कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रमैनी २१५--गुन टूटे बेडा वह जाई। टूटे डोर पतंग न आई॥ घट फूटे जल औघट जैहै। काया गये जिव सुन्न समैहै॥ कला बूके नट जीव गंवाई। आप चीन्हे विन करता न पाई॥ दूध विनासे घिव ना होई। पुरुष विना सुत जने न जोई॥
समै-विन बूझे धोखे गये, तिरदेवा तिरलोक। थित ना पकड़ी सृष्टि यह, यही भया जी सोक॥ बहते बहते औघट गये, पाया घाट ना तीर। बही सृष्टि सब जात है, कासों कहैं कवीर॥
रमैनी २१६--उतपत प्रलय वहांकी न होई। रूप न रेख पुरुष न जोई॥ सूक्ष्म स्थूल न वंहे ठाऊं। अर्थ उर्ध निर्जन नाऊं॥ निराकार निरगुन वह देवा। यह उपनिषद देत है भेवा॥ चारो जुग सेवा चित लाया। निरगुन पुरुष न काहू पाया॥ एक होय तो कह समझाई। सकल सृष्टि ते कहा न जाई॥
समै-नारि वह अंग बिहूना, सुत कन्या भइ चार। माता विगडी सुतन ते, पंडित लेहु विचार॥
रमैनी २१७--जेठ मास जल जाय सुखाई। कुम्भका नीर कहांते आई॥ कहो विष सर्प कहाँते लाया। कहो मक्खी मधु कहांते पाया॥ गये चारा भीतर घांस कराई। च्छीर कहाँते गऊ वह दुहाई॥ अगिन काठमें कहाँते आई। पुष्पमें बास कहाँते भाई॥ सरमें ज्ञान कहाँते होई। करामात कहाँते सोई॥ बनखंड माहिं परा संसारा। हैं सब नेरे कहत निनारा॥
समै-नियरे रहा दूर अब भइ, भई वहांकी आस। कहैं कवीर गया तब तहवाँ, फिरके चला निरास॥
रमैनी २१८--पांच चार बैठे एक तीरा। तहां बसे परमहंस कवीरा॥ पांच चार मिल खेले पाला। तिनका भया हंस यह बाला॥ पांच चारके है यहते जो जो। किया करे इनका वह