त विवेकी मनही जान । उरझ रहो सकलो जहान ॥ मन पंछी उडि गयो अकाश । जल थल माँही सकल बास ॥ मन उरझाय रहो है छाया । कोई न चीन्ह मन सबहीं खाया ॥ मनहि पाप औ मनही पुत्र । मन सिरजा देखो तीन गुत्र ॥ मनहि धाम जो रचा बनाय । मन जन्मो नौ बार आय ॥ मनके व्रत सुर सकल देव । मनहीकी सब करत सेव ॥ मनहि मध्य औ आदि अन्त । मन सिरजो लीला अनंत ॥ ब्रह्म फूट मन भयो अंस । तीन लोक मन कियो विध्वंस ॥ कहैं कवीर जो मनही जान । सत्य शब्द गहि पद निरवान ॥
वसंत ४३—मोहि ऐसे बनिज सो नाही काज । घटत मूर दिन बढ़त ब्याज ॥ नायक एक बनजारे पांच । बैल पचीसक संग साथ ॥ नौ वहियाँ दस गोन लाद । कसन बहतर लागे तास ॥ पाप पुन दोय बनिज कीन्ह । कर्म पयादे संग लीन्ह ॥ तीन जगातीसे मांडी रार । तासों नायक गयो है हार ॥ पूंजी खुटायल बनिज टूट । चहुँ दिस टांडा गयो फूट ॥ कहैं कवीर ऐसो बनिज बाद । परि है गौन को देई लाद ॥
वसंत ४४—सतगुरु खेले नित बसंत । मुक्त पदारथ मिले हो कंत ॥ धरती रथ चढ़ देखो देस । घर घर देखो नृप नरेस ॥ जोजन चार पेंतुरे फेर । बांध मवासी घरमें घेर ॥ अघर निअच्छर
शब्दावली
(६६९)
गहो ढाल । भाग चले रन छोड़ काल॥ सूर सुध घट गहो कमान । चंद चिता गहि मारो वान॥ साथ संगत मिल करहु जोर । तब गढ छोडे चतुर चोर ॥ ऐसी विध जो लडे सूर । तब काल मवासी होय दूर॥ अधर निअच्छर गहो डोर । जो निज मानो बचन मोर॥ धरती तुरे होय असवार । कहें कवीर भी उतरो पार॥
वसंत ४५-देखो देखो रे या नरकी भूल । सींचत साखा तजत मूल ॥ प्रगट निरंजन घटही मान । ताहि छोड पूजत पषान ॥ जल पीवै पाषान धोय । आदि अंत पाखान होय॥ गगन सीस पाताल पांय । सो कस ठाकुर संपुट समाय ॥ अलख निरंजन आवे न जाय । सो कस दिये तुम्हारो खाय ॥ बार बार हम कहा पुकार । शब्द न माने करत रार ॥ कहें कवीर नर कियो ना खोज । भटक मुये जैसे बनके रोज ॥
वसंत ४६-नहिं नहिं रे संतो हरि तुम्हार । एक मूल बिना जेहो जन्म हार ॥ हरि चंद समान कहु कौन दानि । पुत्र सहित जिन बैचि रानि॥ करनी कीन्ही मनहि जानि । आप नीच घर भरचो पानि॥ राजा बलि भल करनी कीन्ह । बावन रूप हरि छल जो लीन्ह॥ ता कहंदीन्ह पताल बास । देखो देखो रे संतो हरि विश्वास॥ राय युधिष्ठिर भक्त जोर । ताहुके पांव नरकमें बोर॥ कहें कवीर सुन हरिके दास । ऐसे मूरख चाहे बैकुण्ठ बास ॥
वसंत ४७-होत ब्याह सतगुरुके द्वार । जहां बरषत शब्द अखंड धार॥ बाहर द्वादश खंभ गाड़ । प्रेम प्रीतको मंडप मांड॥ ज्ञान तत्त्व लेकर चढाव । श्वेत मुकुट माथे बंधाव॥ जगमग जोत जहां अति अपार । सुघर पुढुप जहां अति सुवास॥ कहें कवीर रहु सुमत धीर । ऐसे ब्याह रचे सतगुर कवीर ॥
(६७०)
कवीरपंथी—
वसंत ४८—जप जप रे जियरा सुकृत सोर । काहे न गहो निज शब्द डोर ॥ जहां सुकृत तहां अग्र बास । रवि शशि धरनिन बहे बतास ॥ गगन नगर जिन बरसे नीर । सुरत निरत ले रोपो धीर ॥ षट् दर्शन मिल कथहीं बेद । सिध साधक सब अपने भेद ॥ सुर नर मुनी कोइ गम्म न कीन्ह । औंट मुवे बिन जलके मीन ॥ इकइस खण्ड पृथ्वीको भाव । गन गन्धर्व बीते याही ठांव ॥ कहैं कवीर रहु अति अधीन । सत शब्द गुरु कहि जो दीन्ह ॥
वसंत ४९—ब्रह्ममंड धाम रस एक जान । जामैं सप्त सिंधु औ चार खान ॥ चर अचर जीव जुग बेद देव । सुर असुर नाग सब करत सेव ॥ बाग वृच्छ सलिता अन्नप । फल फूल पात शोभा सरूप ॥ बहे सूर सूरनर सकट साल । रवि चंद बंद है अमल ताल ॥ रिध सिध सरबत्र ऐन । गुरु ज्ञान ध्यान धन मर्म चैन ॥ सरग नरक घर धरन धाम । पाप पुन नहीं चलन काम ॥ पांचों गुरु मंत्री प्रवीन । भोग नार पचीस कीन ॥ इनके अनंद सुख भौ सुभाय । पूर रहो मोहि प्रगट काय ॥ पांच तत्त्व गुन तीन साज । मन राजा जहां करत राज ॥ ब्रह्म अखंड है सबते न्यार । वेद पुरान न पावे पार ॥ निहतत्त्व अच्छर शब्द सार । किंचक लखे सो उतरे पार ॥ नहिं आवे नहिं धरत देह । कहैं कवीर वह है विदेह ॥
वसंत ५०—मोह मिरग मारो न जाय । यह तन बारीमें बसो आय ॥ बारीमें उपजे मुक्त बेल । देखत चुन गये केल केल ॥ बचत नहीं फल फूल पात । सींचन हारो पटकै हात ॥ सुरत निरतके साजो बान । ज्ञान ध्यान साजो कमान ॥ जो कोइ मारे ताक ताक । होत विदेह बिलाय जात ॥ सुर नर मुनि कोई सके न मार । गन गंधर्व सब रहे हार ॥ कहैं कवीर हम दीयो टार । सत्य शब्दके रोपी बार ॥