कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(५७५)
जहां बसें ये दोनों नारी, तहां नहीं विश्राम । कहें कवीर इनको संग छाड़ो, यही तुम्हारो काम ॥
रमैनी १०९-षट् दर्शन सुनो चितलाई । करताके गुण चेतो भाई ॥ दयावंत शीतल मुख बैना । धर्मसरूप सदा सुख चैना ॥ निहकर्मो निरद्वंद सुधर्मा । सदा संतोषी कर्म सुकर्मो ॥ सब जीवनकी करे नित चिंता । मतबादी धीरज अतिवंता ॥ सदा अनंद धीरज दुख संसा । कोमल बचन सरब गुण हंसा ॥ चेतन सदा सरब कछु सूझे । परगट गुपुत सब ज्ञाने बूझे ॥
समै-अनखाया खानीको पीवे, देखे सुने हजर । नख सिखते पूर्ण बना, तासो कहत जग दूर ॥ सब गुन भरा सृष्टिका करता, निरगुन कहो नकोय । कहें कवीर प्रगट जग भीतर, भर्मत पुरुष औ जोय ॥
रमैनी ११०-षट् दर्शन सुनो बचन हमारा । उनके गुन हैं अगम अपारा ॥ मिथ्या बचन संसा विपरीता । खज अखजसे बहुत प्रतीता ॥ निर्दया अमती अकर्मो । सदा अधीरज सदा अधर्मा ॥ कामवंत तामसकी खानी । नाटक चेटक अगमठानी ॥ सदा निलज्ज दयामें हीना । छल औ छिद्र महा प्रवीना ॥ चञ्चल चपल निरमती माया । अधिक गिरामनी सब जग खाया ॥
समै-सुर नर मुनि पशु पंछी मारत, डार आपने जाल । कहें कवीर यह महा अपर्वल, विरले बांचे विचार ॥
रमैनी १११-करता सबका सिरजनहारा । जान बूझके होते न्यारा ॥ जलगी सदा जलहिमें रहते । उडरान सदा जल मध्य दिखते ॥ जलगीरी पकड़ जाल जब आये । जब जलगीरी यहै सब चितलाये ॥ हम जानीकी साथ हमारे । अब हम जाना हते ।
(५७६)
कवीरपंथी-
निनारे ॥ ज्यों कंवला जल परसत नाहीं । त्यों साधू रहते जग माहीं ॥
समै-जग बांधा जंजीर कर्मके, छूटा नाहीं कोई । कहैं कवीर बंधा नहीं, साध जानिये सोई ॥
रमैनी ११२-गुरुवा सिधु राम कहाई । इन संसार ठगा सब भाई ॥ बैठ एकंत पाखंड बताया । निरगुन सरगुन दोय भेद बताया ॥ निरालम्ब आलम्ब न सांगा । कहैं जलाते हम बितरागा ॥ अंतर भरम मिटे नहीं भाई । निसदिन रहो निरंकार समाई ॥ सब जग मिलके सीस नवावे । तब गुरुवा एक बचन सुनावे ॥ यहि जगते हरि रहा निनारा । विरला कोई बूझन हारा ॥ ब्रह्मा विस्तु महेश्वर देवा । तिनहु लखा नहीं यह भेवा ॥ ऐसा बचन कह जग भरमाया । यहि गुरुवाका भेद न पाया ॥
समै-रामनगर गुरुवा बसा, माया नगर संसार । कहैं कवीर यहि दो नगरते, विरले बचे विचार ॥ पाप पुन्य गुरु कर्म हरि, वैकुंठ लोक निजधाम । ये तो सब ऊपर परे, बूझो आतमराम ॥
रमैनी ११३-जात पांत तज मूँड़ मुँडाया । तिलक छाप दे भगत कहाया ॥ मूँड़ मुँडाय गुरु होय खेला । नर नारी सब कीन्ही चेला ॥ भये महंत सिखापन कीन्हा । निरगुण मंत्र पाठ लिख दीन्हा ॥ सेवा पूजा बहुत बताई । तन मन धन लीन्हो अरपाई ॥ करताको अकरता बतलाया । अकरता सो करता लौ लाया ॥
समै-करता ते यहि भयो अकरता, गुरुवाके उपदेश । कविरा कोइ लावे नहीं, करता केर संदेस ॥
रमैनी ११४-जो ब्रह्माको दियो संदेशा । सो विरंच गुरु दियो उपदेशा ॥ धाती चौका मंत्र असनाना । फूलसुं भूषण देव रचाना ॥
शब्दावली
(५७७)
काष्ट पषाण धात ले आये । तिनकी प्रतिमा आप बनाये ॥ गुरु होय फिर चेला होई । पूजे प्रतिमा पुरुष औ जोई ॥ धातू पूजे धात होय भाई । पषाण पूजे पषाण होय भाई ॥ जलके पूजे जल होय जाई । अगिनो पूजे अगिन समाई ॥
समै-रमता रामे छोड़के, जो पूजे पाषाण ।
तिन करता नहि चीन्हिया, अंत पषाण समान ॥
जैसा गुरु सिखापना, सिक्ख चला सोह चाल ।
कविरा इन सब खोइया, वे सब भये निहाल ॥
रमैनी ११५-कहो पंडित जो आहि अकरता । तो कैसे भयो जगतका करता ॥ कर नाहीं कैसे जग कीन्हा । रसना नहीं कैसे रस लीन्हा ॥ पांव नहीं कैसे कहि जाई । उदर नहीं कैसे कुछ खाई ॥ सरवन नहीं कैसेक सुनाई । हिया नहीं कैसेक गुनाई ॥ नैन नहीं देखत कैसाही । जीव नहीं कस जीवत गोंसाई ॥
