कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
रमैनी २११--बिस्व रूप नया न होई । बीज वृच्छ गुन नया न कोई ॥ सत मिथ्या कछु नया न जानो । मती अवस्था नया न मानो ॥ इनही निरगुन सरगुन ठहराया । इन्हि कहा इनहीं लौ लाया ॥
समै-निरगुन पुरुष सरगुनका थापा, निरगुन बसा निनार । निरगुनमें यह सब अटके, कहत कवीर पुकार ॥
रमैनी २१२--वोई नैन वो वोई बैना । वोई कंथ कामिन सुख चैना ॥ वोई गुन तत्त्व वोई सब भाई । वोई प्रकृति वोई रस आई ॥ वोई करें औरहि ठहराई । पुरुष विदेही फिर जग समझाई ॥ ऐसी तजे पुरान न पंथा । तत्त्वमा सगरे डारे कंथा ॥ प्रगट जगतमें देत दिखाई । फिर फिर गुरुवा ग्रंथ सुनाई ॥
समै--अपनी सुरत बिसारिके, पढ पढ भया निरवान । जो जौन जाके बस परा, सो ताके आधीन ॥
रमैनी २१३--पांच तत्त्व गुण जीव औ देही । पचीस प्रकृति विकार सनेही ॥ तिनमें चार बरनको भाई । तेहि पंडित मोहि कहो समुझाई ॥ नांद बिंद जब जाय समाया । जीव सनेही भई यह काया ॥ माटीकी काया क्यों ठहरावे । अवरन बरन गुन बरन लगावे ॥ बरन लगाय गहे नोलावे । कहि कहि पंडित जग भरमावे ॥
समै-जीव ब्रह्म पर ब्रह्म ना, अरजन बरन शरीर । हिन्दू तुर्क दोळ मिल भूले, कहत पुकार कवीर ॥
रमैनी २१४--सब कोइ बात नहीं समझावे । कोइ ना मोहि वह देश दिखावे ॥ उदे अस्त लो वाहीकी बातें । हिन्दू तुर्क कहें कुसलाने ॥ सब जग वाहीते लौलाया । कर्ता न लखा जीव भर्माया ॥ षट दरसन छियानवे पारखंडा । लेके प्राण चढे ब्रह्मंडा ॥ वह देसवाकी खबर न पाई । बेद किताब सबन सुनाई ॥
समै-देव रिषी सुर औ गन गंधर्व, जच्छक किन्नर आद । कहें कवीर सब वहीं समाने, कर गुरुवा सो बाद ॥