कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
सो सो ॥ पांच चारके जो बस आया। ते करताको चीन्ह न पाया ॥ पांच चार बस लावें जोई। सुबस बसें सो करता होई ॥
समै—पांच चार जग लूटे, कोई लिया न भेद। जग पंडित भर्मावई, पठ पठ चारों वेद ॥ बारह मास जुग चारो, नौ नायकके साथ। कहें कबीर किनहीं नहीं चीन्हा, झगरा चला जग हाथ ॥
रमैनी २१९—बाजीगिर एक बड़ा अन्याई। आप न नाचे जगहिं नचाई ॥ सब जग करे वाहीकी सेवा। घर घर गुरु पुजावें देवा ॥ बाजीगरकी कोइ खबर न पावे। नाचे जग जो नाच नचावे ॥ बाजीगरको लखे जो कोई। सो बाजीगरका गुरु होई ॥ बाजी खेलाय रहा संसारा। बिरला बाजी बूझन हारा ॥
समै—बिना रूप बिन रेख बिन, जगत नचावे सोय। मारे जांचे जो नहीं, ताहि डरे सब कोय ॥ डर उपजा जिय माहिं डरा, डरते परा न चैन। लेखा रामै देन है, यही कहें दिन रैन ॥
रमैनी २२०—तन धरके नर सुख ना पाया। हीरा जन्म बिन काज गँवाया ॥ योगी जंगम भया सन्यासी। जती सती बैराग उदासी ॥ वनखंडी ब्रह्मचारी ग्रेही। जहां लो जीव धरे जग देही ॥ पात पात सब दुखिया भाई। सुखमें दुख जग लीन उठाई ॥
समै—सुखका सागर मैं रचा, दुख दुख मेलो पांव। थित न पकड़ी आपनी, चले रंक औ राव ॥ दुख न हता संसारमें, हता ना सोग वियोग। सुखहीमें दुख लादिया, बोली बोले लोग ॥ सुख विलसो सुख विलसो, काटो भरमकी डोर। कहें कबीर पुकारिके, जगते होर बहोर ॥
रमैनी २२१—सांच कहों तो जग दुख पाई। झूठ कहों तो कहा न जाई ॥ सत् बात झूठ जग जाने। झूठ बात सत्के माने ॥ कहा हमार न माने कोई। पूत धरै है बापकी जोई ॥ सरगुन ब्रह्म