समै-जाके पंडित प्रान है, जग कीन्हो बिस्तार ।
जो रूप धरे करता अहै, ताको कीन निनार ॥
जो करता तेहि नहि सेवे, यह लोगोंकी बूझ ।
कह कवीर आरसी अंदर, परा अंधेरे सूझ ॥
रमैनी ११६ हता आप दूजा परमाना । देख आपको आप बुलाना ॥ उझका सिंह कूपमें जाई । कांच मंदिलमें स्वान घहराई ॥ फटिक सिलामें जग अरुझाना । प्रतिबिंब देख आप भरमाना ॥ हता आप दूजा ठहराया । आप तजि दूसर लौ लाया ॥ यह तन जीव अकारथ खोया । यह नर चरित्र देखके रोया ॥
समै-समाधि लाय सब जग बैठा, चला संग ले प्रान ।
कविरा तब भ्रम ऊपजा, देखा और निसान ॥
कवीरपंथी शब्दावली १९
(५७८)
कवीरपंथी-
रमैनी ११७-संग बूझो तुम आपन योगी । संग बूझे बिन भयल बियोगी ॥ संग बूझे बिन चढो ले प्राना । घर आपनमें देखु निदाना ॥ पांचवों ले चढे अकाशा । कहु जोगी क्या होय तमासा ॥ सुखमन घाट उतर जब जाई । ब्रह्मंड प्राण ले रहा ठहराई ॥ कछु एक दिन तुम वहाँ खराने । आपन मठी ले आप उड़ाने ॥ दूठी डोर चले पंच प्राना । दूँदत दूँदत आप हिराना ॥
समै-बूझो जोगी आपको, बूझब सो यह देश ।
कह कवीर न जाय न ऐवै, बहुर न मिल संदेस ॥
बहुत गये सो कोइ न आया, कासो पूछो बात ।
कहे कवीर बिना हरि परचे, सकल सृष्टि बही जात ॥
रमैनी ११८-समझो योगी आपन भेसा । छोड़ नगर यह चले केहि देसा ॥ पूरक कुंभक रेचक पौना । सोहं साथ चले कर गौना ॥ दस नारी तज सुखमन घाटा । सहस्रदल पंकज बैठ निराटा ॥ अनहद सुन प्रतीत जिय आई । रंकार धुन दीन सुनाई ॥ आप देख दूजा कर माना । चक्र बेध त्रिभुवनको जाना ॥
समै-खलबल पड जोगी नगर, छोड़ चला जब गांव ।
तेतिस आप रहे न्यारे, सुन्न पडा सब ठाँव ॥
रमैनी ११९-पंच सुद्राका आसन कीन्हा । जोग जुगत करि निरगुन चीन्हा ॥ त्रिवेनी घाट उतर जब गयऊ । प्रतिबिम्बका दर्शन भयऊ ॥ बाजा बाजे अनहद बानी । कुंडलनी सकती तहां पटरानी ॥ धरनि अकासते लागी डोरी । चला दिसंतर होर बहोरी ॥ पंच चार तज बैठ निराटा । योगी उतरा अजपा घाटा ॥ सोहं तजि मन धर निरबाना । सुन्य नगरजी आय तुलाना ॥
समै-खालि देखके भर्म भय, दूंद फिरा चहुँ देस ।
दूंदत दूंदत मर गया, मिला न निरगुण भेस ॥
शब्दावली
(५७९)
बूझ आपको थिर रहे, योगी अमर सो होय । आप बूझे भरम तजे, आपइ और न कोय ॥
रमैनी १२०—पैतापुरकी लुंवठ रानी। तिन ब्रह्माते कही कहानी ॥ अनहद अपजा जोग अभ्यासी। सुन्न नगर आसन चौरासी ॥ पंच वायुमें जग अरुझाना। षट चक साधि कीन पयाना ॥ तीनसौ साठ स्वास ठहराई। कुंडलनी सकती साध ले जाई ॥ प्राणायाम धारना साथी। जोग जुगति तेहि करे समाधी ॥ दस अंगा दस करे जो भंगा। पंच चार नौ सोरह संगा ॥ छ पर संग दोय पर भाई। आठ बहतर बावन आई। दो हजार सत्रहसौ साता। चार चार चारकी बाता ॥ एक्रीस हजार छै सौ तेहि डोरी। चले दिसंतर होर बहोरी ॥ बारहे नासुक सोरहे सेसा। चार ब्रह्म नाभ नौ परदेसा ॥ आठ अकाश परम तहँ पाई। ग्यारह भक्ति तेरहे ठहराई ॥ एक सौ बीस साठको योगा। तैतिस कोटि डेढसौ भोगा ॥ समाध लायके चला हरि तीरा। जुगत नेत्र त्रिवेनी तीरा ॥
समै-जोग करे ते मर गये, दसो दिसा भइ सुन्न। कहें कवीर जुगति चीन्हले, जो छूटे वह धुन्न ॥ घट फूटा निकसा कुंभते, ढरक गया सब नीर। घट राखे जल घट रहे, कहहिं पुकार कवीर ॥
रमैनी १२१—यह घट रत रतनकी खानी। घटमें आप आप घट ठानी ॥ घट बिन जल कहो कहाँ रहाई। बिन घट जल नहीं है भाई ॥ घटमें जल जल घटते न्यारा। घट बूझे घट बूझनहारा ॥ घट फूटे जल जाय हेराई। जब लग घट तब लग जल भाई ॥ घटको खोजो पंडित ज्ञानी। बिन घट जाने रहे न निसानी ॥ घट खोजे घट माहिं समाई। बिन घट खोजे जल बह जाई ॥ चेतन
(५८०)
कवीरपंथी-
करो घट जाय न फूटी । सुरतकी डोर जाय न टूटी ॥ गुन टूटे औ घट बह जैहै । औघट गये घाट न पैहै ॥
