भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

श्रीगुरु दीन दयाल । भिन्न भिन्न वर्णन करि, हरहु अज्ञान विशाल ॥ ३९ ॥

गुरु उत्तर ।

(अष्टंगी (माया) का कर्म)

अव्याकृत अव्यक्त जो, मूल प्रकृति प्रधान । अद्या ताको कहत हैं, सुनु शिव शील निधान ॥ ४० ॥ पांच तत्त्व गुण तीन मिलि, अष्टंगी तेहि नाम । आठों आठो ते मिलो, भयो जगत परिणाम ॥ ४१ ॥

जगतका स्वरूप ।

चैतनके संयोगते, पाईं शक्ति अपेल । तनु मात्रा परगट कियो, गुण तीनन जगमेल ॥ ४२ ॥

पांच तन्मात्रा ।

शब्द स्पर्श अरु रूप है, रस अरु गन्ध अनूप । तन मात्रा यही कहत हैं, जाने सुनिवर भूप ॥ ४३ ॥

पांच तत्त्व ।

पृथ्वी अप अरु तेज है, वायू और अकाश । पांच तत्त्व यह जानिये, कारण विश्व प्रकाश ॥ ४४ ॥

तीन गुण ।

सत रज तम यह तीन जो, गुण कहियत है तात । पांच संग यह तीन मिलि, जगत सबे दरशात ॥ ४५ ॥

जगत ।

इनहीके संयोगते, भयो जगत सब आय । देह अवस्था कोश पुनि, जीव ईशलो भाव ॥ ४६ ॥ व्यष्टि समष्टिके भेदते, भया जगत प्रकास । जीव शीव सब परगटे, इनहीके हट भास ॥ ४७ ॥

जीव—शीव ।

व्यष्टि अभिमानी जीव है, समष्टि अभिमानी शीव । ज्ञान दृष्टि करि देखहु, यही जगतके पीव ॥ ४८ ॥