भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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( ४७६ )

कवीरपंथी—

चौदह विद्या पढि समुझावै । अपने मरनकी खबर न पावै ॥ जाने जिवको परा अंदेसा । झूठहि आनिकै कहा संदेसा ॥ संगति छोडि करै अस रागा । उब है मोट नरक कर भारा ॥ ४३ ॥

सा०—गुरु द्रोही औ मन सुखी, नारि पुरुष विचार ।

ते नर चौरासी अप्रि है, जौलौ शशि दिनकार ॥ ४३ ॥

रमैनी चौवालीसवी ॥ ४४ ॥

कबहुँ न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ बहुरि न पैहौ ऐसो थाना । साधु संग तुम नहिं पहिचाना ॥ अब तोर होइ नरकमें बासा । निस्त्र दिन बसे लबारके पास ॥ ४४ ॥

सा०—जात सबन कहैं देखिया, कहहिं कवीर पुकार ।

चेतवाहोहु तो चेतिले, दिवस परत है धार ॥ ४४ ॥

रमैनी पैतालीसवी ॥ ४५ ॥

हिरण्यकुश रावण गौ कंसा । कृष्ण गये सुर नर मुनि बंसा ॥ ब्रह्मा गये मरम नहिं जाना । बड सब गये जो रहे सयाना ॥ समुझि परी नहिं राम कहानी । निरबक दूध कि सरबक पानी ॥ रहिगौ पंथ थकित भौ पवना । दशो दिशा उजारि भौ गवना ॥ मीन जाल भौ इ संसारा । लोहकि नाव पषानको भारा ॥ खेवे सबै मरम नहिं जाना । तहिबो कहै रहै उतराना ॥ ४५ ॥

सा०—मछरी मुख जस केंचुवा, मुखवन मुँह गिरदान ।

सर्पन मुँह गहेजुवा, जात सबनको जान ॥ ४५ ॥

रमैनी छयालीसवी ॥ ४६ ॥

विनसै नाग गरुड गलि जाई । विनसै कपटी औ सतभाई ॥ विनसे पाप पुण्य जिन्ह कीन्हा । विनसे गुन निर्गुन जिन चीन्हा ॥ विनसे अग्नि पवन औ पानी । विनसे सूछि कहाँ लौ गानी ॥ विष्णु लोक विनसे छन माहीं । हौ देखा परलैकी छाँही ॥ ४६ ॥

सा०—मछ रूप माया भई, यमरा खेलै अहेर ।

इहिर ब्रह्म न उबरे, सर नर मुनि केहि केर ॥ ४६ ॥