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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(५४४)

कवीरपंथी—

घर छोड़के, उजरन लिया निवास ॥ रवि चंदाकी गम नहीं, राई न ठहराय । मन बुध जहाँ पहुँचे नहीं, तहाँ सकलो जग जाय ॥

रमैनी २४—पृथ्वी अकाश पवन नहीं पानी । तब काहै पर- ब्रह्म कहो मोहि जानी ॥ बीज वृक्ष हता न जहवाँ । देव अदेव न रहते तहवाँ ॥ गन गंधर्व मुनि हते न कोई । चंद्र न सूरज पुरुष न जोई ॥ यह बैराट कहाँते आवा । मूल मंत्र किनहूँ नहीं पावा ॥ करताका कछु लखा न भेवा ॥ मात वचन भूले त्रिदवा ॥

समै-वृच्छ नहीं बीजो नहीं, साखा पत्र न फूल ।

ताते यह बैराट भया, यही सबनकी भूल ॥

रमैनी २५—कथा कवित्त बहुत मन मानी । सबहिन राम खिलौना जानो ॥ सो ज्ञानी जो रामहि जाने । कंठी माला तिलक मनमाने ॥ रामहि जाने तब सुख होई । राम लखे बिन तरा न कोई ॥ रामहिंका यह सकल पसारा । रामहिं करताके सिरजन हारा ॥ रामके भगत करे ब्रह्मज्ञानी । रामकी गति नहीं किनहुँ जानी ॥ रामहि देखे तब सच पाई । राम लखे बिन नर- कहिं जाई ॥ दसरथ सुत सो राम न होई । रामहि जाने विरला कोई ॥

समै—राम राम सब कोइ कहे, रामते बांधा असनेह ।

कहैं कवीर देखा नहीं, पै मरते होय सनेह ॥

रमैनी २६—घर घर होय पुरुषकी सेवा । पुरुष निरंजन कहे न भेवा ॥ ताकी भगति सकल संसारा । नर नारी मिल करें पुकारा ॥ सनकादिक नारद मुख गावें । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ध्यावें ॥ मुनी व्यास पारासर ज्ञानी । प्रह्लाद और विभीषण ध्यानी ॥ द्वादस भगत भगती सो रॉंचे । दे तारी नर नारी नाचे ॥ जुग जुग भगत भये बहुतेरे । सबे परे काल जम घेरे ॥ काहूँ भगत न रामहि पाया । भगती करत यह जन्म गंवाया ॥

शब्दावली ।

(५४५)

समै-भगति २ सब कोई कहे, भगति न आई काज ।

जहँका किया भरोसवा, तहँ ते आई गाज ॥

रमैनी २७-यह अचरज मोहिं निस दिन भारी । वाही देस जात नर नारी ॥ वही देवकी खबर न पाई । काहू वहाँ ते कहि न पठाई ॥ हम सुख रहत तुमहूँ चलि आवो । कि हम दुख तहाँ महुँ बोलावो ॥

समै-समझो भाई ज्ञानी नर, काहु न कहो संदेस ।

जे गये सो नाहिं न बहुरे, सो वह कैसा देश ॥

रमैनी २८-बूझो पंडित बात हमारी । आधा नारी पुरुष विचारी ॥ कौन नारि को पुरुष कहावे । किसको निसिदिन सब कोई धावे ॥ संयोग लाग निरगुन विन पानी । करता ते फिर क्यों अनखानी ॥ पुरुष संयोग पुरुषको छाया ॥ तब माता पुत्रनको खाया ॥

समै-चारों जुग समझाइया, न समझे सुत नारि । कहें कवीर अब कासो कहिये, अपनी चूकी हार ॥ माताते डाँइन भई, लिया जगत सब खाय । कहें कवीर हम क्या करें, जगत नाहिं पतियाय ॥ ससा सिंहको खाइया, हरना चीता खाय । कहें कवीर चींटी गज मारी, बिल्ली सूसा धाय ॥

रमैनी २९-बीज वृच्छकी सार न जानी । कहो पंडित कैसे ब्रह्मज्ञानी ॥ बीज वृच्छका होय विनासा । तब पावे ठाकुरमें बासा ॥ मैं तोहि पूछो कहो ब्रह्मज्ञानी । कैसे जोतमें जोत समानी ॥ जिवको भेद लखे नहिं कोई । उपनिषद नास कह सब कोई ॥ करता सबका सिरजन हारा । पंडित नाहीं वेद विचारा ॥

समै-बीज वृच्छ दोनों कायामें, कबहुँ नास न होय । कहे

कबीरपंथी शब्दावली १८

(५४६)

कवीरपंथी—

कवीर या वृच्छको, विरला बूझे कोय ॥ बीज वृच्छ एक साथ है, आगे पाछे नाहिं । बीज वृच्छमें वृच्छ बीजमें जानत कोई नाहिं ॥ विना बीज वृच्छ है नाहीं, यह जानत सब कोय । वृच्छ विना बीजो नहीं, यामें संक न होय ॥

रमैनी ३०—यह धोखा है सबको काला । धरती अकाश धोख पताला ॥ धोखाही हंसे धोखाही रोवे । धोखा जगे और धोखा सोवे ॥ धोखा जंत्र मंत्र औ टोना । धोखा रूपा धोखा सोना ॥ षट् दृशनमें धोखा छाया । धोखेका सब किया कराया ॥ धोखा पुरुष औ धोखा नारी ॥ वेद सुप्तिति सब कहत पुकारी ॥ सनकादिक धोखा मन लाया । चारों जुग धोखाको धाया ॥ विरला जाने धोखा कोई । प्रगट गुपुत धोखो है सोई ॥

