भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीररंथी--

बिन नैनन देखो अति निनार । संतो ऐसो मत हमार ॥ जोत बरे बिन बाती तेल । काह कहों कछु अगम खेल ॥ सुन रामा- नंद गुरु प्रसाद । निरंतर भावे सुख स्वाद ॥ आशा मेटके गहो ओट । साहेब कबीर दिल नाही खोट ॥

वसंत ५९—ऐसो दुरलभ जात है सरीर । भजु अर्चित जेहलागो तीर ॥ गये बेनु बलि गये कंस । दुरजोधनके बुझो बंस ॥ पिरथु गये पृथवीके राव । त्रिविक्रम गये रहे न कांव ॥ छौ चकवे मंडलीके झार । अजहूं हो नल देखु विचार ॥ हनुमत कस्यप जनक बालि । ये सब छेकल जमके द्वारि ॥ गोपीचंद भल कीन्ह जोग । रावन मारेउ करत भोग ॥ जात देख नर सबहि जान । कहैं कबीर भजु सतनाम ॥

वसंत ६०—को कौन बिगूचे स्वामी मोर । ऐसे गर्भ प्रहारी नाम तीर ॥ हरिचंद समान नहि दानी आनि । पुत्र सहित जिन बेचे रानि ॥ उन अपने मन लियो जान । अधम डोम घर भरो पान ॥ बलि बेनु विधना अजे चंद । लंक दहन रावको अंत ॥ सहज भुजा बन रहे ताहि । गये कौरव दल दुंद माहि ॥ कौरव पांडव करन द्रोन । सतुवा में के भये लोन ॥ जरासिंध ससि- पाल मार । कंस नृपतिको दाप झार ॥ अबके दुबहिंयां करत रार । केते नृपति गये हाथ झार ॥ कहैं कबीर भुमियां करोर । को को न गये कर मोर मोर ॥ हमरे कहलको ना पतियार । आप बूढ़े नर सलिल धार ॥ अंध कहे अंधा पतियाय । जस बेस्वाके लगन धराय ॥ सातो कहिये ऐसे अबूझ । खसम ठाठ दिग नाही सूझ ॥ आपन आपन चाहै मान । झूठा पूजहिं सांच जान ॥ झूठा कबहुँ न करिहैं काज ही बरजों तू सुनु निलाज ॥ छांडो पाखंड मानु बात । ना तो परिहो जमके