समै-सहस्र घाट जल भर रखो, फूटे सहस्सर घाट । घट फूटा तो फूट भय, भया न नर तल पाट ॥ घट बाहर घट अंदर, घट है जीवन मूर । घटमें जल पूर रहे, औघटमें जल दूर ॥
रमैनी १२२-जुग २ जोगी जुगत कराई । जुगत लखे विन जम ले जाई ॥ जोगी सोई जुगत सो माने । जुगत जान अलख पहिचाने ॥ उवाव अनंत जाने भाई । तेहि जोगीको काल न खाई ॥ सोहं हंसा हमही भाई । सोहं मिले सोई हम पाई ॥ नगरी अपनी सुवस बसावे । प्रजा लोग दुख नहीं पावे ॥ प्रजाके बस होवे ना राऊ । राजा दुख न देवे काऊ ॥ सो जोगी सो जुगत सयाना । आप जान दूजा नहि जाना ॥
समै-जेहि पारस ते पारस भये, पारस जानो सोय । पारस कनक लोहा भया, सो पारस ना होय ॥ वह पारस तुम खोजो, जेहि पारस सब खान । कहैं कवीर सुन पंडिता, पारस ले पहिचान ॥
रमैनी १२३-काया नगर सो नगर हमारा । घर अपना हम कीन्ह संसारा ॥ घरही में है देव औ देवी । घरहीमें है भेव औ भेवी ॥ पाप पुन्य घरहीमें रहते । घरहीमें रैयत औ महते ॥ घरहीमें वृच्छ बीज अंकुरा । घरहीमें चंदा औ सूरा ॥ तीन लोक घरहीमें छाया । घरते बाहर किनहु न पाया ॥
समै-जो घर जावे आपना, करता पड़े तेहि सूझ । कहैं कवीर सुन पंडिता, घर अपनेको बूझ ॥
शब्दावली
(५८१)
गुह कहते जस ब्राह्मण चले, ग्रह पड़ा नहिँ चीन्ह ।
यहां वहांकी दोउ गंवाई, जीव अकारथ दीन्ह ॥
रमैनी १२४—सब संसार समाधि लगाई । निराकार लो कोइ न जाई ॥ रहिगो पंथ थकित भौ पौना । दशो दिशा उजार भौ गौना ॥ बस्ती छोड जेहो नर कहवों । जेहो तो नहि छेहो जहवों ॥ खेहोका वहां अन्न न पानी । बोलिहो कासो वहां नहि बानी ॥ सुख नहि भोग दिवस नहि राती । पांच तत्त्व निरगुन बैदाती ॥ जीव न सीव कर्म न काया । पाप न पुन्य वृच्छ न छाया ॥
समै-चेतो किन तुम चेतो अबहुँ, जहाँ नहीं वहाँ गाँव ।
कहे कवीर अबहीं मिल करते, अब न मिटावो नाम ॥
रमैनी १२५—ब्रह्मा कुलाल गढे संसारा । तिनमा जीव दिये करतारा ॥ जीव देके लिखे बनाई । सोई भोगता भुगते भाई ॥ परालबध संचित कर्माना । अक्षर तीन लिखे भगवाना ॥ चाहे सुता चाहे करबारी । श्रीरामकी बातें न्यारी ॥ चहता सोई कीन्हा करता । चहिये सो दूरम सो हरता ॥
समै-मातु न होती पिता न होता, होता रुधिर औ नीर ।
कहैं ते आवत पंडित, ऐसा अनूप शरीर ॥
तत्त्व भये संयोग दोउ, निहतत नाही कोय ।
कह कवीर सो फल उपजे, तत्त्व अधिक जो होय ॥
रमैनी १२६—सुन्य न हता सुन्य सब कीन्हा । जीव न हता जीव सिव दीन्हा ॥ पाँचों तत्त्व हता न कोई । दिवस न रजनी पुरुष न जोई । निरगुन पुरुष हता निरंकारा । तिन सिरजा यह सब संसारा ॥ निराकार निरगुन कस देवा । कैसे सुन्य कहो किन भेवा ॥ लौटके कथा कहें ब्रह्म ज्ञानी । निरालम्ब निरगुनकी बानी ॥ निराकार आकार न कोई । निरगुनते गुनना होई ॥ सुन्य हते
(५८२)
कवीरूपंथो-
नहिं देखन हारा । यह विध रचा सकल संसारा ॥ जो बीजामें लखा सरीरा । वो था साहेब सुनो कवीरा ॥
समै-जो अकार गुण कर्म धरे है, सो निराकार नहिं होय ।
फल फूल पत्र औ साखा, बिरला देखे कोय ॥
यही सरूप करताको, ज्ञानी अंते नाहिं ।
कहैं कवीर परो जन संशय, गगन मंडल कछु नाहिं ॥
रमैनी १२७-पवन सरूपी अगम अपारा । सब घट पूरन सबते न्यारा ॥ पुहुषकी वास दियाकी जोती । पवन सरूप पिरे तन होती ॥ शब्दके रूपमें हरदिकी लाली । विस्तुका रूप ज्ञान गुणचाली ॥ काशीकी धुन करो बिनाना । निराकार निरगुन तिन जाना ॥ सोहं हंसा जाने सोई । सोहं हंसा सोइ जिव होई ॥
समै-बिना पुहुष नहिं वास है, बिना बीज नहिं कोय ।
बिना तन सोहं शब्द नहीं, बिरला बूझे कोय ॥
जीव ब्रह्म परब्रह्म नहीं, सुंदर धरे सरूप ।
कहैं कवीर जाव घट एके, ऐसा ख्याल अनूप ॥
