भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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( ६७६ )

कवीरपंथी—

उरध बहे बतास ॥ तहं नौ नारी परिमल गांव । मिलि सखि पांच तहं देखन धाव ॥ जहं अनहद बाजा रहल पूर । तहं पुरुष बहतार खेलै धूर ॥ ते माया देखि रहलि भूलि । जस वनरूपति बन रहल फूल ॥ कह कवीर यह हरिके दास । फगुआ मांगै बैकुंठ बास ॥

वसंत ६४—आयउ मेहतर मिलन तोहि । रिनु वसंत पहिरा-वहु मोहि । लम्बी पुरिया पाई झीन । सूत पुराना खूंदी तोनि ॥ सर लागे तीन सौ साठ । कसनी बहतार लागे गांठ ॥ खुर खुर खुर चालै नारि । बैठी जोलाहा पलथी मारि ॥ ऊपर नचनी नचि करै कोड़ । करिगह मां दुइ चलही गोड़ ॥ पांच पचीसौ दशौ द्वार । सखी पांच तहं रची धमार ॥ रंग बिरंगी पहिरै चीर । हरिके चरन धरि गाव कवीर ॥

वसंत ६५—बुठिया हँसि कह मैं नितहीं बारि । मोहि अस तरूनी कहु कौन नारि ॥ दांत गयल मोर पान खात । केस गयल मोर गँग नहात ॥ नयन गेल मोर काजल देत । बैस गेल पर पुरुष लेत ॥ जान पुरुषवा मोर अहार । अनजाने का कहं सिंगार ॥ कह कवीर बुठिया आनन्द गाय । पूत भरतारहि बैठि खाय ॥ ६५ ॥

वसंत ६६—बूझहु पण्डित कौनि नारि । कोहु न ब्याहल रहलि कुमारि ॥ सब देवन मिलि हरिहीं दीन । तेहि चारियु जुग हरि संग लीन ॥ प्रथमहिं पञ्चिनि रूप आय । है सांपिन जग खेद खाय ॥ ईश्वर युवति वै बार नाह । अति तेज तिया है रेंनि ताह ॥ कह कवीर सब जग पियारि । अपने बल कबै रहलि मारि ॥

वसंत ६७—माइ मोर मनसा अति सुजान । धन्धा कुटि कुटि करत विहान ॥ बडे भोर उठि आंगन बाहु । बडी खांच लै गोबर काहु ॥ बासी भात मनुष लै खाय । बड़ चैला लै पानी जाय ॥