कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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समै--मता अखंड पारखंड छियानबे, देखो अपने नैन। कहैं कवीर दृशे बिना, जनि पतियाओ बैन॥ जब आपन करता लखो, सरवह होय तब ज्ञान। कहैं कवीर करता भया, मेटा सरब व्याखान॥
रमैनी २३८--देह धरे विदेह कहावे। करम करे करता न कहावे॥ जगमैं रहे औ रहे निनारा। ब्रह्मांड मध्य है नाहिं बिचारा॥ ज्ञान ध्यानमें नाहीं आवे। इच्छा करे न इच्छा पावे॥ सब कछु करे वो नाहीं करता। ना कछु धरे वो नाहीं धरता॥ माता पिता न बंधू भाई। सुख संपतमें रहा समाई॥ है संयोगी फिरे बियोगी। सदा अनंद फिरे कह रोगी॥
समै--देखो तत्त्व विचारिके, केहि घरमा है करतार।
कहैं कवीर सदा तुझहीमें, कैसे भया निनार॥
रमैनी २३९--निनार निनार कहैं सब कोई। कोइ न देखे वह कैसे होई॥ अविगत पुरुष जो अगम अपारा। परले उतपत नाहिं दिदारा॥ अष्ट लोक सब जगत बतावे। पांच देवका भाव ले आवे॥ करनी सर ठहरावे भाई। जो नाहीं तासों लव लाई॥ दोमें अटका सब संसारा। लोकालोक जहां बिस्तारा॥ लोका लोककी गत है न्यारी। पारस पिया निरंजन धारी॥ दिरग औ बैराग अपारा। स्थूललिंग औ जोत विचारा॥ मुच्छम औ दस अंगुल कहाया। चतुरभुजी अंगुष्ठ पर लाया॥ सहस्रा रिषि औ अवगत देवा। ताते भया सकल यह भेवा॥ नेत नेत करके ठहराया। निराकार आकार बताया॥
समै--कर बियोग वहि पुरुषको, छांडो यह संसार।
कहैं कवीर न हाका गया, आपन क्यों न बिचार॥
रमैनी २४०--महम्मदका है यह फरमाना। एक दिन क्यामत होय निदाना॥ करनायत निकसे अवाज अपारा। रुईसे उड़ई