भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

सा०-ते नर मरिके कहाँ गये, जिन दिन्हा गुर घोटि । राम नाम निज जानिकै, छाडहु बस्तू खोटि ॥३६॥

रमनी संतोषवी ३७ ॥

एक सयान सयान न होई । दूसर स्यान न जाने कोई ॥ तीसर सयान सयाने खाई । चौथ सयान तहाँ ले जाई ॥ पँचये सयान न जाने कोई । छठये महाँ सब गये विगोई ॥ सतये सयान जो जानहु भाई । लोक वेदमें देहु देखाई ॥

सा०-बीजक बतावै बितको, जो बित गुता होय । शब्द बतावै जीवको, बूझे विरला होय ॥३७॥

रमनी अदतीसवी ३८ ॥

यहि विधि कहाँ कहा नहि माना । मार्ग मांहि पसारिनि ताना ॥ राति दिवस मिलि जोरिनि तागा । ओटत कातत भर्म न भागा ॥ भर्म सब घट रह्यो समाई । भर्म छाडि कतहुँ नहिं जाई ॥ परै न पूरि दिनौ दिन छीना । तहाँ जाय जहाँ अंग विहीना ॥ जो मति आदि अन्त चलि आया । सो मति उन सब प्रगट सुनाया ॥

सा०-वहै संदेश फुर मानिकै, लीन्हो सीस चढाय । संतो है संतोष सुख, रहहु हृदय जुडाय ॥३८॥

रमनी उत्तालीसवी ३९ ॥

जिन्ह कलमां कलि माह पढाया । कुदरत खोज तिन्हुँ नहिं पाया ॥ करमत कर्म करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥ करमत सो जो गर्भ औतरिया । करंमत सो निमाज गुजरिया ॥ करमत सुन्नति और जनेऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥

सा०-पानी पवन संजोयकै, राचयाई उत्पात । शून्यहि सुरति समानिया, कासों कहिये जात ॥३९॥

१ करमत सो जो नामहि धरिया ।