रमैनी १२८-ज्ञानी आपन करो विचारा । जो तुम मानो कहा हमारा ॥ चार शरीरको छोड़ो ज्ञानी । करताका कछु करो बीनानी ॥ सूच्छम अस्थूल न कारन महा कारन । चार अवस्था नाहिं निहारन ॥ गुण औ कर्मकी करो न संसा । तुम करता निह केवल हंसा ॥ देव आद तुम कहो ब्रह्मज्ञानी । करता पुरुषकी साज समानी ॥ बूझ विचार गहो अस्थाना । निरगुन पुरुषका करो न ध्याना ॥
समै-निवृत्त परवृत्ति दोय मारग, तेहि अटका संसार ।
कहैं कवीर दोनों नहीं, समझो बूझ विचार ॥
रमैनी १२९-चार फल कौन कहां तुम देवा । अवस्था चार कहां तुम भेवा ॥ कौन बूच्छ जेहि यह फल लाग। जेहि कारन
शब्दावली
(५८३)
तुम भये अनुरागा॥ अरथ धर्म काम मोच्छ भाई। जाग्रित स्वप्न श्रुपोपत ताई॥ अच्छे वृच्छ एक पुरुष अपारा। तहां यह फल है चार निनारा॥ मारग कठिन न कोई जावे। गगन चढे सोई फल खावे॥
समै-केहि कारण करनी करे, कहाँ वृच्छ फल चार।
सबे पड़े भ्रम जालमें, कहैं कवीर पुकार॥
रमैनी १३०-दिनके रैन विषै जब सोई। भूले आप भूले सब कोई॥ नाना विधिके उठे तरंगा। अदभुत ख्याल दिखे बहुरंगा॥ इन बातनकी खबर न जानी। पार ब्रह्म कैसे पहिचानी॥ कैसे खबर वहांकी पावे। अपने घटकी लखे न लखावे॥ औघट घाटी अगम अपारा। सो पावे जो उतरे पारा॥
समै-मन जिवका संजोग तन, मनके अद्भुत रूप।
जाग्रित स्वप्न भरमावे, लीला रचो अनूप॥
जाग्रित जाग्रत सांच है, सोवत सपना सांच।
कहैं कवीर मन ना बसे, जहां तत्त्व नहीं पांच॥
मन यह जागत है नहीं, यह मन यही शरीर।
रैयत होय तिनमें रहे, कहैं पुकार कवीर॥
रमैनी १३१-यह है गगन जापर बहु रंगा। नाना विधि को उठे तरंगा॥ चौरासी कहो कौन विधि भाई। कौन अस्थान जीव ठहराई॥ पांच तत्त्व कहो किन भेवा। भेला बांधे निनारे देवा॥ त्रिगुनकी उत्पत्ति कहो सोई। निराकार कस करता होई॥ दोमें को जग सिरजनहारा। नांदे बिदे क्या ब्योपारा॥ सहस्रका कहो का अर्थ बूझ। निराकार निरगुन कैसे सूझ॥ ऐसा ख्याल अनूप हमारा। जो बूझे सो सिरजनहारा॥
समै-सबरा आतम आप हमारा, इनमें नाहिं विसेख।
हम जाने सो यह गुन बूझे, पावे पुरुष अलेख॥
(५८४)
कवीरपंथी—
जिन जाना यहि भेदको, रहे सोई ठहराय । कहँ कवीर सो रहे निनारे, लिया जिन्हे जम खाय ॥
रमैनी १३२—राम कहा यह कहे जो कोई । जो करता सो यहु होई ॥ करता रहा जो सबै समाई । वोकर राम रहा बिलमाई ॥ पंच तत्त्व करताको बासा । यह विध राम न होय बिनासा ॥ बीजमें बृच्छ रहे ठहराई । त्यों यह बूझ एक है भाई ॥ सो कत होय यह कहे जो कोई । जल पाषाण अगिनको होई ॥ सुरत मरे तो यह मर जाई । दोहरा नौतम कैसे पाई ॥ संजोगी जो सृष्टि उपाई । अद्वुत तन जिव कहँसे आई ॥ राम न करता करता काहा । यह करता तो बूझन माहा ॥ दे शब्द उत्पन सुस्थाना । दोऊकी बूझ एक घर जाना ॥ बूझ दोऊकी सुन्न समानी । तत्त्व अधिक इच्छा कित मानी ॥ जो यह करता सृष्टिको होई । प्रगट गुप्त कहे सब कोई ॥
समै—यह करता बिन बूझ हेराना, ताते भया अकास । तत्त्व न मिला मत समुझा, लीन्हा तहाँ निवास ॥ जो गुन पावे तत्त्वको, तत्त्वे जाय समाय । कहँ कवीर अमर तब होवे, कहीं न आवे जाय ॥ तन जियरा यह तेरा, कबहुँ नास न होय । कहँ कवीर सुरति मिले, यह गुण बूझे सोय ॥
रमैनी १३३—परकाया प्रवेस कराया । बाल बृद्ध तन दिख- लाया ॥ एक रूपमें धरे अनंता । पर दिलकी पहेचाने चिंता ॥ पूरवमें परिचय दिखलाई । पृथ्वीते अकास सिधाई ॥ धरन ते बाढी जाय अकासा । लीला अनूप रचे बहु पासा ॥ ऊँ बीज मैघ दिखलावे । धरती बूडे पवन चलावे ॥ चाहे जो ले आवे सोई । चाहे पुरुष चाहे होय जोई ॥ दसो दिसाकी बातें करई ।
शब्दावली
(५८५)
चाहे करे जोई चित धरई ॥ जो कोइ मांगे सोई देई । जहाँ ते जो चाहे सो लेई ॥
समै-अस्थान न जाने जीवका, भगति परी नहीं चीन्ह। यही विडम्बना भरमके, जीव अकारथ दीन्ह ॥ स्वारथ इनमें कोइ नहीं, ताते रामहि जान। कहँ कवीर यह भगती बूझले, बहुर न रहे बंधान ॥
