भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६७५)

घात ॥ कहें कवीर नल कियो न खोज । भटक मुवै जस बनके रोज ।

बसंत ६१-खेलत बसंत मानो विरह संग । भौसागर वह नाना-तरंग ॥ कोइ जोग कर कोइ जह्व दान । कोइ नेम धरम पूजा पखान ॥ कोइ दंड कमंडल धुअपान । कोई उर्थ तपस्या गोड़-तान ॥ कोइ दानी होय फिरे उदास । कोइ अगिन जरावे चहुँ-पास ॥ कोई उर्थ कपाली कर आराध । कोइ निसबासर रहे निद्रासाध ॥ कोइ रिद्धि सिद्धिके मंतर जान । कोइ जोगी सुद्रा पहिर कान ॥ कोइ भेष धरी धर करहि स्वांग । कोइ सोधे धतुरा पोस्त भांग ॥ कोइ पीर औलिया करे निमाज । कोइ षटदर्शन में करत बाद ॥ कोइ छत्रधरी धर धजा निसान । कोई सनमुख सूरा खेतजान ॥ कोई उदे अस्त लो दहिन देत । कोई चार मास जल सेन लेत ॥ कोई अलह कहे कोइ कहत राम । हिंदू तुरक मिल धरहीं नाम ॥ कोई कहे ब्रह्म समाना एक । कहें कवीर लीला अनेक ॥

बसंत ६२-मन माया खेलत बसंत । सुर नर मुनि जाको लहे न अंत ॥ काम क्रोध मन मिलहि अंग । लोभ मोह साजेसुगंध ॥ पिचकारी तृष्णा तरंग ॥ मनसा सीचे सकल रंग ॥ जोगी भीजे जोगध्यान । पंडित भीजे पढ पुरान ॥ सुरआदिक भीजे असुर झार । ब्रह्मादिक भीजे मनहिं हार ॥ मगन माया कोई बरे भाग । निस बासर गुरु सरन लाग ॥ अब नाही भाजनके छोर । कहें कवीर भीजे सोर बोर ॥

बसंत ६३-रसना पढि लेहु श्री बसन्त । पुनि जाइ परिहौ जमके अंत ॥ जो मेरु दंडपर डंक दीन्ह । सो अष्ट कमल परजारि लीन्ह ॥ तहं ब्रह्म अग्नि कीन्हो प्रकास । जहं अरध