कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रमैनी चालीसवीं ४० ॥
आदम आदि सुद्धि नहिं पाईं । मामा हउआ कहांते आईं ॥ तब नहिं होते तुरुक औ हिन्दू । मायाके रुधिर पिताके बिन्दू ॥ तब नहिं होते गाय कसाई । तब विस मिल्लाः किन फरमाईं ॥ तब नहिं रह्यो कुल औ जाती । दोजरव भिस्त कहां उतपाती ॥ मन मसलेकी खबरि न जाने । मति मुलान दोइ दीन बखाने ॥
सा०-संयोगेका गुण रवे, विन योगे गुण जाय ।
जिभ्या स्वादके कारणे, कीन्हे बहुत उपाय ॥ ४० ॥
रमैनी इकतालीसवीं ४१ ॥
अम्की रासि ससुद्रकी खाई । रवि मसि कोटि तैंतीसौ भाई ॥ भैवर जालमें आसन माडा । चाहत सुख दुख संग न छाडा ॥ दुखको मर्म काहु नहिं पाया । बहुत भांतिके जग भर्माया ॥ ( बौराया ) ॥ आपुहि बाउर आपु सयाना । हृदय बसत राम नहिं जाना ॥
सा०-तेई हरि तेइ ठाकुरा, तेई हरिके दास ।
न जम भया न जामनी, भामिनी चली निरास ॥ ४१ ॥
रमैनी बयालीसवीं ४२ ॥
जब हम रहल रहा नहिं कोई । हमरे माँहिं रहल सब कोई ॥ कहहु हो राम कौन तोरि सेवा । सो ससुझाय कहौ मोहि देवा ॥ फुर फुर कहउँ मारु सब कोई । झूठेहि झूठा संगति होई ॥ आंधर कहे सबै हम देखा । तहें दिठियार बैठि सुख पेखा ॥ यहि विधि कहौ मालु जो कोई । जस सुख तस जो हृदया होई ॥ कहहि कवीर हंस मुसकाई । हँमरे कहल दुष्ट बहु भाई ॥ ४२ ॥
रमैनी तैंतालसीवीं ॥ ४३ ॥
जिन्ह जिव कीन्ह आपु विश्वासा । नरक गये ते नरकहिं बासा ॥ आवत जात न लागहि बारा । काल अहेरी साँझ सकारा ॥
१ मुस्ताई । २ हमरे कहल छुठिही भाई ।