कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(५३४)
कबीरपंथी—
न आना ॥ गुरुकी सेवा मुक्ति निज पावे। बहुरि न हंसा भवजल आवे ॥ भवजल छूटत यही उपाई। गुरुकी सेवा करो सब धाई ॥
सा०-मतगुरु दीनदयाल है, देवे भक्ति मुकाम। मनसा वाचा कर्मना, सुमिरो मतगुरु नाम ॥ सत्य सबदके पटतरे, देवेको कछु नाहिं। कहले गुरु संतोषिये, हवस रही मनमाहिं ॥ अति ऊँडा गहरा घना, बुद्धिवन्त मतिधीर। सो धोखा विरचे नहीं, सतगुरु मिलहि कवीर ॥
रमैनी १७-गुरु देवनकी महिमा वरनो। जयगुरुदेव तुम्हारी सरनो ॥ गावत जे गुन पार न पावे। ब्रह्मा शंकर सेष गुन गावे ॥ प्रथमहीं गुरु ऐसा कीन्हा। तारक मंत्र रामको दीन्हा ॥ माथा तिलक दिया सरूपा। जाको बन्देराजा भूपा ॥ ज्ञान गुरु उपदेश बताया। दया धरमकी राह चिन्हाया ॥ जीव दया घटहीमें होई। जीव दया ब्रह्म है सोई ॥ गुरु आधीन सु चेला बोले। खरा शब्द उर अन्तर खोले। खारा मीठा बचने खमैं। गुरुके चरणों चेला रमैं ॥ भीतर हिरदे गुरुसों हिले। ताके पीछे रामहिं मिले ॥ गुरु रीझे सो कीजे कामा। ताके पाछे रामहिं रामा। सिस सरसती गुरु जमुना अंगा। राम मिले सब सरिता गंगा ॥ चेला गुरुमें गुरुमें राम। भगति महात्म नियारा नाम ॥ गुरु आज्ञा निरबाहे नेम। तब पावे सरवग्गी प्रेम ॥ सरवग्गी राम सकल घट सारा। है सबहीमें सबसो न्यारा ॥ ऐसी जाने मनमें रहे। खोजे बूझै तासो कहै ॥ गुरुकी महिमा संछेप भनी। गुरुकी महिमा अनंत घनी ॥ औतार धरे हरि गुरु करे। गुरु किये तब नारद तरे ॥ साख पुरातम ऐसी सुनी। बात हमारी गुरुसों बनी ॥ कीडी जैसा मैं हौ दासा। पडा रहा गुरु चरणों पास ॥ गुरु चरणों राखो विश्वासा। गुरुहि पुरावे मनकी आसा ॥