समै—धोखे धोखे सब जग बीता, धोखे गया सिराय । थित ना पकडे आपनी, यह दुख कहाँ सिराय ॥

रमैनी ३१—मन खेले मनहीं मन केला । मनहीं बीज वो मन ही बेला ॥ पांच पचीस यह मनके साथ । मनहिं तीन गुण लीन्है हाथा ॥ मनहिं काल औ मनहीं दूता । मनही राच्छस मनही भूता ॥ मनही पूजे मनही देवा । यह मनकी सब करते सेवा ॥ मनही आदि औ मनही अंता । मनही लीला रचा अनंता ॥ मनही जीते मनही हारा ॥ मन सुमरे औ करे विचारा ॥

समै—नटके साथ जस बेसवा, जियरा मनके हाथ । केतक नाच नचावई, राखे अपने हाथ ॥ मनके हारे हार है, मनके जीते जीत । कहें कवीर तहँ मन नहीं, जहाँ हमारी रीत ॥

रमैनी ३२—बुंदकी खबर न काहू पाई । एक बुंदमें सरब समाई ॥ बुंद बुन्द सकल घट माना । बुंदके मित्र तिरगुन जाना ॥ बुंदे राखे सोई ज्ञानी । बुंदे करत जो बुंदे जानी ॥ पिरथी बुंदे देवे

शब्दावली

(५४७)

जोई। बुंदहि ते यह सर्वस होई ॥ इच्छा औ मन जहां न होई। तहां बुंद यह स्थिर सोई ॥ याकी खबर न काहू जानी। यही बुंद सब साज समानी ॥

समै-केते बुंद अलपे गये, केते सुलप वोहार। केते बुंद तन धरि गये, तिन्ह रोवे संसार ॥ सकल साज एक बुंदमें, जानत नाहीं कोय। कहें कवीर जिन जिव भूले परम परे भर्म सोय ॥

रमैनी ३३-महा अपरबल है यह माया। जिसका यह सब किया कराया ॥ मच्छ रूप मथा समुद्र अपारा। संखासुर मारा वेद उधारा ॥ कच्छ माया धरती ले आई। वराह धार दशन धरे भाई ॥ खंभ फार नरसिंह बिकरारा। हरनाकुस नख उदर बिदारा ॥ बावन रूप बन बलिको जीता ॥ परसराम पृथ्वी बस कीता ॥ रामचंद्र होय रावण मारा। कृष्ण रूप धरि कंस पछारा ॥ निहकलंक कालिद्रा मारा। और असुर बहुते संचारा ॥

समै-माया ते मन उपजा, मनते दस औतार। ब्रह्मा विस्त्र धोखे गये, भरम परा संसार ॥ करताके नहिं काम यह, यह सब माया कीन्ह। कहें कवीर बूझो माया को, नाव धरो जन कान्ह ॥

रमैनी ३ -सुन पंडित यक बात हमारी। तेरा सुत तुमहीको मारी ॥ काठ मथके अगिन उपाई। लौट अगिन वह काठे खाई ॥ दोउका नास भये एक ठाऊँ। उडगड़ भसम लीनका नाऊँ ॥ जो मिरगा संग मिरगा बंधाई। त्यों अपना सुत आपुहिं खाई ॥ ताते करम काठ उरझेरा। पंडित कहा न मानत मेरा ॥ काठ ते चुन उपजे भाई। लौट काठ वह चुन चुन खाई ॥

समै-बिही खेतहिं खात है, मात सुतन को खात।

कहें कवीर सुत नाती खाये, यह दुख नाहिं विहात ॥

रमैनी ३५-माके ससुरके उपाव बतावे। टोना टांबर बहुत

(५४८)

कवीरपंथी—

खिलावे ॥ सब घर लिया चोर बताई। घृतका दीपक धरा बनाई॥ झाँझ मंजीरा ढोल बजाया। खेला नावत भरम बताया॥ पता मिलाये सब पतियाने। टोना टांबर बहुत सुखमाने ॥

समै-मूठ हिलावे नावत, भरम भीहा बैठाय। कहें कवीर इन नावत, राखा सब जग भरमाय ॥ चुरैल भूत ना कोई, गन गंधर्व कोई नाहिं। मनसा डाइन संका भूत, संसार परा भ्रम माहिं॥

रमैनी ३६-जंत्र मंत्र तंत्र है सारा। त्रिभुवन अटका यही बिचारा ॥ नाटक चेटक ते लौ लाया। टोना टांबर बहुत कुछ भाया ॥ जनम विताना याही धंधा। करता आप न चीन्हे अंधा ॥ जहां बचन झूठ सुन पावे। लाभ जानके मूल गंवावे ॥ जंत्र मंत्र सो जग पतियाना। जंत्र मंत्रका मर्म न जाना ॥

समै-बीज ते आये चार गुण, बीचे गये सिराय।

उपज बिनस जाने नहीं, सब जग रहा भुलाय ॥

रमैनी ३७-कथते कथते जनम सब जाई। बिन बूझे कछु हाथ न आई ॥ रतिके कहे त्रिया सुख पाई। विषनी संग विस्वा जारो भाई ॥ सुखके कहे सुख जो होई। नैन कहे सूझे दृष्टि सोई ॥ भोजन कहे भूख जो जाई। तो धनके कहे धन घर आई ॥ अगिन कहे जरे जो पाऊं। बस्ती कहे उजर बस गाऊं ॥ पाथर पूजे मुक्त जो पावे। बिन नर नारी सो सुत जावे ॥ पाप कटे जो तीर्थ नहाये। लील दाग कटे न साबुन लाये ॥ जलके कहे जो त्रिषा बुझावे। तो जग राम कहे तर जावे ॥ बीज वृक्षका भेद जो पाई। तब यह काया अमर रहाई ॥

समै-राम कहत २ जग बीता, कहूं न मिलिया राम। कहें कवीर जिन रामहि जाना, तिनके भये सब काम ॥ यह दुनिया भई बावरी, अद्विस्ट सो बांधा नेह। कहें कवीर द्विस्टमान छोड़के, सेवे पुरुष विदेह ॥

