भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

रमैनी १९-हरि ब्रह्मा भूले त्रिपुरारी। इन भूलत भूली संसारी॥ सनक सनंदन भूले वोऊ। नारद शारद भूले सोऊ॥ गोरख भूले भूले हनुमाना। सुनि वशिष्ठ तिनहुं नहिं जाना॥ परहलाद पारासर भूले तेऊ। गौतम लोमस भूले एऊ॥ इन्द्र कुबेर भूले बहु भांती। जमदग्निअग्नि छ भरमाती॥ भूलेपीर नबी औलिया। भूले गौस कुतुब मौलिया॥ भूले यह सब नेजा धारी। इनके संग भूले संसारी॥

समै-देव पैगम्बर रिषि मिलि, इनही माना भूल ।

निराकारमें यह सब अटके, यही सबनकी भूल ॥

रमैनी २०-कासे कहूं मैं यह दुख रोई जासों कहों सो वैरी होई॥ कहा न माने मोर सुत नारी। कहत कहत मोर रसना हारी॥ गन गंधर्व सुनि माने न देवा। सबते कहा अपन हम भेवा॥ देवी देव बसे सब आई। भूत प्रेत बसे बहुताई॥ गन गंधर्व सुनि तपी संन्यासी। जिया जोनि लाख चौरासी॥ सौ सुत और जो जन्म माया। घर घर तिनका भया बसाया॥

समै-हमारा यह सब कीन कराया, हमहीं बस परगौंव ।

कहे कवीर सबको जगह, हमको नाही ठाँव ॥

हमरे काज हम सब कीना, बसा पुरुष इक आय ।

रूप न रेखा अंग विहूना, घट घट रहा समाय ॥

रमैनी २१-मैं तोहि पूछो पंडित ज्ञानी। पिरथी अकास रहे नहिं पानी॥ सुक्षम स्थूल रहे नहिं कोई। बिराट सहित परले सब होई॥ तबहि बिराट काहि अधारा। तब वेद जाप जर होवे छारा॥ होय अलोप जब रवि औ चन्दा। तब कापर रहे बाल मुकुन्दा॥ यह अचरज मोहिं निसि दिन भाई। दुरमत मेट मोहिं देहु बताई॥