भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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जनमको मिटे संतापा ॥ गुरुके चरण सदा चित दीजे । जीवन जन्म सुफल कर लीजे ॥ गुरुके चरण सदा चित जानो । क्यों भूले तुम चतुर स्यानो ॥ गुरु भगता मम आतम सोई । वाके हिरदे रहो समोई ॥ गुरु सुख ज्ञान ले चेतो भाई । मानुष जन्म बहुरि नहि पाई ॥ सुख संपति आपन नहि प्राणी । समझि देखु तुम निश्चय जानी ॥ चौविस गुरु हरि आपहि करिया । गुरु सेवा हरि आपहि धरिया ॥ गुरुकी निंदा सुने जो काना । ताको निश्चय नरक निदाना ॥ दशवाँ अंश गुरुको दीजे । जीवन जनम सुफल कर लीजे ॥ गुरु सुख प्राणी कोइ न दीजे । ह्रिदय नाम सदा रस पीजे ॥ गुरु सीढी चढ़ि ऊपर जाई । सुखसागरमें रहे समाई ॥ अपने सुख निंदा जो करई । शूकर स्वान जनम सो धरई ॥ निगुरा करे मुक्ति कर आसा । कैसे पावे मुक्ति निवासा ॥ औरो सुकित देइ जो पावे । सतगुरु बिन मुक्ती नहि आवे ॥ गौरी शंकर और गनेशा । सबही लीन्हा गुरु उपदेशा ॥ शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा ध्रुवको दीन्हा ॥ सतगुरु मिले परम सुखदायी । जनम जनमका दुख नसायी ॥ जब गुरु किया अटल अविनासी । सुर नर मुनि सब सेवक रासी ॥ भवजल नदिया अगम अपारा । गुरु विनु कैसे उतरे पारा ॥ गुरु विनु आतम कैसे जाने । सुखसागर कैसे पहिचाने ॥ भक्ति पदार्थ कैसे पावे । गुरु विनु कौन जो राह बतावे ॥ गुरु सुख नाम देव रेदासा । गुरु महिमा उनहूँ परकासा ॥ तैतिस कोट देव त्रिपुरारी । गुरु विनु भूले सकल अचारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके वासी ॥ गुरु विनु पसू जनम सो पावे ॥ फिर २ गरभ बासमें आवै ॥ गुरु विमुख सोई दुख पावे । जनम जनम सोई डहकावे ॥ गुरु सेवै जो चतुर स्याना । गुरु पटतर कोइ और