कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(६२२)
कवीरपंथी-
बृच्छ पहरा ॥ हफ्त जमीन हफ्त असमाना । धूमसे उडे यही फरमाना ॥ कापर तरुत रहे ठहराई । कहाँ उम्मत जो रसूल छोड़ाई ॥
समै--ले फरमान महम्मद आये, उम्मत किया कबूल । कहो अल्लह क्योंकर रहे, बिना साख बिन मूल ॥ आग दोनों घर लागी, कैसेहु नाहि बुझाई । कह कवीर ये दोनों अगुवा, दीन्हा जग भर्माई ॥ बैकुंठ धाम ब्रह्मा रचा, भिस्त महम्मद कीन्ह । ब्रह्मा दीये ब्राह्मनन, महम्मद तुर्कन दीन्ह ॥
रमैनी २४१--दीनके काजे अल्लह पठाया । ले फरमान महम्मद आया ॥ तिन फिर दुसरी राह चलाई । रोजा नमाज़ बांग ठहराई ॥ कलमा कुल मंत्र ठहराया । देहरा फोर मसजिद उठवाया ॥ तिन फिर कीन्हा मक्का मदीना । किबला कावा कुरान सफीना ॥ तिन फिर कीन्हे चार जो यारी । हराम हलाल औ पाये चारी ॥ सुरगी बकरी घोडा गाई । इनके तिन तकवीर बताई ॥ तिन फिर फिर हिंदू तुर्क बताया । हिंदू पर जजिया फरमाया ॥ तिन तन छूटे गोर गड़ाया । पीर औलिया अंबिया ठहराया ॥ तिन बेचून अल्लहको कीन्हा । आप चून हुकुम यह दीन्हा ॥
समै--अल्लहके दोस्त महम्मद, ते लाये फरमान । मुसलमान होवो सब कोई, पेट ते हो मुसलमान ॥ अल्लहका नूर पैगम्बर, नबीका नूर जहान । मुसलमान भिस्त जायगे, दोजख परे हिंदुवान ॥ खुदा महम्मद एक है, सबही कहो विचार । सबे परे भर्म जालमें, कहै कवीर पुकार ॥
रमैनी २४२--अल्लह एक महम्मद जाना । अल्लह ते दूर रहा हिंदुवाना ॥ ब्राह्मन ब्रह्म मिले सब जाई । तीन बरन अधविच रह भाई ॥ अल्लह मुकाम पश्चिमै कीन्हा । राम मुकाम पूरबमें लीन्हा ॥ दिवाले बसे चल सालिग्राम । मसजिद अल्लह किया