कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी-
अन्तरजामी एक तू, आतम के आधार । जो तू छाडे साथको, कौन उतारे पार ॥ २७ ॥ अबकी जो साई मिले, सब दुख आँखों रोय । चरणों ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥ २८ ॥ साहब तुमहिं दयाल हो, तुम लग मेरी दौर । जैसे काग जहाज को, सुझे और न ठौर ॥ २९ ॥ मुझमें अवगुन तुझहि गुन, तुझगुन अवगुन मुझ । जो मैं विसरूँ तुझको, तू नहिं विसरे मुझ ॥ ३० ॥ तेरे विसरे क्यों बने, मैं किस शरने जाँव । शिवविरंचि मुनि नारदा, तिन हृदय नसमाव ॥ ३१ ॥ मैं तो भूल बिगारिया, जनिकर मैला चित्त । साहब गुरुवा चाहिये, नफर विगारे नित्त ॥ ३२ ॥ औगुन किया तो बहु किया, करत न मानी हार । भावे बन्दा बखशिये, भावे गर्दन मार ॥ ३३ ॥ साई केरा बहुत गुन, औगुन एको नाहिं । जो दिल खोजा आपना, सब अवगुनमुझ माहिं ॥ ३४ ॥ मुझमें गुन एको नहीं, जान राय शिर मौर । तेरे नाम प्रतापसे, पाऊँ आदर ठौर ॥ ३५ ॥ मैं खोटा साई खरा, मैं गादा मैं गारि ॥ मैं अपराधी आत्मा, साई सरन उबारि ॥ ३६ ॥ और पतित तो कूप हैं मैं हूँ समुद्र समान । मोहि टेक तोहि नामकी, सुनियो कृपानिधान ॥ ३७ ॥ अवसर बीता अलप तन, पीव रहा परदेश । कलंक उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥ ३८ ॥