भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 546, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 546

(५३२)

कवीरपंथी—

चौरासी भरमें सो जाई । नारद साख कहौ समझाई ॥ नारद ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । अहैं प्रसिद्ध जगत सब जानी ॥ ३ ॥ सो गुरुको छोट बखाना । ताके मन अभिमान समाना ॥ ताते हरि चौरासी दीना । सकलो पुण्य छीन सो लीन्हहा ॥ ४ ॥ छूटन राह कहा करि ओही । विनु गुरु शरण मुक्ति नहिं सोही ॥ ओही गुरु सो करे बचावा । दूसर मारग नाहिं दिखावा ॥ ५ ॥ सा०—वेद किताब शास्त्र अरु, पोथी कहत पुरान ।

गुरु विन भवसागर महा, छूटे नाहिं निदान ॥

रमैनी १६—गुरुकी शरणा लीजै भाई । जाते जीव नरक नहिं जाई ॥ गुरु मुख हो परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥ गुरु पद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहिबकी होई ॥ गुरु विन मुक्त न पावे भाई । नरक उर्द्ध मुख बासा पाई ॥ गुरुकी कृपा कटे यम फाँसी । विलंब न होय मिले अविनासी ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । ज्यों थोथा भुस छडे किसाना ॥ गुरु महिमा शुक्रदेव जु पाई । चढि विमान वैकुंठे जाई ॥ गुरु विनु पढै जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिले भगवाना ॥ गुरु सेवा जो करे सुभागा । माया मोह सकल भ्रम भागा ॥ गुरुकी नाव चढे जो प्राणी । खेह उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥ तीरथ वरत अरु सब पूजा । गुरु विन दाता और न दूजा ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्धा । गुरुके चरण सेवे गोविंदा ॥ गुरु विन प्रेत जनम सब पावे । वरष सहस्र गरभ सो रहावे ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करई । मिथ्या होय कबहुँ नहिं फरई ॥ गुरु विनु भरम न छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ॥ गुरु विन होम यज्ञ जो साधे । औरो मन दश पातक लाधे ॥ सतगुरु मिले तौ अगम बतावे । जमकी आँच ताहि नहिं आवे ॥ गुरुके मिले कटे दुख पापा । जनम