भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६६९)

गहो ढाल । भाग चले रन छोड़ काल॥ सूर सुध घट गहो कमान । चंद चिता गहि मारो वान॥ साथ संगत मिल करहु जोर । तब गढ छोडे चतुर चोर ॥ ऐसी विध जो लडे सूर । तब काल मवासी होय दूर॥ अधर निअच्छर गहो डोर । जो निज मानो बचन मोर॥ धरती तुरे होय असवार । कहें कवीर भी उतरो पार॥

वसंत ४५-देखो देखो रे या नरकी भूल । सींचत साखा तजत मूल ॥ प्रगट निरंजन घटही मान । ताहि छोड पूजत पषान ॥ जल पीवै पाषान धोय । आदि अंत पाखान होय॥ गगन सीस पाताल पांय । सो कस ठाकुर संपुट समाय ॥ अलख निरंजन आवे न जाय । सो कस दिये तुम्हारो खाय ॥ बार बार हम कहा पुकार । शब्द न माने करत रार ॥ कहें कवीर नर कियो ना खोज । भटक मुये जैसे बनके रोज ॥

वसंत ४६-नहिं नहिं रे संतो हरि तुम्हार । एक मूल बिना जेहो जन्म हार ॥ हरि चंद समान कहु कौन दानि । पुत्र सहित जिन बैचि रानि॥ करनी कीन्ही मनहि जानि । आप नीच घर भरचो पानि॥ राजा बलि भल करनी कीन्ह । बावन रूप हरि छल जो लीन्ह॥ ता कहंदीन्ह पताल बास । देखो देखो रे संतो हरि विश्वास॥ राय युधिष्ठिर भक्त जोर । ताहुके पांव नरकमें बोर॥ कहें कवीर सुन हरिके दास । ऐसे मूरख चाहे बैकुण्ठ बास ॥

वसंत ४७-होत ब्याह सतगुरुके द्वार । जहां बरषत शब्द अखंड धार॥ बाहर द्वादश खंभ गाड़ । प्रेम प्रीतको मंडप मांड॥ ज्ञान तत्त्व लेकर चढाव । श्वेत मुकुट माथे बंधाव॥ जगमग जोत जहां अति अपार । सुघर पुढुप जहां अति सुवास॥ कहें कवीर रहु सुमत धीर । ऐसे ब्याह रचे सतगुर कवीर ॥