भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

शब्दावली

(५३)

निर्मल, बहुरि न भोजल आइये ॥ साहब कबीर प्रकाश सदगुरु, भली सुमति दिठाइये । सार में ततसार दरसे, सोई अकल कहाइये । धर्मदास पट खोलि देखो, तत्त्व में निहतत्त्व है । कहैं कबीर निहतत्त्व दरसे, आवागमन निवारिये ॥

इति श्रीव्यासागरस्तुति समाप्तः

चेतावनी

नमो ! नमो धर्मनि पातक, पूर रहो मद काम । जिनको लोक बासा दिया, अधम उधारण नाम ॥ अनेक बन्धनते बाँधिया; एक विचारा जीव । अपने बल छूटे नहीं, तुमहिं छुडावहु पीव ॥ मैं अपराधी जनमका, नख शिख भरा विकार । तुम दाता दुख भजना, मेरी करो उबार ॥ अवगुण मेरे बापजी बकसो गरीब निवाज । मैं तो पूत कुपूतहों, तुम्ही पिता कोलाज ॥ विनती है निज दास की, सुनिये दीनदयाल । दास आपनो जानिके, सतगुरु होहु कृपाल ॥ 'कबीर' जम्मन जाय पुकारिया, धर्मराय दरबार । हंस मवासी है रहा, लगे न फाँस हमार ॥ हमरी शंका ना करे, तुम्हरी धरै न धीर । सतगुरु के बल गाजहीं, कहैं कबीर कबीर ॥ कबीर कहंता जानदे, मेरी दसी न जाय । खेवटिया के नाव पर, चढ़े चनोरे आय ॥ बाजा बाजा रहित का, परानगरमें शोर ॥ सदगुरु खसम कबीर है नजरन आवे और ॥

सत्यका शब्द

सत्का शब्द सुन भाई फकीरी अदल बादशाही ॥ साधो बन्दगी दीदार । सहज उतर सायर पार ॥ सोहं शब्दसे कर प्रीति । अनभय अखण्ड घरको जीत ॥ तन में खबर कर भाई जा में नाम रुशनाई ॥ सुरतिनगरमें वस्ती खूब । बेहद उलट चढ महबूब ॥ मूरति नगरामें कर सैल । जामें आतमा को महेल ॥

कबीरपंथी शब्दावली · पृष्ठ 59, कुल 968 में से · BharatKosha