भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६४१)

साधारण वैराग्यस्वरूप ।

नाश मान जग जानिके, मनुवा होय उदास । मुनिजन कहत विराग सो, नासत विषय विकास ॥ १० ॥

बुद्ध वैराग्य स्वरूप ।

राग गयो मनते जबै, द्वेष न आवै पास । शुद्ध विराग ताते कहो, मिटे सकल सतभास ॥ ११ ॥

शमस्वरूप ।

भयो विराग जु मन विषै, मिटी बासना जाहि । मन रुकयो विषयानते, शम कहियत है ताहि ॥ १२ ॥

दम स्वरूप ।

मन रुकयो विषयानते, इन्द्रिय धारयो धीर । दम ताहीको कहत हैं, सत मत गहिर गंभीर ॥ १३ ॥

उपरति स्वरूप ।

मन इन्द्रियके रुकतही, छूटयो विषय विकार । सुधर्म रत तब मन भयो, उपरम ताहि विचार ॥ १४ ॥

तितिक्षा स्वरूप ।

शीत उष्ण शुधा तृषा, सुख दुख औरो आहि । इनको सहन सुभाव सो, कहत तितिक्षा ताहि ॥ १५ ॥

अदा स्वरूप ।

सत खोजनकी चाह मन, गुरु शास्त्रन ढिग जाहि । हृद विश्वास तिनके बचन, शरघा कहिये ताहि ॥ १६ ॥

समाधान स्वरूप ।

सद्गुण पा मन थिर भयो, थिरता बलकी खानि । समाधान सोई कहो, छूटे मनको मान ॥ १७ ॥ मन इन्द्री तो वश भयो, उपरम तितिक्षा लार । शरघाते मन थिर भयो, समाधान कहि सार ॥ १८ ॥

कबीरपंथी शब्दावली २१