कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी-
सतगुरु कहैं गुरु व्रतधारी । अगुन सगुन बिच गुरु अधारी ॥५॥ सा०-यह भव अगम अथाह है, काल जाल वह धार ।
पार होनको द्वार इक, गुरु गिरा कडिहार ॥
रमैनी ८-गुरु विना नहि होय अचारा । गुरु विना नहि होय भवपारा ॥ शिष्य सीप गुरु स्वाती जानो । गुरु पारस शिष लोह समानो ॥१॥ गुरु मल्यागिर शिष्य भुजंगा । गुरु परसि शीतल होय अंगा ॥ गुरु समुद्र है शिष्य तरगा । गुरु दीपक है शिष्य पतंगा ॥२॥ शिष चकोर गुरुको शसि जानो । रवि गुरु कमल शिष्य विकसानो ॥ यहि स्नेह सिष निश्चय लहई । गुरु पद परसि दरस हिये गहई ॥३॥ गुरु गुरुमें भेद विचारा । गुरु गुरु कहे सकल संसारा ॥ गुरु सोईं जिन शब्द लखाया । आवा- गमन रहित पद पाया ॥४॥ गुरु सजीवन शब्द लखावे । जाके बल हंसा घर जावे ॥ वा गुरुसो कछु अन्तर नाही । गुरु अरु शिष्य मता इक आही ॥ ५ ॥
सा०-गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ।
गुरु सदा सो वन्दिये, सबद बतावे दाव ॥
रमैनी ९-सतगुरुकी बलिहारी जावे । अजर दशा जो आन बतावे ॥ अमि अजरावलि अजरा धामा । सत्य नाम सत्य पुरुष निजनामा ॥१॥ गुरु किरपा करि सो पद पावे । जीवन मुक्त अटल घर जावे ॥ निसिदिन सुरत गुरु सो लावे । साधु सन्तके मनहि समावे ॥२॥ जिनपर दया गुरुकी होई । तिनका फांस करम सब खोई ॥ करनी करके सुरत लगावे । सतगुरु लोक ताहि पहुँचावे ॥३॥ सेवा करि मन रखै न आसा । ताका सत- गुरु काटै फाँसा ॥ गुरु चरणन जो राखे ध्याना । अमर लोक सो करत पयाना ॥४॥ जोगी जोग साधना करई । विना गुरु