रमैनी १३४-जैसे खर औ तैसे गार्ई। जैसे नारी तैसे माई ॥ जैसे सोना तैसे लोहा। जैसे मोहा तैसे निरमोहा ॥ जैसे क्रूर तैसे हस्ती। जैसे ऊसर तैसे बस्ती ॥ जैसे पंडित तैसे चंडाला। जैसे करता तैसे काला ॥ जैसे मुत्र है तैसे पानी। जैसे चेरी तैसे रानी ॥ जैसे पाथर तैसे मोती। जैसे आंधर तैसे जोती ॥ जैसी नदी औ तैसे नारा। जैसे हलाल तैसे सुरदारा ॥ जैसे मीठा तैसे विष होई। जैसे अन्न तैसे मल सोई ॥ जैसे फल है तैसे माटी। जैसे सक्कर तैसे चांटी ॥ जैसे सिंह तैसे बकरी होई। जैसे गुरू तैसे सिख सोई ॥ जैसे असुर तैसे देवा। जैसा फल है तैसे देवा ॥ जैसे बास तैसे कुवासा। जैसे बरहा तैसे धरन अकाशा ॥
समै-एके भया एक कहाया, एके रहा समाय।
कहैं कवीर नहीं करता पाया, जियरा दिया गँवाय ॥
रमैनी १३५-गुन कर्म बिहुना राम न सोई। यह गुन जाने विरला कोई ॥ काया इच्छक दया सरूपा। मन उपमान स्वेत नहीं धूपा ॥ समै पाय बिन तत्त्व न देई। पर चोरी कर बस्तु न लेई ॥ सत् कहे औ धरमहि जाने। पर निंदा नहीं जीमें आने ॥ पांचो पवन एक घर लावे। नौ दस बारह तीन मिटावे ॥ तीन राखके तीनों मारे। पचीस पांच षट सात उचारे ॥ सुखमनमें जब बास कराई। प्रगट गुप्त सब अजमत पाई ॥
(५८६)
कवीरपंथी-
समै-अजमत कछु हांसी नहीं, अजमत कर्म अधीन। करामात करम चीन्हें, सो ज्ञानी परबीन॥ करना हता सो कर चुका, सब दिखलावे सोय। कहैं कवीर करता नहि जाना, अजमत करे क्या कोय
रमैनी १३६-अजोध्या नगर बसे एक राई। तिनके राम औतरे आई॥ जनक सुताते कीन विवाहा। कैकई बचन गये बन माहा॥ कनक पुरीका रावन दूता। सो बनमें हर लैगा सीता॥ कनक मिरगा राम भुलाने। रोवत बन बन फिरे सयाने॥ पंपानगर सुग्रीव सहाई। कनकपुरी हनुमान चढाई॥ जीते राम रावणा हारा। त्रिभुवननाथके यह व्योहारा॥
समै-करता पुरुष राम ते परे, क्यों भुले अम जाल। कहैं कवीर पूछों तोहि पंडित, काजी जीतो हाल॥
रमैनी १३७-सीताराम सुमरत सब कोई। सीताराम बिन मुक्ति न होई॥ सीतारामकी गति नहि पाई। सीताराम रहा जग छाई॥ धरती छोड़के बसे अकासा। यह गुन देखो राम तमासा॥ सीताराम रचे संसारा। कंठी माला तिलक लिलारा॥ कनकपुरीका रावन राई। सीता जीता करी लड़ाई॥
समै-आस पास घन तुलसी बिरवा, तेहि बिच सालिग्राम। हते देव पाथर भये, यह करताके काम॥
रमैनी १३८-रामचंद्रके यह व्योहारा। पिता पुत्र तिनहु रन डारा॥ बालमीक घर सिया बियानी। लव कुश भये भरत सिय पानी॥ लछमन बूझे सियासे माई। डार हडावर फिरे रघु-गई॥ रामचंद्र कारण कर रोया। दुखी भये दिन रैन न सोया॥
समै-नित बूडे नित ऊछरे, शोभा कहो निहार। आप बुढे मँझधारमें, उतरत सब संसार॥ सब जग डूबा राम नाम कहि, रामके बिन पहिचान। जो तू चाहे अमर भया, तो तैं रामहि जान॥
शब्दावली
(५८७)
रमैनी १३९-रामनाम चढ बुड़ा कवीरा । एको हंस लगा नहिं तीरा ॥ रामनाम सुमरण चित दीन्हा । रामरूप काहु नहिं चीन्हा ॥ एक रामनाम दसरथ गृह आया । सो जगते आकास सिधाया ॥ एक राम घरा घर कीन्हा । एक राम सो ना पर चीन्हा ॥ एक राम नित पीवे खावे । जगको देखे जगै दिखावे ॥
समै-इनमें राम जो सांचा, तेहि राम ले चीन्ह ।
रामनौमी भया राम कवीरा, जिसका यह तन कीन्ह ॥
रमैनी १४०- रामनौमी भया राम कवीरा । घर घर बाजे झांझ मजीरा ॥ सबके पिता पुत्र भैं आई । अजोध्या नगर करे ठकुराई ॥ उत्पत्त प्रलय जिनकी न होई । उत्पत्त प्रलय आये सोई ॥ उपजे न बिनसे आवे न जाई । अजोध्या नगर करे ठकुराई ॥ अन्न न खाय पीवे नहिं पानी । आराकार घर उतरे आनी ॥ आरति मंगल पढे पुराना । जो जन्मा सो किनहु न जाना ॥
समै-निराकार आकार भय, नाम धराया राम । राम कह कह जग गई, काहु मिला ना राम ॥ राम भगति जिन जानी, रामे चीन्हे सोय । कहैं कवीर वह भगत भय, आवा गवन न होय ॥
