भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४७)

निर्विकार निर्भय तुही, और सकल भय माहिं । सबपर तेरी साहिबी, तुझ पर साहेब नाहिं ॥ १५ ॥ भय भञ्जन दुख परिहरन, अम्बर करन शरीर । आदि युगादि आप हौ, अदली अदल कबीर ॥ १६ ॥ विनवतहों कर जोरि के सुनु गुरु कृपानिधान । संतन का सुख दीजिये, दया गरीबी जान ॥ १७ ॥ दया गरीबी वन्दगी, समिता शील सुभाव । इतने लक्षण साधुके, कहैं कबीर विभाव ॥ १८ ॥ बहुत दिननसे जोहता, बाट तुम्हारी राम । जिव तरसे तुव मिलनको, मन नाहीं विश्राम ॥ १९ ॥ सो दिन कैसा होगा, गुरु गद्दोगे बांह । अपना कर बैठावगे, चरण कमल की छांह ॥ २० ॥ क्या मुखले विन्ती कहुँ, लाज आवत है मोहि । हमतो औगुन बहु किये, कैसे भावो तोहि ॥ २१ ॥ सुरति करु मोरि साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं । आपेही बहिजायँगे जो नहिं पकडो बांहि ॥ २२ ॥ मैं अपराधी जनम का, नख सिख भरा विकार । तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो उबार ॥ २३ ॥ औगुन मेरे बापजी, बखशो गरीब निवाज । जो हौं पूत कपूत हौं, तोहु पिताको लाज ॥ २४ ॥ साहब तुम जनि वीसरो, लाख लोग लगि जाहिं । हम सन तुम्हरे बहुत हैं, तुम सन हमरे नाहिं ॥ २५ ॥ कर जोरे विन्ती कहुँ, भवसागर आपार । बन्दा ऊपर मिहर करी, आवागमन निवार ॥ २६ ॥