कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
घर छोड़के, उजरन लिया निवास ॥ रवि चंदाकी गम नहीं, राई न ठहराय । मन बुध जहाँ पहुँचे नहीं, तहाँ सकलो जग जाय ॥
रमैनी २४—पृथ्वी अकाश पवन नहीं पानी । तब काहै पर- ब्रह्म कहो मोहि जानी ॥ बीज वृक्ष हता न जहवाँ । देव अदेव न रहते तहवाँ ॥ गन गंधर्व मुनि हते न कोई । चंद्र न सूरज पुरुष न जोई ॥ यह बैराट कहाँते आवा । मूल मंत्र किनहूँ नहीं पावा ॥ करताका कछु लखा न भेवा ॥ मात वचन भूले त्रिदवा ॥
समै-वृच्छ नहीं बीजो नहीं, साखा पत्र न फूल ।
ताते यह बैराट भया, यही सबनकी भूल ॥
रमैनी २५—कथा कवित्त बहुत मन मानी । सबहिन राम खिलौना जानो ॥ सो ज्ञानी जो रामहि जाने । कंठी माला तिलक मनमाने ॥ रामहि जाने तब सुख होई । राम लखे बिन तरा न कोई ॥ रामहिंका यह सकल पसारा । रामहिं करताके सिरजन हारा ॥ रामके भगत करे ब्रह्मज्ञानी । रामकी गति नहीं किनहुँ जानी ॥ रामहि देखे तब सच पाई । राम लखे बिन नर- कहिं जाई ॥ दसरथ सुत सो राम न होई । रामहि जाने विरला कोई ॥
समै—राम राम सब कोइ कहे, रामते बांधा असनेह ।
कहैं कवीर देखा नहीं, पै मरते होय सनेह ॥
रमैनी २६—घर घर होय पुरुषकी सेवा । पुरुष निरंजन कहे न भेवा ॥ ताकी भगति सकल संसारा । नर नारी मिल करें पुकारा ॥ सनकादिक नारद मुख गावें । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ध्यावें ॥ मुनी व्यास पारासर ज्ञानी । प्रह्लाद और विभीषण ध्यानी ॥ द्वादस भगत भगती सो रॉंचे । दे तारी नर नारी नाचे ॥ जुग जुग भगत भये बहुतेरे । सबे परे काल जम घेरे ॥ काहूँ भगत न रामहि पाया । भगती करत यह जन्म गंवाया ॥