शब्दावली

(५४९)

रमैनी ३८-पाथरकी क्या कीजे सेवा ! बोले न चाले कहे न भेवा ॥ विन देखेकी झूठी आसा । जल होते क्यों मरे पियासा ॥ जब तक ना देखे अपने नैना । तब तक न पतीजे गुरुके वैना ॥ शिष्य पियासा गुरुपै जाई । चेलाकी नहीं त्रिषा बुझाई ॥ कछु-वन वस्तु अमोल बिकाई । राजा रंक विसाहे जाई ॥ वस्तु लीन कछु हाथ न आया । लाभ जान फिर मूल गंवाया ॥ सब गुण पूजे निरगुण सेवा । पै नहीं पूजे आत्म देवा ॥

समै-जहँ नहीं तहँ सब कछु, वह की बांधी आस । कहें कवीर ये क्यों न त्रिपत, दोऊकी एके ध्यास ॥

रमैनी ३९-आपहि बृच्छ आपही चेला । आपहि गुरु आपही चेला ॥ आपहि जीवे आपही मारे । आपहि बहे आपही सारे ॥ आपहि जती आप संयोगी । आप संन्यासी आप वियोगी ॥ आपहिं गिरही आप बैरागी । आपहिं गुनी आप गुन त्यागी ॥ आप अज्ञान आप है ज्ञानी । आपहिं आप दूसर कर मानी ॥ आप पुजेरी आपहिं देवा । आप अभेद आप होय भेवा ॥

समै-आप सबनमें होय रहा, आपन भया निनार ।

कहें कवीर एक बूझ बिन, भटका सब संसार ॥

रमैनी ४०-मनकी बातें अगम अपारा । मन भटकाया सब संसारा ॥ यह मन चोर चुगुल अपकारी । यह मन जीते यह मन हारी ॥ यह मन नाचे यह मन गावे । यह मन ताल मृदंग, बजावे ॥ यह मन देवी यह मन देवा । यह मन अपनी आप कर सेवा ॥ यह मन पुर्ष यह मन जोई । रूप न रेख न यह मन सोई ॥ यह मन जागे यह मन सोवे । यह मन हसै सो यह मन रोवे ॥ यह मन विरहिन ब्रह्म वियोगी । मनै जती और मनै संजोगी ॥ यह मन देव निरगुन आकारा । यह मन सुगम अगम अपारा ॥

(५५०)

कबीरपंथी—

यहि मनका है नाना रंगा । यह मनके बहु उठे तरंगा ॥ यह मन सब जग चुन चुन खाया । यह मन सब जगतको भरमाया ॥

समै-राजा रैयत होइ रहा, रैयत लीन्हहा पाज । रैयत चाहा सोइ लिया, ताते भया अकाज ॥ मूसा चढा बिलार पर, चढी सिंह पर गाय । कहैं कवीर कहत न आवे, सुतकी नारी माय ॥ जब जाना तव भरम भया, बिन जाने भया नास । कहैं कवीर पुकारके, मनके झूठी आस ॥

रमैनी ४१-हंसी न जावे आवे न रोई । धोखे मरे पुरुष औ जोई ॥ आदि भवानी ह्री हमारी । हमैं छोड़ भई सुतकी नारी ॥ हमरा यह सब कीन कराया । अनख मान उन मनहिं दुराया ॥ निरगुण रचा पुरुष एक माया । हमको तज उनको बतलाया ॥ अब हम कासों करे पुकारा । हारल बिनवे आपन हारा ॥

समै-महा गुननकी आगरी, महा अपरबल नारि । कहैं कवीर यह बड़ा अचंभा, व्याहत भई कुमारी ॥ निरगुन आपन उन रचा, लौट भई वह नार । कहैं कवीर अनखायके, रचा पुरुष निरकार ॥ निरगुण निराकार करता ठहराया, तिनहुं दिया उपदेश । कहैं कवीर त्रिगुन चले, जहाँ न चंद दिनेस ॥

रमैनी ४२-कोई तीरथ वरत ठहरावा । कोई जप तप कर भरमावा ॥ कोई उरझे वेद पुराना । पूजा रची कोउ अरुझाना ॥ कोई नाद बिदमें लागा । सुत्र विसन्न कोइ चला अभागा ॥ कोई बैठा आसन मारी । पंचअगिन कोई तन जारी ॥ कोई मूंड मुढ़ाय भर्माना । कंठी छाप तिलक मन माना ॥ नाना भांति पृथ्वी लागी । बिन कर्ता मन भरम न भागी ॥

समै-गुरवा संग सब कोइ भटके, करता परा न चीन्ह । कहैं कवीर मनके भ्रम भूले, गुरु सिकख जिव दान ॥ आगे आगे गुरु

शब्दावली

(५५१)

चला, जहां न ससि औ भान । कहें कवीर पाछे चला, गुरुमे यहू समान ॥

रमैनी ४३-रंकार माया जब चीन्हा । यही मंत्र ब्रह्माको दीन्हा ॥ ब्रह्माते शिव विष्णु भाई । यही मंत्र सनकादिक गाई ॥ यही मंत्र नारदमुनि पावा । यही मंत्र सुर नर मुनि ध्यावा ॥ यह मंत्र जपा गौतम व्यासा । यही मंत्रका शिव डुरवासा ॥ यही मंत्रका त्रिभुवन चेला । याही मंत्रके बृच्छ नवेला ॥ यही मंत्र कथा वेद पुराना ॥ यही मंत्र सबके मन माना ॥

