कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 968 में से
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समै-अमित वस्तु सब मेटे, जो मेटे सो प्रमान । मिटतन कीन्ह सनेहरा, आपइ मिटे निदान ॥ पैँडे सब जग भूलिया, कहैं लग कहौं समुझाय । कहैं कवीर अब क्या कीजे, जगते कहा बसाय ॥
रमैनी २२-प्रथम मन्त्र विरंचि एक कीन्हा । यह आयसु मातु मोहिं दीन्हा ॥ निराकार निरगुन सो देवा ॥ ताका काहू लखा न भेवा ॥ पग नाहीं पै सब कहिं जाई । कर नहिं पै सबहिं कराई ॥ हिय नाहीं पै सब कछु बोला । गुण नाहीं पै गुणो अमोला ॥ सरवन नाहिं पै सबे सुनावे । बिन रसना वह सब गुन गावे ॥ बिन नैनन देखे संसारा । बिन नासा ले बास अपारा ॥ जीव नहीं पै जियत गुसाई । घटघट पूर रहा हुनियाई ॥
समै-ब्रह्मा यह समझे नहीं, विना बीज कछु नाहिं ।
कहैं कवीर जो उन कहो, सो राखो मन माहिं ॥
रमैनी २३-वेद किताब न झूठा होई । जो न विचारे झूठा सोई ॥ नरकी नारी जो मर जाई । के तो जन्मे की नरक समाई ॥ पिंडा तरपन जब तुम कीन्हा । कहो पंडित उन कैसे लीना ॥ कुंभक भरभर जल ढरकावे । जिवत न मिले मरे का पावे ॥ जलसे जल ले जलमें दीन्हा । पित्रन जल पिंडा कब लीन्हा ॥ वनखंड मांझ परा सब कोई । मनकी भटक तजे न सोई ॥ आप-नके छुंवन करे विचारा । करता न लखा परा भर्म जारा ॥ पर-मपरा जैसी चलि आई । तामें समझ रहा बिलमाई ॥
समै-वेद हमारा भेद है, हम हीं वेदों माहिं । जिस विधि न्यारे हम रहें, सो कोइ जाने नाहिं ॥ हारिल लकड़ी ना तजे, नर नाहीं छोडे टेक । कहैं कवीर गुरु शब्द ते, पकड़ रहा वह एक ॥ धरतः बेल लगायके, फल दूँढत आकास । कहैं कवीर