कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
करो बिचारा॥ तत्त्व बित्त ते न्यारा जोई । जानो काल तुम्हारा सोई॥ राखे तत्त्व तो तत्त्व समाई । तत्त्व बिना जीव मर जाई॥ देखो तत्त्वमें बित्त समाना । तत्त्व बित्त काहू नहीं जाना॥ तत्त्व बित्त आगम टकसारा । तत्त्व बिना नहीं करता न्यारा॥ तत्त्व बित्तका जाने भेवा । आपहिं करता आपहिं देवा॥
समै--तत्त्व बित्त निज सार है, झूठा अपरंपार । पार उतर कोइ ना गया, परख देख टकसार॥ खंड अखंडित खंड है, खंडित दूजा खंड । कहें कवीर घरमें रहो, खाली है ब्रह्मंड॥
रमैनी २३६--अच्छर पांच ब्रह्मंड अपारा । तिनही बीच कवीर बिचारा॥ तेहिमें अक्षर एक जो सुकता । तेहिका जाने कोई जुगता॥ मा-के ऊपर क-के नीचे । परखो ज्ञानी तत्त्वके बीचे॥ दूसरे ठौर न वहाँ पर कोई । यह बिध जाने सुकता सोई॥ ना जाने यह कोई भेदा । सब जग गावे चारों वेदा॥ बीजहिमें अंकूर समाया । सो अंकूर बीज ले धाया॥ करता माया बीज अंकुरा । बूझो ज्ञानी यह मत पूरा॥ बीज ते रहा अंकूर निनारा । ऐसा देखो राम बिचारा॥ है सबमें और सबते न्यारा । अगम अगोचर कथा हमारा॥
समै--सरवन्न ज्ञान प्रज्ञान नहीं, देखो तत्त्व बिचार । पछा पछीमें जन परो, मानो कहा हमार॥ आदि अंत दो मत हैं, तिनमें मता अनंत । कहें कवीर दोनोंके मध्यमें, देखो हमारा तंत॥
रमैनी २३७--तत्त्व बित्त जो हमरा पावे । चौरासीका अंक मिटावे॥ द्वादस सोडस अष्टादस सोई । सहस्र दो दल औ चतुर विगोई॥ यही नहीं और जो न्यारा । तेहि गुरुवाका झूठ बिचारा॥ झूठे झूठ मिला सब कोई । झूठी बात बहुत सुख होई॥ सांच कहो तो कहा न माने । बूझ न परे तब झगरा ठाने॥ झगड झगड सब मर गये भाई । झगड झगड सब वहीं समाई॥