कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 541, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(५२७)
सा०-गर्भ जोगेसर गुरु बिना, लागे हरिकी सेव । कह कवीर वैकुंठसे, फेर दियो सुकदेव ॥ जनक विदेही गुरु किया, लागा हरिकी सेव । कह कवीर वैकुंठमें, उलट मिला सुकदेव ॥
रमैनी ६-ब्रह्मा सुत नारद बड ज्ञानी । जिनकर कथा जगत सब जानी ॥ हरि करते चौरासी परिया । गुरु किरपाते तुरत उबरिया ॥१॥ और देव गिषि मुनिवर जेते । जिन गुरु कीन्ह उत्तर सो तेते ॥ बिना गुरु भवसागर डूबे । उब डुब होय पार नहीं ऊबे ॥ २ ॥ जो गुरु मिले तौ पंथ बतावे । सार असार परख दिखलावे ॥ गुरु सोई जो सत्य बतावे । और गुरु कोइ काम न आवे ॥३॥ सत्त पुरुषका कहे संदेशा । जनम जनमका भिटै अंदेशा ॥ पाप पुत्रकी आसा नाही । बैठे अछय वृक्षकी छाँही ॥४॥ भ्रिगी मत होवे जिहि पास । सोई गुरु सत्त सुनौ धर्मदासा ॥ गुरुते अधिक और कोइ नाही । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥५॥
सा०-ऐसे गुरुके मिलनसे, आवा गमन नसाय ।
विन गुरु ज्ञाने दुन्द हो, काल फाँसमें जाय ॥
रमैनी ७-जीवन मुक्ति चाहु जो भाई । सतगुरु शब्द गहे सो आई ॥ जमसे यही छुडावन हारे । निश्चय मानो कहा हमारे ॥१॥ बहुरि न जोनी संकट आवे । जो जिव नाम शरण गति पावे ॥ तजि संसार लोक कई जाई । नाम पान गुरु होय सहाई ॥२॥ गुरुके बचन हिया सुध होई । दीपक ज्ञान परगटे तहँ सोई ॥ धर्मनि यह गुरु पद परतापा । गुरु पद गहे भरम तजि आपा ॥३॥ सिन्धु बुन्द समावे जाई । कहे कवीर मिटी दुचिताई ॥ सरन गहे सब दुख नसाई । विन गुरु शिष्य निरासे जाई ॥४॥ गुरु सम दानी और न भाई । आवत सरन सकलो निधि पाई ॥