भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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तहवां अमृत मोती होय । हंसा भोजन करे सोय ॥ अमृत नीर जो पिये अघाय । जन्म जन्मकी तिरषा जाय ॥ आवागमनसे होय निश्चित । शब्द मांहि खेले बसंत ॥ जहाँ अनहद बाजा अति सुहाय । सदा बसंत जहँ अच्छे छाय ॥ षोडश सूरजके प्रमान । हंस एक उजियार जान ॥ श्वेत दीप जगमग प्रकास । पुहुप बसंतकी महके बास ॥ स्वेत सिगासन छत्र स्वेत । स्वेत वृक्ष तर हंस स्वेत ॥ केहि बिध हंस वा घर जाय । सार शब्दमें जाय समाय ॥ शब्द चाल चले शब्द मांह । ले पहुँचे धर्मदास बांह ॥ शब्द बिना नहिं पावे वाट । शब्द चूक परे औघट वाट ॥ चूके शब्द जम पकर लेह । फिर नर हमको दोष देह ॥ अपनी चूक जो समुझे नाहिं । ते नर अंथ बिगोय जाहिं ॥ चेतहु तो नर खोज लेहु । ना तो फिर फिर धरहु देहु ॥ सत शब्दकी कर प्रतीत । भौजलते चलो निहचे जीत ॥ जो कोह चाल नर चूक जाय । पंच अमीमें ध्यान लगाय ॥ सांची सुरत जो संग लेय । सागरमो पहुँचाय देय ॥ ऐसी रहन जो हंस होय । सुखसागर देखै सोय ॥ अमृत भोजन करे अहार । काया धर मैं कहाँ बिचार ॥ देखे दीपन दीपन हंस । तब नरको सब जाय संस ॥ सागर सुंदर अति गंभीर । सतसुकृत सो निर्मल शरीर ॥ हंस हंस झरे पुहुप अनंत । कहँ कवीर तहाँ करो बसंत ॥

वसंत ५८-सुखसागर जियरा कर अस्नान । जहाँ सुर नर सुनि नहिं पावैं ध्यान । बिन जल जहँवा उठे हिलोर । बिन पर-बत जहाँ कुहके मोर ॥ बिन सिंगी जहाँ सुनिये नाद । सत संगत पावे बड़े भाग ॥ बिनकर बाजा सुनिये ताल । परम परवावज अति रसाल ॥ बिन वग नटुवा नाचे नाच । बूझो संतो शब्द साच ॥

कबीरपंथी शब्दावली २२