रमैनी १४१-मथुरा नगर सो बसे कन्हाई । गोपी ग्वाल जुरे सब आई ॥ कंसे मार जमी पर डारा । उग्रसेनको राज बैठारा ॥ करताके यह काम न होई । जो जिव मारे दूजा सोई ॥ काहुकी अङ्गिया काहुका चीरा । ऐसे काम न करे कवीरा ॥
समै-ये तो काम नहीं करताके, यह सब मनके काम ।
कह कवीर मनही जे मारा, जीते आतमराम ॥
रमैनी १४२-राम मंदिल वृन्दावन कीन्हा । दूधको दान गोपिन सो लीन्हा ॥ कहीं तरुण बालक होय जाई । कहीं वृद्ध होय देत दिखाई ॥ पलना झूलें मदन गोपाल । दूत कंसको हने
(५८८)
कवीरपंथी—
होय काला ॥ तीनों लोक मुखमें दिखलाया । तबहीं जसोदा बहुत डराया ॥ लीला अनंत रचे यदुराई । इन्हें देख सब रहे भुलाई ॥
समै-रास मंडलकर सब जग लूटा, मथुरा नगर मँझार ।
कहैं कवीर यह बंदा बनके, बिरले बचे विचार ॥
रमैनी १४३-नगर द्वारिका रुकमिनि रानी । तिनके कंथ श्रीकृष्ण ज्ञानी ॥ तिन भर्माया सब संसारा । काशी नगरमें खलबल पारा ॥ राजा नगर कापर बैठाया । आय राज होय अदल कराया ॥ काशी नगरमें बाजे ढंढोरा । साहूका घर मूसे चोरा ॥ चहुँ दिशि फिर गई कृष्ण दोहाई । राजा रंक रुजू होय जाई ॥ सबका जियरा भरम उरझाना । करता आप न किनहु जाना ॥
समै-रैयतते राजा भया, भया साहुते चोर । राजाको वजीर गहि मारा, जोर ते भया विजोर ॥ काग हंसकी पीठपर, नित होवे असवार । भौजल सागर उतरके, भया जग खेवनहार ॥
रमैनी १४४-मथुरा नगर तेहि रास रचाय । रहसमंडलमें सब कोइ आय ॥ पचीस गोपी संग पांच गुवाला । मुकुट धरे तहैं नाचे गोपाला ॥ गावत संग सखा सब आई । सब जग देखके गया भुलाई ॥ नाचे मोर कीर्त तहैं गावे । मंजारी मृदंग बजावे ॥ बैल झालरी भैंसा मंजीरा । रोज करे तहैं जै जै कवीरा ॥ लावा थेइ २ तहाँ मचाई । मृग मसाल दिखावे भाई ॥ ससा एक तीकले आय । सकल सभाके मस्तक लाय ॥ अहिरी पांच दही ले आई । ताके पीछे फिरें कन्हाई ॥ कौतुक देख रास सुख पाया । सिंह को मच्छा गहि लाया ॥
समै-जो जन्मा दस बार प्रभु, सो मनका औतार ।
कहैं कवीर बूझो तुम पंडित, श्रीकृष्ण ब्योहार ॥
रमैनी १४५-मुन पंडित एक बचन हमारा । मूस भया बिलार
शम्बावली
(५८९)
असवारा ॥ ताके संग बहु चले बराती । पांत पांत सब भांतिन भांती ॥ बाज तीतर संग चला कर जोरी । सिंह गऊ संग मुख नहि मोरी ॥ बाघ संग छेरी चलि भाई । ससा स्वान संग केले कराई ॥ केचवा सर्प संग कियो व्योहारा । लोहक नाव पषाण को भारा ॥
समै-जो न हता सो ब्रह्मै कहा, जीव भया तहैं लीन ।
कह कवीर जिन ब्रह्मै जाना, भए ज्ञानी परवीन ॥
रमैनी १४६-यह अचरज तुम देखो आई । सिंह सियारते करे सगाई ॥ हंस कागते करे सनेहा । देह धरे सो होय बिदेहा ॥ मछरी बैल ते भा व्योहारा । कुकट मोर मिलि जै जै कारा ॥ गिरगिटसे करे सनेह बसंता । सरप नेवरा रचे अनंता ॥ चीता हरिन संग केले मचाई । ससा स्वान मिल बैठे भाई ॥ बगुला बाजते रहस रचाया । राजहिं वजीर पकड़ ले आया ॥
समै-धरती बेल पताल भय, फल लागे आकास ।
कह कवीर चात्रिक चारो जुग, जलमें मरा पियास ॥
रमैनी १४७-निराकारकी करे नित सेवा । करता का कछु लखे न भेवा ॥ चाहिये दाख बोवे लसोरा । चहिये अंगुर सींचे नीम सहोरा ॥ आम चहिये जग बबुर लगाई । रंभ श्रवैके चाहे मिठाई ॥ करील सींचिके चहे सुपारी । बिना पुरुष सुत जन्मे नारी ॥ नरियर चहिये तुंबरा लाई । बेंत लायके कटहर खाई ॥ चहत करोंदा नाय मकोई । बेंत लाय फल चाहैं सोई ॥ अरंड लाये सदा फल खाई । इंद्रवन लायके केरे खाई ॥ ताड़ लायके चहे छोहारा । यह देखो जगके व्योहारा ॥
समै-बेल कुटुंगी फल बुरा, फुलवा कुबुध गंधाइ । और बिनासी तूंबरी, सो पातो करवाइ ॥ उगरह धरती छोड़के, ऊसर बोधे सोय । कहैं कवीर वृच्छ है नहीं, कैसेके फल होय ॥
(५९०)
कवीरपंथी—
रमैनी १४८—मूसा बिलार संग चहे कुसलाई । त्रिन अगिन संग चाहे भलाई ॥ छेरी भेड़िया संग खेला । गाय करे सिंह संग मेला ॥ नारका संग मीन भलाई । सरप चहे सुख नेवरा आई ॥ काग कुही संग चहे बिसरामा । निराकार संग सब चहे सलामा ॥