समै-माता गुरु पुत्र भये चेला, सुतको मंत्र दीन । कहें कवीर माताको वचन, सबहिन चित धर लीन ॥ तिसका मंत्र सब जपे, जिसके हाथ न पांव । कहें कवीर सो सुत माको, दिया निरंजन नांव ॥ जपते २ जी गया, काहू मिलिया नाहिं । कह कवीर तउ नाही समझे, सब लागे वहि माहिं ॥

रमैनी ४४-जमी असमान तहां नहिं सोई । हता न पुरुष हता न कोई ॥ पांचो तत्त्व हते नहिं भाई । यह विश्वरूप कहां ते आई ॥ कहांते आई आदिभवानी । कैसे रची चंडिका रानी ॥ कौनसे जगह राम अस्थाना । श्री सहित कह रहे भगवाना ॥ कौन सरूप कौनसे देशा । पंडित मुझको देहु संदेशा ॥ लौट पंडिता कहें कहानी । भक्त भागवत रहो तहाँ आनी ॥

समै-बिस्व रूप सब साथ था, बिस्वरूप यह सोय । जैसे साज पीड़की, आगे पाछे न होय ॥ बहे बहाये जात थे, लोक वेदके साथ । बीचे सतगुरु मिल गये, दीपक दीन्हा हाथ ॥ तुझ-हीसे सब कुछ भया, सब कुछ तुझही माहिं । कहें कवीर सुन पंडिता, तेहि ते अंते नाहिं ॥

(५५२)

कवीरपंथी-

रमैनी ४५-बूझो पंडित बात हमारी। वेद पुरान शास्त्र विचारी ॥ बिजनासे पौन कहाँते आई। बिजना टूटे कहाँ समाई ॥ काठते अगिन काठको खाई। लौट अगिन वह कहाँ समाई ॥ काशीमें धुन उठहिँ अपारा। काशी टूटे कहाँ विचारा ॥ होते बिरवा लीन उखारी। फल औ फूल गये केहि बारी ॥

समै-करता सब घट पूरना, जगमें रहा समाय। कहे कवीर एक जुगति बिन, सब कुछ गया नसाय ॥

रमैनी ४६-भौ को सागर यह संसारा। सब जिवपर माया की लारा ॥ देव रिषी सुर गये सयाने। त्रिगुन गये जात नहीं जाने ॥ गंधर्व पुरुष औ जोई। असुर मुनी सुर रहा न कोई ॥ पीर पैगम्बर औलिया भाई। गौस कुतुब औ राजा राई ॥ यह भवसागर भव अस्थाना। अंत एक दिन सबको जाना ॥ निर- गुन पुरुष रहेगा सोई। त्रिभुवन मरे रहे न कोई ॥

समै-आद अंत अमर हम देखा, जीव मुवा नहीं कोय। यह विश्व रूप ब्रह्मज्ञानी, उत्पत्त प्रलय न होय ॥ मत भूलो ब्रह्म- ज्ञानी, लोक वेदके साथ। कहे कवीर यह बूझ हमारी, सो दीपक लीजे हाथ ॥

रमैनी ४७-बैठ सिंहासन आद भवानी। तीनों सीस नवायो आनी ॥ भय आयसु सेवा चित लावा। आद पुरातम भेद बतावा ॥ हम महामाया मातु तुम्हारी। तीनों मानो बात हमारी ॥ लौटि पूछे ब्रह्मा यह बता। काकी नार कहो तुम माता ॥ निरं- कार निरगुन जो देवा। सो मम कंथ कहा यह भेवा ॥

समै-त्रिदेवा सुमरन लगे, पूजा रचा अंथ। तिरिया गई पर पुरुषपै, छोड आपना कंथ ॥ त्रिया कंत न माने, कंता ठाढे द्वार। मुतको कंत कीन्ह बरनारी, महा अपरबल नार ॥

शब्दावली

(५५३)

रपैनी ४८-इच्छा विग्रित जबे जिय आई। बीजमें अंकुर तबे दिखाई ॥ उठा बीज तीन भय बारा। तीन भये संयोग व्योहारा ॥ महामाया महा रीत भारी। कंतापै आई वह नारी ॥ रीत माँग रीत दीन नचाई। त्रिया अनखाय पुत्रपै आई ॥ धिरज न कीन्ह नारि अनखानी। तजा कंत पुत नारी मानी ॥

समै-कर्ता हम कर्ताकी नार, धीरज न कीन उन। निरगुन रचा विचार, धीरजमें सब होत था ॥ अधीरज कीन्ह विनास, कवीर अब कछु न कहना। अबकी गूठी आस, काहू विधि बनैना ॥

रपैनी ४९-ब्रह्मा पूछे सुनो भवानी। अपने आप तुम कहो कहानी ॥ लौट भवानी सुत समुझावे। अपने पार न और बतावे ॥ खंड ब्रह्मण्ड मैं रची अनंता। सूर्य चंद्र उड़गन अनंता ॥ चौरासी सब हमहीं निरमाई। ओंकार जब ताहि सुनाई ॥ आदि अंत मोहि पूजे देवा। करो हमारी तीनों सेवा ॥

समै-निर्गुन निर्गुन दोऊ उड़ाइस, आप रही ठहराय। आपहिं पुरुष नारि ठहरानी, ब्रह्मा कहे समझाय ॥ ब्रह्माके प्रतीत भई, बांधा वेद ग्रन्थ। प्रगट नैनन देखत नहीं, परा वेदके पंथ ॥ मायाते यह वेद भै, वेद मध्य दोय तत्। निर्गुन सर्गुन दो बतलावे, कहे नाहिं जो सत् ॥

रपैनी ५०-परम मद माते नर औ नारी। जुग गये चार न मिटी खुमारी ॥ माते ब्रह्मा विष्णु महेशा। माते नारद शारद शेषा ॥ माते सनकादिक सब देवा। माते रिषि मुनि करते सेवा ॥ माते नाथ सिद्ध गोपाला। माते शिव नारी वृजबाला ॥ माती लच्छमी आदि भवानी। माती सती ब्रह्मा ब्रह्मज्ञानी ॥ तीन लोक परम मद माता। सिध साधक है येही बाता ॥

