कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
सोर ॥ पानी पावै आद अनाद । ग्रह सिंगी सब गयो है बाद ॥ जलुवा मलुवा दुनियां चोर । ये सब परे हैं कालके डोर ॥ दावन कुता दूत लबार । ध्यान छाडि बकते अपार ॥ अदल नाम चूरा मन ध्यान । ध्यान छाप बिन इच्छान ॥ साहब कवीर कहें बसंत । ध्यान छाप बिन खेह पडंत ॥
बसंत ५५—सत सुकृत खेले रितु बसंत । करो अनंद दुख मेटो संत ॥ जीवन सांच भल तबहीं होय । गुरुगम भेद लख पावे कोय ॥ लख चौरासीको कटे फंद । अमर करो मन छाडो दंद ॥ सोई सोहागिन पियहिं चीन्ह । द्विष्ट मांहि रहे अति अधीन ॥ दरशन शोभा रहे समाय । नहिं बिछुरे लिये संग जाय ॥ परष जान जब नाम लीन्ह । रतन पदारथ लेव भीन ॥ कहें कवीर यह खरच थार । अजर अमर घर रहो निनार ॥
बसंत ५६—सतगुरु खेले ऋतु बसंत । परम पुरुष जहां साथ संत ॥ तीन लोकते भिन्न साज । सुनिये अनहद बाजे बाज ॥ कोट सूर्य जहां उगे अपार । बिरला जन कोई पावे पार ॥ कोट सरस्वति करहिं राग । कोट इंद्र सुन गावन लाग ॥ कोट कृष्ण कर जोरे हाथ । कोट विष्णु जहां नावे माथ ॥ कोट ब्रह्मा जहां पढे पुरान । कोट शंभु जहां धरे ध्यान ॥ अखंड जोत जहां बरे अथाह । बिरला साधू पावे थाह ॥ नाना बिध जहां करहिं केल । ते वह लोके रहे मेल ॥ प्रथम बसंत एक राग कीन्ह । सतगुरु शब्द उधार लीन्ह ॥ गन गंधर्व मुनि गने न जाय । तहां प्रभु आप बिराजे आय ॥ कहें कवीर ऐसो मत हमार । पतित उधारन नाम सार ॥
बसंत ५७—चल हंसा सुख सागर घाट । तेरी हंसनी बैठी चितवे बाट ॥ सार शब्दमें जाय देख । अति सुंदर तहां अति विशेष ॥