कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 610, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(५९६)
कबीरपंथी—
रमैनी १६६--राम कहत जग गया हेराई । राम कहत गये बाप औ माई॥ राम कहत तन धन खोया । राम कहत दिन रैन न सोया॥ राम कहत तज चला घर बारा । राम कहत बन आसन मारा॥ राम कहत सब जनम गँवाई । राम कहत आप फिर जाई॥ राम कहत मरा संसारा । राम कहत घर बार उजारा॥ राम कहाय राम नहि जाना । राम लखे विन भया दिवाना ॥
समै-राम राम सब कोइ कहे, रामते परिचे नाहिं ।
बांझ झुलावे पालना, कहु का सुख वहि माहिं ॥
रमैनी १६७--पूजत पूजत जन्म गँवाया । रामका खोज काहू नहिं पाया ॥ रमता राम अरमता लागा । रामका खोज न लखे अभागा ॥ बस्ती छोड़ उजार जग जाई । तौहुँ राम मिलत नहिं भाई॥ रामकी गत कोइ बिरला जाने । सो ज्ञानी जो राम पहिचाने॥ राम न जाना राम समाया । रामहिं मिला बहुरि नहिं आया ॥
समै--आँगनबेल अकास फल, अनब्याईका दूध । ससा सींगका धन ककरी, रमै बांझका पूत ॥ खोजत २ दिन गया, मिला न निर-गुन वीर । षट् दर्शन पाखंड छानवे, रहे त्रिय देवन तीर ॥
रमैनी १६८--पंडित हाथ ग्रंथ ले आया । राव रंक को पुरान सुनाया ॥ अकासके परे वैकुंठ बताया । तह भागवत रहेस रचाया ॥ मानसरोवर है तेहि ठाँय । कल्प वृक्ष एक है वहाँ गाय ॥ कामधेनु वहां एक गाई । जो चाहे सो केल कराई ॥ जप तप पूजा करे जो कोई । वैकुंठ लोक सो प्राप्त होई ॥ जो कोइ बात अधर्मकी कराई । सो प्राणी यमलोके जाई ॥
समै--लै पुरान सब को समझावै, सबहीं लीना मान ।
कहे कवीर चला सब कोई, अंधरेकी पहिचान ॥
रमैनी १६९--जनम संदेशा पंडित लाये । जमपुरका सब भेद