समै-महामाया भाठी रची, तीन लोक बिस्तार। कहैं कवीर हम

(५५४)

कवीरपंथी-

रहे निनारे, पी माता संसार। ब्रह्मा पियत पिया सब काहू, करता अपन न चीन्ह। कहैं कवीर अब कहत न आवे, विरंच इसारा कीन्ह ॥

रमैनी ५१—सबे आस वहांकी ठानी। वहांकी गति काहु न जानी ॥ निराकार सब करे करावे। ज्यों बाजीगर कपिहि नचावे ॥ वाहिके हाथ जीवन औ मरना। ताते वाही पुरुषते डरना ॥ वह सब ठाँव सबसे न्यारा। उनहिं कीन्ह यह सब बिस्तारा ॥

समै—कब जेहो वहि देशवा, जहां पुरुष निरंकार। कहैं कवीर हमहूं ते कहियो, जब होय चलन तुम्हार ॥ आगे गये तिन किनहु न कहिया, अब तुम लीजो साथ ॥ जो है तुम्हे भरोसवा, गहो हमारा हांथ ॥ त्रिय देवा जान्यो नहीं, कौन रूप केहि देश। अबहूं चेत समझ नर बौरे, झूठा दिया उपदेश ॥

रमैनी ५२—महामति माया आदि भवानी। पांडव घर द्रोणदीरानी ॥ रुधिर पियासी भइ मह माया। अष्टादस छोनी दल खाया ॥ इतने खायसि तउ न अघानी। पांडव गरे हेवारे आनी ॥ छप्पनकोट जुदुबंस सिधारी। तऊ न त्रिपित भई हत्यारी ॥ सुभ निसुभ महिषासुर मारा। हरनाकुश रावन संहारा ॥ सुरनर मुनि सब खोये झारी। कोइ न बाँचा यह संसारी ॥

समै—करताते अनखानी माया, आगम कीन्ह उपाय। कहैं कवीर त्रिया चंचल, राखा पुरुष दुराय ॥ केता हम समझाइया, पै ना समझे कोय। उनका कहा जगत मिल माना, हमरे कहे क्या होय ॥

रमैनी ५३—ब्रह्माके घर भई भवानी। शिवके बैठी आदू भवानी ॥ विष्णुके भई लछमी नारी। गंधर्वके घर अप्सरा वारी ॥ इंद्रके बैठी होय इंद्रानी। राजाके घर भई पटरानी ॥ जोगीके चेली होय

संवादक

(५५२)

आई । देवनके देवांगना कहाई ॥ तुरकनके तुरकानी खेली । सब घर छला त्रिया अकेली ॥

समै-पुरुष अपनते विरची नारी, घर २ कीन्हा ठाँव ।

निरगुनको करता ठहराया, मेट हमारा नांव ॥

रमैनी ५४-त्रिय देवा मिल पृष्ठ भेवा । कैसे तुम्हे पढायो देवा ॥ वह निरगुन तुमहो गुनवंती । निरगुनते कैसे भई जनती । प्रथमे माय होय फिर नारी । यह मेटो तुम संक हमारी ॥ निरा-कार निरगुन है करता । चहिये सो करे चित धरता ॥ उनका आदि अंत नहीं पाया । जिन रचि हमको तुम्हे पढाया ॥

समै-त्रियदेवा समझे नहीं, भई मायते नार ।

उन भूलत भूला सब कोई, कहैं कवीर पुकार ॥

रमैनी ५५-वेद शास्त्रको वोहू गुन गावे । नेति २ फिर अथाह सुनावे ॥ जोगी गगन मंडलको धावे । देख आप दूजा ठहरावे ॥ बैरागी चितमे धारे ध्याना । दृशरूप नारायन ठाना ॥ जिंदा कहैं नूर हम देखा । झूठा दृशन नहीं विशेषा ॥ करता अपन न चीन्हे कोई । ईसर सुमरे पुरुष औ जोई ॥

समै-वेद बरन जो पावैं, कहैं एक तो बात ।

जैसी कुछ माता कही, सोइ कहैं दिन रात ॥

रमैनी ५६-इच्छा रूप भई एक गाई । सो वह गाय महा हर-हाई ॥ चार पाँव दोय सींग है भाई । पत्र अठारे परम सुहाई । नौ नारीका पीवे पानी । स्वेत सींग बिगरहकी खानी ॥ सुर नर सुनी करें नित सेवा । ब्रह्मा विष्णु महेसर देवा ॥ गाई बांध बिच दावर लाई । तब वह गाई तोड़ पराई ॥

समै-वृक्ष एक छाके नई, फूटी साखा चार ।

अठारह पत्र चार फल लागे, फुलवा लेहु विचार ॥

(५५६)

कवारपथा-

रमैनी ५७-सांचा देव झूठ पूजे देवा । वृक्ष नहीं फल चाहे करि सेवा । झूठे पीर पैगम्बर भाई । सांचा देव झूठ लौ लाई॥ झूठे योगी जंगम उरझाने । झूठे हिंदू हरी न जाने ॥ झूठे तुर्क अल्लह नहीं पाया । बैरागी झूठे सूड मुडाया ॥ झूठा ध्यान लगावे सेवा । लोटाखियाय पुजावे देवा ॥ तीरथ जाय पै राम न जाना । झूठ परंपंच जगत पतियाना ॥ झूठ सन्यासी जटा रखावे । करता का कछु भेद न पावे ॥

