कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(४९३)
डहकावा ॥ ४२ ॥ कालै धौ परपंच बनाये । ये परपंच न काहु पाये ॥ तेहिंते बचिके बाहिर आये । हुए निनार सो हंस कहहाये ॥ ४३ ॥ हंस होइ बहुते सुख पावा । जोनी संकट बहुरि न आवा ॥ हंस चाल चले जो कोई । ताको आवागमन न होई ॥ ४४ ॥ चाल बिना लागै बड बारा । तहवां नाही दोष हमारा ॥ यही बात कहै समझाई । तेई हंसको धोख छुडाई ॥ ४५ ॥
सा०-कहत कवीर हंसनते, धरमराइको लूट ।
अमरको निहचल करौं, भवजल जाई छूट ॥ ६ ॥
रमैनी-जीव काजको हम चलि आये । आइ देसको मंझा पाये ॥ मंझा लीना देस हम आई । राजा खोट अनीत तहांई ॥ ४६ ॥ रइयत कर कर मार उजारी । ऊंचेते नीचे ले डारी ॥ नीचे डारे सब संसारा । हमरे शब्द बिनु नाहि सहारा ॥ ४७ ॥ सेवा करै जस मोलक लीनौ । सहस आस उन विनती कीनौ ॥ उहिको पच्छ करै जो कोई ॥ सोच विचार रहै पुन सोई ॥ ४८ ॥ रहै दुचित वह चैन न लेई । जस घरही मार घरही बध देई ॥ हाथक दीना खाइ अधीना । बाकी अटक रहै लौलीना ॥ ४९ ॥ अस जिव काम किये मन ऐई । जस पकड बहलिया दुख देई ॥ जो भावे सो करै विचारा । ऐसे काल जगत यह मारा ॥ ५० ॥ तेई कालको मरम न पावा । सेवा संजम बहुत दिढावा ॥ छोडे गिरह परिवार घनेरा । कह सो गुरु भला कर मेरा ॥ ५१ ॥ कहौ गुरु कहवाँते आवा । कहो गुरु कौनै समझावा ॥ इतनी बुझ न करै अधीना । फटी आँख न कहैं हम चीन्हा ॥ ५२ ॥ घरे गुरु घरही घर चेला । जैसे उठरू चले अपेला ॥ कान न करै कहौ नहीं मानै ॥ जहँ जहँ रुचै तहँ तहँ तानै ॥ ५३ ॥ अस विचार इन सब मिल कीना । झूठे खसमहि सरबस दीना ॥