समै-साञ्ज्य मुक्तिको सब चले, देख वेदकी रीत ।
गये सुन्नमें बहुरि न आये, यह मानो परतीत ॥
रमैनी १४९—ऐसा कौतुक सुनो रे भाई । बिना बृच्छ फल सब जग खाई ॥ देई हिजड़ा कामिन रितुदाना । घर घर गुंगा बांचे पुराना ॥ बिना पुरुष कामिन सुत जाया । बिन पावक बन अगिन लगाया ॥ बिना फूल सुख बास बसाई । बिन बूझे नर गये अंधाई ॥ बिन पानीके त्रिषा बुझानी । पिंड प्राण बिन बोले बानी ॥ बिना दूध घिव निकसे भाई । बिन रवि ससि रैन दिन आई ॥
समै-बिना बीज वृक्ष जग उपजा, बिन फूलन फल लाग ।
कहैं कवीर या वृक्षहिं जाने, कोइ जाननहार सुभाग ॥
ना फल खट्टा ना फल मीठा, नहिं करुवा नहिं सीठ ।
बिन देखे बिन चारखै सब, कहैं कवीरा मीठ ॥
रमैनी १५०—पांच पचीस सदा सुखदाई । नौ औ तीन मिल राज देवाई ॥ कासी नगर बसा एक राजा । राज पाट चारों जुग छाजा ॥ प्रजा लोग करे सुख बासा । नगर मांझ सब करे विलासा ॥ ठग बटपार रहे नहिं कोई । बिरला कर पुरुष औ जोई ॥ राजा परजाको सुख देई । चारों जुग सो राज करेई ॥ सुखका नगर कासी यह गाऊं । करता पुरुष बसे तेहि ठाऊं ॥
समै-पांच पचीस तीस मिल, दीना अविचल राज । इनते एक जो बिछूरे, तिनका होय अकाज ॥ तैतिस जेहिके संग नहीं, सो करता नहिं कोय । वह कविर अंग बिहूना, वहिके जीव न कोय ॥
शब्दावली
(५११)
रमैनी १५१-बीज न वृच्छ पात न फूला । साखा कनाई फल नहीं मूला ॥ धरती ऊपर विरवा न होई । विरवा अकास सीचे सब कोई ॥ तेहि विरवामें चार फल लागे । निरफलते फल चहत अभागे ॥ सो वह विरवा सकल जग छाया । साखा मूल न काहू पाया ॥ ब्रह्मा विस्तु महेश्वर सेवा । सनकादिक तैत्तिस कोट देवा ॥ नारद आदि वो जनक विदेही । वसिष्ठ आदिक राम सनेही ॥ द्वादस भगत औ सिद्ध चौरासी । नौ नाथ रिषि सहस्र अठासी ॥ यह विरवा काहू नहीं चीन्हा । परचे बिना जीव सब दीन्हा ॥
समै-प्रथमै वृच्छ विरंचिहि, तेहि पाछे संसार ।
कविर वह वृच्छ निरगुन, विरला बूझन हार ॥
रमैनी १५२-बात हमारी बूझे जोई । वह पंडित बड ज्ञानी होई ॥ बीज उठा अंकूर कहाया । पौधा भया प्रात पर लाया ॥ छोटी डारी सो भइ कनाई । बड़ी भई सो साख ठहराई ॥ मध्य पर भया फूल ठहराया । बीज भया तब फल कहलाया ॥
समै--जो बोया सोई भया, ठांव ठांव पर नाम । पिता पुत्र एके ज्ञानी, जाव न निरगुन गांव ॥ करता माया तीन गुण, पांचों सबल शरीर । न्यारे २ देत दिखाई, कहत पुकार कवीर ॥ मन माया औ जीव गुण, धोख कहें सब कोय । गये नहीं औ सब गये, कहत जगत सब रोय ॥
रमैनी १५३--वृच्छ भया बीज विन पानी । तेहिका सेवत पंडित ज्ञानी ॥ आदि अंत न काहू पाया । परिपूरन सो वृच्छ कहाया ॥ फल औ फूल मूल औ डारा । सुंधत पात चहुँ दिसि बिस्तारा ॥ तेहिका देव अदेवन ज्ञानी । ब्रह्माते कहो आद भवानी ॥
समै-वृच्छ एक तीन फल लागे, बडहर बेर मकोय ।
वृच्छ कवीरा वह अदभुत, उत्पत परले होय ॥
(५९२)
कवीरपंथी-
रमैनी १५४-बीजा एक वृच्छते आया । बीजामें वह वृच्छ समाया॥ बीज वृच्छको नास न होई । बीजे वृच्छ देखे सब कोई॥ पांच तत्त्व जीव मिलि यक रंगा । साख लिये सगरी यक संग॥ पृथ्वी अकास पवन औ पानी । आप आपमें सबहि समानी ॥ जिवको जीव मिले जब जाई । यहिके मरे मरेको भाई ॥
समै-धरती अम्बर आदि है, अम्बर है पौन । मैं तुहि पृष्ठ पंडिता, इनमें मूआ कौन ॥ पांच तत्त्वका वृच्छ है, बीज साथ अंकुर । कह कवीर तजो का जग, रहत जगत भरपूर ॥
रमैनी १५५-आदि माया पाट लिखाया । सो त्रियदेवा सबे पढ़ाया ॥ सुनके बचन समाध लगाई । अपनी प्रतिमा दीन्ह दिखाई ॥ देख प्रतिमा भये निहाला । सबको मन भये निहचाला ॥ पांच वायु ले चले अकासा । आपन आपन देख तमासा ॥ कछु एक दिवस किया विसरामा । चला बहुरि तजि अपन मुकामा ॥