समै-तुम जो भूले वेद विद्या, करता अपन न चीन्ह ।

कह कवीर यहि अमर्म, सकल सृष्टि जिय दीन ॥

रमैनी ५८-जने तीन परंपंची देवा । तिनहुं उनकी कीन्ही सेवा ॥ सेवा कीन्ह भेद नहीं पाया । उन अनखायके हमें छिपाया ॥ जोग जुगत ब्रह्माको दीन्हा । कुंडली साथ गगनको चीन्हा ॥ काया माहिं एक मंजारी । तेहि संग जोगी जोग बिचारी ॥ दिन उपदेश निरगुन ठहरावा । पेंड छोड़ डार अरुझावा ॥

समै-उनके संग गये तिरदेवा, गया जग उनके साथ ।

कहै कवीर अब मरो मसोसन, मल २ दोनों हाँथ ॥

रमैनी ५९-भेद अभेद न उनके होई । निगुन पुरुष करता है सोई ॥ हते न तत् न त्रिगुन देवा । सकल कीन्ह यह सुन्यते भेवा ॥ नाभि कमल होय ब्रह्मा आया । तिन पहिले नारदको जाया ॥ फिर ब्रह्माकी इच्छा आई । मानसी पुत्र भये बहु भाई ॥ ब्रह्मा जान धरले बैरागा । बिना गहे बजावे रागा ॥ साठ कन्या ब्रह्मा ठहराई । कश्यप तिन मिल सृष्टि कराई ॥

समै-निहततसे कैसे तत भया, सुन्न ते भया अकार । कश्यप कन्या कहाँ हती, पंडित कहो विचार ॥ पुरुष कामिनि एक संग, कंथ नर संयोग । कहै कवीर सुन पंडिता, पुत्र न कंथ वियोग ॥

शब्दावली ।

(५५७)

रमैनी ६०-मैं तोहि पूछो पंडित ज्ञानी । पंद्रह तिथ तैं कहाँसे आनी ॥ सात दिवसको करे है भाई । राम पाषाण कैसे भय आई ॥ चार बरन कहाँते आना । जुगन चारका करो बखाना ॥ कौन मते भाई बहिन नारी । पुत्र पिता ठहरी महतारी ॥ दोय संयोग अनेक होय आया । कहो पंडित कैसे ठहराया ॥

समै-पंडित भूला वेद पढ़ि, लखा मूल ना भेद ।

एक नारि एक पुरुषते, सकल साजना खेद ॥

रमैनी ६१-निरगुन पुरुष निरंजन देवा । सब जग करे ताहिकी सेवा ॥ अपन अपन मत कीन्ह विचारी । बात न बूझै कोई हमारी ॥ बैरागी कहे लेउ बैरागा । ब्रह्मचारी तीरथ व्रत लगा ॥ सन्यासी सर्वनास कराया । जोगी जुगति कर प्रान चढ़ाया ॥ जिंदा परा कुरानके फंदा । भा छानवे झूठ पाखंड़ा । भेष धरी यहि गुरुवा खिलावे । आप गुरु होय जगत बतावे ॥

समै-नहि कंठी नहि माल है, नहीं तिलक नहीं छाप । नहि वाके कछु भेष है, नहि वाके तप जाप ॥ जात बरण कछु भेष नहि, नहि धोखेकी बात । ज्ञान भया, धोखा गया, ज्यों तारा परभात ॥ जो बहा सो बहनदे, ताते चेत शरीर । तैं अपनेको बूझले, कहत पुकार कवीर ॥

रमैनी ६२-मन थिर होय बसे घर मेरा । यह मन घर जारे बहुतेरा ॥ जहं २ जाय तहाँ तहं फंदा । किनहु न देखा परम अनंदा ॥ जोगी जती तपी सन्यासी । ब्रह्म चार बैराग उदासी ॥ तत्त्व जार जीवको नासे । धोखा अपना नाहि बिनासे ॥ धोखा कोइ न बुझावन हारा ॥

समै-आपन घर माहुर भयो, छोड़ छोड़ पछताय ।

कहैं कवीर घर औरके, पूछत पूछत जाय ॥

(५५८)

कवारिषा-

रमैनी ६३-अंते दूढे सब संसारा । करता निकट न लखे गंवारा ॥ आद उपदेश समाध लगाई । अंग बिहूने रहा लौ लाई ॥ पांच तत्त्वका नास कराया । निराकार समाध पर आया ॥ पांच तत्त्व जीव है सोई । तत्त्व हीनता पुरुष न कोई ॥ चार ठौर गुरुवा दिखराया । तेहि धोखे मिल सुन्य समाया ॥

समै-पांचतत्त्व निज मूल है, हम करता इन माहिं ।

नख सिखते पूर्ण बना, सो फिर अंते नाहिं ॥

रमैनी ६४-धोखे २ गया समाई । धोखा की कछु खबर न पाई ॥ धोखे धोखे भया अकाजा । धोखे गया जीव विन काजा ॥ धोखे २ वह भइ न्यारी । धीरज न कीन्ह बिलग गइ नारी ॥ धोखे २ सब घर खोया । धोखे बीज धोखे कह बोया ॥ समै-हसों तो दाव परखिये, रोवों काजर ढरि जाय ।

मनही मन के बूझना, ज्यों काटे चुन खाय ॥

रमैनी ६५-हमरा यहै तन जियरा भाई । आस बांध सुन्यमें जाई ॥ आसा काल अहेरी आया । तिन मेरे तीनों पुत खाया ॥ जहं लग मोर बीज बिस्तारा । तहं लग आसा कीन्ह ख्वारा ॥ केतो चेतावों चेते नाहीं । अचेत पिंड सदा भरमाहीं ॥ कहा हमार न मानै कोई । पुरुष अपन आपन मत जोई ॥

समै-संसे खायो खेत, केत्र बर लोही भयो । वाय जगतकी रीत, हीरा जर कोयला भयो ॥ उपज विनसमें सब परे, कोई भया न थीर । करता अपन न चीन्हई, कासों कहें कवीर ॥

