कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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समै-भगति २ सब कोई कहे, भगति न आई काज ।
जहँका किया भरोसवा, तहँ ते आई गाज ॥
रमैनी २७-यह अचरज मोहिं निस दिन भारी । वाही देस जात नर नारी ॥ वही देवकी खबर न पाई । काहू वहाँ ते कहि न पठाई ॥ हम सुख रहत तुमहूँ चलि आवो । कि हम दुख तहाँ महुँ बोलावो ॥
समै-समझो भाई ज्ञानी नर, काहु न कहो संदेस ।
जे गये सो नाहिं न बहुरे, सो वह कैसा देश ॥
रमैनी २८-बूझो पंडित बात हमारी । आधा नारी पुरुष विचारी ॥ कौन नारि को पुरुष कहावे । किसको निसिदिन सब कोई धावे ॥ संयोग लाग निरगुन विन पानी । करता ते फिर क्यों अनखानी ॥ पुरुष संयोग पुरुषको छाया ॥ तब माता पुत्रनको खाया ॥
समै-चारों जुग समझाइया, न समझे सुत नारि । कहें कवीर अब कासो कहिये, अपनी चूकी हार ॥ माताते डाँइन भई, लिया जगत सब खाय । कहें कवीर हम क्या करें, जगत नाहिं पतियाय ॥ ससा सिंहको खाइया, हरना चीता खाय । कहें कवीर चींटी गज मारी, बिल्ली सूसा धाय ॥
रमैनी २९-बीज वृच्छकी सार न जानी । कहो पंडित कैसे ब्रह्मज्ञानी ॥ बीज वृच्छका होय विनासा । तब पावे ठाकुरमें बासा ॥ मैं तोहि पूछो कहो ब्रह्मज्ञानी । कैसे जोतमें जोत समानी ॥ जिवको भेद लखे नहिं कोई । उपनिषद नास कह सब कोई ॥ करता सबका सिरजन हारा । पंडित नाहीं वेद विचारा ॥
समै-बीज वृच्छ दोनों कायामें, कबहुँ नास न होय । कहे
कबीरपंथी शब्दावली १८