कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
चौदह विद्या पढि समुझावै । अपने मरनकी खबर न पावै ॥ जाने जिवको परा अंदेसा । झूठहि आनिकै कहा संदेसा ॥ संगति छोडि करै अस रागा । उब है मोट नरक कर भारा ॥ ४३ ॥
सा०—गुरु द्रोही औ मन सुखी, नारि पुरुष विचार ।
ते नर चौरासी अप्रि है, जौलौ शशि दिनकार ॥ ४३ ॥
रमैनी चौवालीसवी ॥ ४४ ॥
कबहुँ न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ बहुरि न पैहौ ऐसो थाना । साधु संग तुम नहिं पहिचाना ॥ अब तोर होइ नरकमें बासा । निस्त्र दिन बसे लबारके पास ॥ ४४ ॥
सा०—जात सबन कहैं देखिया, कहहिं कवीर पुकार ।
चेतवाहोहु तो चेतिले, दिवस परत है धार ॥ ४४ ॥
रमैनी पैतालीसवी ॥ ४५ ॥
हिरण्यकुश रावण गौ कंसा । कृष्ण गये सुर नर मुनि बंसा ॥ ब्रह्मा गये मरम नहिं जाना । बड सब गये जो रहे सयाना ॥ समुझि परी नहिं राम कहानी । निरबक दूध कि सरबक पानी ॥ रहिगौ पंथ थकित भौ पवना । दशो दिशा उजारि भौ गवना ॥ मीन जाल भौ इ संसारा । लोहकि नाव पषानको भारा ॥ खेवे सबै मरम नहिं जाना । तहिबो कहै रहै उतराना ॥ ४५ ॥
सा०—मछरी मुख जस केंचुवा, मुखवन मुँह गिरदान ।
सर्पन मुँह गहेजुवा, जात सबनको जान ॥ ४५ ॥
रमैनी छयालीसवी ॥ ४६ ॥
विनसै नाग गरुड गलि जाई । विनसै कपटी औ सतभाई ॥ विनसे पाप पुण्य जिन्ह कीन्हा । विनसे गुन निर्गुन जिन चीन्हा ॥ विनसे अग्नि पवन औ पानी । विनसे सूछि कहाँ लौ गानी ॥ विष्णु लोक विनसे छन माहीं । हौ देखा परलैकी छाँही ॥ ४६ ॥
सा०—मछ रूप माया भई, यमरा खेलै अहेर ।
इहिर ब्रह्म न उबरे, सर नर मुनि केहि केर ॥ ४६ ॥