रमैनी ६६-हम दूढा यह सब संसारा । कोई न माने कहा हमारा ॥ सुन्य सिखरमें मन अरुझाना । सुन्य सेइके सुन्य समाना ॥ बिरला बूझै बात हमारी । धोखा न तजे बसे संसारी ॥

समै-बहुत मिले बहु भांति, मन अनमिल सब सो रहा ।

शब्दावली

(५५९)

जाते जियकी पांत, ते जग दुर्लभ पाहुना ॥ जान पूछ कुंवा न परे, तजा न पुरुष विदेह । कहैं कवीर कासों कहूँ जो छोडे झूठ सनेह ॥

रमैनी ६७—चले जात सब रंक औ राया । स्थान रहनको किनहु न पाया ॥ जो समझाऊं समझे न कोई । सुनके वचन वैरी जग होई ॥ सूसाके डर नाच बिलारी । सिंह गऊकी करे रखवारी ॥ भैसा न्याव चुकावे भाई । मछरी चढी खजूरपै जाई ॥ केचुआ सरपते कीन्ह सनेहा । घट २ रहा एक पुरुष विदेहा ॥

समै-रात दिन कछु है नहीं, सुन्य पींजरती है सूवा । कहैं कवीर रूयाल यह अटपट, नहीं जिया न सूवा ॥ जाने नहीं जान जग दीना, जानते भया बिजान । कहैं कवीर बेजानको, अबहुंक परे पहिचान ॥

रमैनी ६८—ग्रह चालको करे बिचारा । पाखंड होय जगत रखवारा ॥ द्वादस रास पृथ्वी परछाई । चौवन अच्छर वसे तेहि आई ॥ रासे रास ग्रह नौ लागे । ग्रह चालमें परे अभागे ॥ गृह-मंदिलकी खबर न पाई । ग्रहन बीच बसे सब भाई ॥ जो देखे सो ग्रहको फंदा । ग्रिहि न देखो को अनंदा ॥ नहिं जानो ग्रह कहांति आया । मोहिं नहिं काहू ग्रह बताया ॥

समै-ग्रहन नाही पर सब जगत, परे गरहन केरा भाग । मैं नहिं जानो पंडित कवे, गरहन ऐहि लाग ॥ चंदा गरहन गरासिया, ऐसे गिरहित लोग । उग्रह होन न पावई, दिन २ बाढे रोग ॥

रमैनी ६—सुख तजके जग दुख बिसाहीं । आपहिं सुख आपहिं दुखलाहीं ॥ जहां जाय तहं औरहि रीती ॥ जगकी परी काल सो प्रीती ॥ पंडित मिले ग्रह दशा बतावैं । नावत भूत प्रेत सुनावैं ॥ ऋषि मुनि कर्म कहैं समगाई । वैद्य पित्त कफ बात

(५६०)

कबीरपंथी-

बताई ॥ देखव देवी देवत बानी ॥ वात न कछु उन कहिवत जानी ॥

समै-नारायन वैदा भया, रोगी नवा संसार ।

राम २ करि पचि सुआ, कीन्ह न अपन विचार ॥

रमैनी ७०-घर सब सोवे कोउ न जागा । रैन चोर घर सूसन लागा ॥ पंडित माते पढे पुराना । ज्ञानी माते कथ २ ज्ञाना ॥ जोगी माते कान फराई । संन्यासी माते जटा बंधाई ॥ जंगम माते घंट बजाया । सेवडा माते दया बताया ॥ अघोर माते मल सुत खाई । भगत माते तिलक लगाई ॥ बैरागी माते सब कछु नासी । जिंदा माते भये उदासी ॥ कामिन माती करी सिंगार । पुरुष माते पठ राम ककहार ॥

समै--मठ अकाश बैठत हैं जोगी, चोरवा मूसे भंडार । वह चोरवाको कोई न चीन्हे, चोरवा ठाढ हुवार ॥ चोरवाको हम चीन्हा, चोरवा हमे न चीन्ह । कहें कवीर वह चोर अपरबल, सबकी वसुधा लीन्ह ॥

रमैनी ७१--चेतन रहे न चोरवा पावे । अचेत पिंड को सदा सतावे ॥ चोरवा एक जुगतते मूसे । चेतन रहे अचेतन विनसे ॥ चोरवाकी बात न जाने कोई । चोर बिडारे सब घर खोई ॥ हम चोरवाको जाननहारे । हम चोरवाते रहें निनारे ॥ जो चोरवाका जाने भेवा । आपुहि करता आपुहि देवा ॥

समै--अछै पुरुषका बीज यह, वृच्छ न जाने कोय । ताते चोरवा मूस अब, कछु ओ कहे न होय ॥ आगे हमारे साथ था, अब भा जिवका काल । कह कवीर यह चोरवा चीन्हो, मिटे जीव जंजाल ॥

शब्दावली ।

(५६१)

रमैनी ७२--नैना है पर आंधर भाई । सरवण है पै सुना न जाई ॥ जोगी है पै जुगत विहूना । बस्ती है पै मंदिल सूना ॥ त्रिया है पै पुरुष न कोई । पुरुष है पै बांह न जोई ॥ पेट तो है पै अन्न न खाई । जीव तो नहीं पै जीवत भाई ॥

समै--पंडित भेद सुनावहु, नहिं तो छांडो गांव ।

मैं पूछो तोहि पंडिता, निराकार केहि ठांव ॥

रमैनी ७३--कहो पंडित हो मोहि ससुझाई । जात बरन कुल कहाँते आई ॥ कौन मते भाइ वहिन कहावे । कौन मते व्याहले आवे ॥ कौन मते सुद्रा ब्रह्मानी । कौन मते वैश्या क्षत्रानी ॥ पाँच तत्त्वका एके भेला । ता संग भयो जीवको भेला ॥ रक्त माँस हाडू इक गूदा । तिनमें कौन ब्राह्मण सुद्रा । वही नार वही पुरुष बियाई । बिंद चौराय सुपचकी लाई ॥ तब वह केहिकी भई नारी । को भय पूत कहु पंडित विचारो ॥