समै-ब्रह्मा करि विस्तुहि दीन्हा, विस्तु महैसे दीन्ह । शिवते पाया जगत सब, जो माया लिख दीन्ह ॥ जौन जुगत माया बतलाई, तीनों चले सो चाल । देखत प्रतिमा आपनी, तीनों भये निहाल ॥
रमैनी १५६-माता अपने सुत समझावे । लीन करे तेहि फिर उपजावे ॥ ब्रह्मा महेश आप कहाई । मातासे कन्या होय आई ॥ स्तुति करन लाग त्रिदेवा । सिद्ध समाधि लगाई सेवा ॥ उन भूलत भूला संसारा । निसदिन सेवे जोत अपारा ॥ सेवत जोत जोत मिल जाई । कंचन काया दीन गँवाई ॥ जाका बीज ताहि न जाना । निरगुनको सब जग लपटाना ॥
समै-पांच तत्त्व गुन तीन तेहि, मेट किये यह बात । वेद बिचार
शब्दावली
(५९३)
सब पंडित, कथा कहे दिन रात ॥ करता आपन न चीन्हे, नित उठ पठे पुरान । सो कविरा तत्त्व गुण नहीं, ठहरा हरि निरवान ॥
रमैनी १५७--ब्रह्माते कह आदि भवानी । हमरी बात न कोई जानी ॥ चारो जुग हमरी भइ सेवा । हम आपन तुमसों कहि भेवा ॥ सकल सृष्टि हम रचे बिचारी । हम जगकी हैं पालनहारी ॥ हम जग जीति हम जग हारें । हम जग पालें हम जग मारें ॥ नरक सरग हम दीन्ह निवासा । चारों जुग हमरी जग फाँसा ॥
समै-चार पुत्र हम जनमें, बिना पुरुष संजोग । तीन देहधर एक विदेहा, अब तुम करो सुभोग ॥ बसें तीन जग भीतरे, एक सुन्न बस गाँव । सकल सृष्टिका करता, जाके हाथ न पाँव ॥
रमैनी १५८--पृथ्वी अकास पवन नहीं पानी । तबका पृथ्वी आदि भवानी ॥ रवि ससि गन गंधर्व नहीं कोई । ये नर किन्नर पुरुष ना जोईं ॥ आश्रम सुनीश्वर हते न देवा । तब कासो कहो यह भेवा ॥ कहाँ थे ब्रह्मा विस्तु महेसा । कहाँते भयो सकल यह भेसा ॥
समै-ब्रह्मा वेद बखाने सृष्टिते, कहे बात यह आय । अपरंपार अपर गति हरिकी, कौन कहे अरथाय ॥
रमैनी १५९--आप पुरुषकी घरनी माया । तिन पापिन यह सब जग खाया ॥ तीनों सुतको लीन्हेसि खाई । भाग बचे हम हमें न पाईं ॥ सोना पहिर ठगा संसारी । रूपा पहिर रूप सिंगारी ॥ दोहुन बैठ सिंहासन कीन्हा । सब जीवनका ज्ञान हर लीन्हा ॥ लेके बैठी राज औ पाटा । भइ साँपिन जग खेदे खाता ॥ ब्रह्मा बुझे न जानत कोई । यहि ते बचा अमर भै सोईं ॥ यहि जंजाल न कोई जाना । यहिके जाल जीव अरुझाना ॥
समै-अगुआ बांधे कसकसे, हेरे करडी डीठ । ऐसा काल अपरबल, खात जगत तहँ दीठ ॥
(५९४)
कवीरपंथी-
रमैनी १६०-एक पुरुषकी हती जो नारी । एक छोड़ भई अनंत भरतारी ॥ कंथे तजे और पै जाई । अरधंगी पतिव्रता कहाई ॥ बार सो रहे नीत सँवारी । नित उठ जीव अनंत संधारी ॥ माता ते मेहरी कहवाई । फिर वह भई जगतकी माई ॥ अंग बिहूना पुरुष ठहराया । त्रि देवनको जाप बताया ॥
समै-तिरदेवाके सुमिरते, सबका भया अकाज । कहे कवीर कौन यह भुगते, ऐसा अविचल राज ॥
रमैनी १६१-सुन्न शिखर एक बसे कवीरा । रंकार धुन उठे गंभीरा ॥ माया आनके दिया संदेशा । त्रिगुनको यह भा उपदेशा ॥ ध्यान धरो तुम तीनों देवा । समाधि लायके करो तुम सेवा ॥ सुन्न नगरते हम तुम आये । निराकार रच हमें पठाये ॥
समै-जो कोइ थामे थाप आपनी, तेहिका करो विस्तार । ज्यों जाने त्यों हम आने, जेता यह संसार ॥
रमैनी १६२-पांच तत्त्व गुन हते न जहवाँ । तब काहे प्रहर रहते तहवाँ ॥ दिवस न रजनी पुरुष न जोई । गन गंधर्व रिषि हते न कोई ॥ इ नरकी नर हते न देवा । तब कासो प्रभु कहो यह भेवा ॥
समै-भयो अबूझ बूझे नहीं, जामे करे न बिचार । कहे कवीर पढ २ भूले, जेता यह संसार ॥
रमैनी १६३-जहां सृष्टि करताकी आई । सो सब सृष्टि करता कहवाई ॥ गुदरी पहिर अतीत न होई । करता चीन्हे करता सोई ॥ एक करताके पिंड न प्राना । सो वह करता सकल समाना ॥ जो करता नहिं पिंड ते न्यारा । तेहि करताका बीज विस्तारा ॥ करता एक दूसर नहिं कोई । जहां बूझ तहैं करता होई ॥ बिन बूझे करता नहिं पाई ॥ बिन बूझे तन काले खाई ॥