भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(४९)

साई मोर सावध अहै, मैही भया अचेत । मन बच कर्म न हरि भजा, ताते निरफल खेत ॥ ३९ ॥ मन परतीत न प्रेमरस, ना कोइ तनमें ढंग । ना जानो वा पीवसो, कयोंकर रहसी रंग ॥ ४० ॥ साई तो जब मिलेंगे, पूछेंगे कुशलात । आदि अन्तकी सब कहूँ, उरअन्तरकी बात ॥ ४१ ॥ अब सागर तो भारी भया, गहरा अगम अथाह । तुम दयाल दयाकरो, तब पाऊँ कछुथाह ॥ ४२ ॥ सतगुरु बडे दयाल हैं, संतनके आधार । भव सागर अथाहसो, खेइ उतारें पार ॥ ४३ ॥

विज्ञानतोत्र

सत्य सत्यके नामसों सत्य सागर भरा, सत्यके नाम तिहुँ लोक छाजा ॥ सन्तजन आरति करें प्रेमतारी भरेँ, ढोलनिश्शान मिरदंग बाजा ॥ भक्ति सांची किया नाम निश्चैलिया, शून्यकी शिखर ब्रह्माण्ड गाजा ॥ सत्य कवीर सर्वज्ञ साहब मिले; भजो सत्यनामका रंक राजा ॥ कबीर, हम दीन दुनी दरवेशा । हम किया सकल परवेशा ॥ हम दुवा सलामत लेखा । हम शब्द सरूपी पेखा ॥ हम रुंध मुंड में फीरा । हम फाका फकर फकीरा ॥ हम रमे कौन की नाल । हम चलैं कौन की चाल ॥ हम सरबझी सहजे रमे, हमरी वार न पार ॥ वार भी हमही पार भी हमही, नाना दरिया तीर ॥ सकल निरंतर हम रमे, हम गहिरे गहर गंभीर ॥ खाली खलक खलक के माँही, यों गुरु कहैं कबीर ॥ सत्यनाम की आरती, निरमल भया शरीर ॥ सत सुकृत लौलीन है, ज्ञान ध्यान लो थीर । “धर्मदास लोके गये गुरु बहिंयां मिले कबीर” धर्मदास लोके गये, छाड़ि सकल