समै--पंच तत्त्व हम जानत, और न जानत कोइ ।

हमरा भेद जो पावे, तब वह अस्थिर होय ॥

समै--दो संयोग जग भीतरे, कंथ भाषिनि नेह । अष्ट धातका युगल तन, एक प्राण दो देह ॥ पठ पोथी भटका मारत, घटकी जानत नाहिं । कह कवीर जो घट लखे, तो फिर घटही माहिं ॥

रमैनी ७४--जोइ नरक सोइ सरग विचारा । जो पृथ्वी सोई पतारा ॥ जो है घट सोई ब्रह्मण्डा । सोई छिद्रम छांनबे पाखंडा ॥ जोइ पुरुष सोई भइ नारी । जोइ पिता सोइ महतारी ॥ जोई गुन अवगुन है सोई । जोई पाप पुन्य है सोई ॥ जोइ निराकार सोई अकारा । जो मारे सोइ पालनहारा ॥ जो खाये सोई ना खाई । राय जोई सोइ रंक कहाई ॥

(५६२)

कवीरपंथी—

समै--नरक सरग कोइ और है, करताके नहिं काम ।

सुन कहानी तोसों कहों, ऐसे कैसे राम ॥

रमैनी ७५--पहले माया फिर आमाया । तमते फिर सुभाव ठहराया ॥ सुभावते फिर भया अकासा । अकासते वायु कीन्ह प्रकासा ॥ वायु ते अगिन अगिन ते तूवा । तुवा ते पृथ्वी औषध हुआ ॥ औषद ते अन्न अन्न ते पुरखा । पंडित जानत और सब सुरखा ॥

समै--कहो पंडित कछु न हता, केहिंते भया अकार । कहें कवीर कैसे रचा, कहो प्रगट विचार ॥ पांच तत्त्व गुन तीन जो, जियरा तिहि संयोग । संजोगे सब कुछ भया, झूटे बोलत लोग ॥ पांचोका भेला पडा, प्रान वसे ता माहिं । कहें कवीर भेला छुटे, फिर यह जियरा नाहिं ॥

रमैनी ७६--अवस्था चार सुकति भई भाई । जाग्रित स्वप्न सुषोपति आई ॥ तुरिया भई तब ब्रह्म समाना । मेटा फिर उन आवन जाना ॥ सालोक साहूप औ भया साजुजा । सामीप भया तब जोत प्रदिजा ॥ ज्ञान प्रदीप जबे कछु होई । जोतमें जोत मिले तब कोई ॥ चार अवस्था पर जब आई । चार सुकति ले सुन्य समाई ॥

समै-सुन्यको होती सब कहो, जहां सुन्य तहां नाहिं ।

सुकत अवस्था कुछ नहीं, जिव पर संशय माहिं ॥

चार चौकडी संशय गई, संशय तऊ न छूट ।

कहें कवीर सोई ब्रह्मज्ञानी, क्या कहूं वैकुण्ठ ॥

रमैनी ७७--जीव सुकत निराधार कहाया । पसन मध्यमा बैखरी माया ॥ दोनों कीन है दोय शरीरा । ना माया पांच धरे कवीरा ॥ ऊपर सोवे वासना बासे । दोऊ शरीरका सोई बिनासे ॥

शब्दावली

(५६३)

पांच तत्त्वका जात है सोईं । नौ तत्त्वका जो राखे कोई ॥ तन छूटे तेहि माहिं समाईं । दोहरा नौतम कैसे पाईं ॥

समै-कुम्भ भरा जो फूटे, दूसरे में क्यों जाय ।

कहे कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, कैसे अंत जीव समाय ॥

जीव न अंते जात है, जैसे घटको नीर ।

यह शरीर घट जीवको, समझाय कहें कवीर ॥

सो गुन कबहुं न बीसरे, जो गुन होत शरीर ।

मन भरमत चौरासी, कहहिं पुकार कवीर ॥

स्नेत कृष्ण जिय पीयरा, हर! लाल जिय जान ।

पांच तत्त्वके रंग रंगो, पांचोंको पहिचान ॥

रमैनी ७८-नेम घरम पूजा लपटाना । ज्ञान कथा अस्थान न जाना ॥ अस्थान भङ्ग देखे सब कोई । अस्थान लखे विन थित न होईं ॥ रिषि औ मुनि अस्थान न भाषे । प्रेम धाम अस्थान सो राखे ॥ कथा कवित्त बहुत कुछ गाया । करताका अस्थान न पाया ॥

समै-पांच तत्त्व अस्थान निज, इन्हि विहूना नाहिं ।

कहें कवीर बूझो ब्रह्मज्ञानी, जनि पर संशय माहिं ॥

रमैनी ७९-तीरथ व्रत रहा लौ लाई । देव दिवाले देव मनाई ॥ पितरके नाम सराध करावे । आपहिं नरक सरग ले जावे ॥ बिनती करके देये मयारू । अबकी बार प्रभु मोहि त्यारू ॥ कहे गुरु मोहिं पार लगाई । ताते गुरुवा मंत्र लियो भाई ॥ गुरु मंत्र लीना जिव जानी । गुरु शिष्यकी न त्रिषा बुझानी ॥ घर २ होय निरगुनकी सेवा । निरगुन मंत्र दियो गुरुदेवा ॥

समै-सिक्ख समाना गुरुहमें, निजके लागा नेह । बिलगाये बिलगे नहीं, एक परान दो देह ॥