भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 514

(५००)

कवीरपंथी—

सुमिरन करै । अरे हों अवधू ! सुकृत पडे न चीन्ह, नहीं संसै टरै ॥ २९ ॥

षष्ण-षोजो खोजी होय, षोज नाही मिलै । खोजी खोज सिरी न, कहो तुम कहाँ चले ॥ जहाँ मिलनकी मौज, खोज तहाँ ना किया । अरे हों अवधू ! खायो मूल गँवार, खसम दिल ना दिया ॥ ३१ ॥

सस्सा-सत्य सुकृत सतनाम, सबनमें सांच है । सत रूप जगमाहिं, तो मनसा बाच है । संशय टारन भयहरन, सब कल निधि है सही । अरे हों अवधू ! जो पूछो सो कही, अब का कही ॥ ३२ ॥

हहा-हाजिर सो हजूर, गाफिली दूर है । हिरदा कमलमें हंस, सजीवन मूर है ॥ हँसे हँसावे आप, सबनमें सोह है । अरे हों अवधू ! हितकर देख विचार, वचन यह सोह है ॥ ३३ ॥

छछा-छल जो गया सब छूट, महा आनन्द भया । मिटी जो जमका त्रास, छत्र सिरपर धरा ॥ छाप सतकी पड़ी काज पूरन भया । अरे हों अवधू ! कहे कवीर विचार, विछड़ मिलना भया ॥ ३४ ॥

सा०-शीलवन्त सुजन जन, हिरदे प्रेम प्रकास । सत्य टेक शब्दे गहे, सोजन सदा निवास ॥

इति चौतीसा पहला ।

अथ दूसरा चौतीसा प्रारम्भः २ ॥

कक्का-काया कुंज करमकी बारी, कर्ता बाग लगाया । किन- का तामे अजर समाना, बिन बेली पलुहाया ॥ पांच पचीस फूल तहाँ फूले, मन अलि तहाँ लुभाना । वा फूलनके लपट विषयरस, रमता राम भुलाना ॥