भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

वसंत ४८—जप जप रे जियरा सुकृत सोर । काहे न गहो निज शब्द डोर ॥ जहां सुकृत तहां अग्र बास । रवि शशि धरनिन बहे बतास ॥ गगन नगर जिन बरसे नीर । सुरत निरत ले रोपो धीर ॥ षट् दर्शन मिल कथहीं बेद । सिध साधक सब अपने भेद ॥ सुर नर मुनी कोइ गम्म न कीन्ह । औंट मुवे बिन जलके मीन ॥ इकइस खण्ड पृथ्वीको भाव । गन गन्धर्व बीते याही ठांव ॥ कहैं कवीर रहु अति अधीन । सत शब्द गुरु कहि जो दीन्ह ॥

वसंत ४९—ब्रह्ममंड धाम रस एक जान । जामैं सप्त सिंधु औ चार खान ॥ चर अचर जीव जुग बेद देव । सुर असुर नाग सब करत सेव ॥ बाग वृच्छ सलिता अन्नप । फल फूल पात शोभा सरूप ॥ बहे सूर सूरनर सकट साल । रवि चंद बंद है अमल ताल ॥ रिध सिध सरबत्र ऐन । गुरु ज्ञान ध्यान धन मर्म चैन ॥ सरग नरक घर धरन धाम । पाप पुन नहीं चलन काम ॥ पांचों गुरु मंत्री प्रवीन । भोग नार पचीस कीन ॥ इनके अनंद सुख भौ सुभाय । पूर रहो मोहि प्रगट काय ॥ पांच तत्त्व गुन तीन साज । मन राजा जहां करत राज ॥ ब्रह्म अखंड है सबते न्यार । वेद पुरान न पावे पार ॥ निहतत्त्व अच्छर शब्द सार । किंचक लखे सो उतरे पार ॥ नहिं आवे नहिं धरत देह । कहैं कवीर वह है विदेह ॥

वसंत ५०—मोह मिरग मारो न जाय । यह तन बारीमें बसो आय ॥ बारीमें उपजे मुक्त बेल । देखत चुन गये केल केल ॥ बचत नहीं फल फूल पात । सींचन हारो पटकै हात ॥ सुरत निरतके साजो बान । ज्ञान ध्यान साजो कमान ॥ जो कोइ मारे ताक ताक । होत विदेह बिलाय जात ॥ सुर नर मुनि कोई सके न मार । गन गंधर्व सब रहे हार ॥ कहैं कवीर हम दीयो टार । सत्य शब्दके रोपी बार ॥