कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसम्वादवली
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अपने सैयां बांधी पाट । लै रे बेचौं ह्राटे हाट ॥ कह कवीर ये हरिके काज । जोइयाके दिगरे कौन है लाज ॥
वसंत ६८-घरहौमें बागुल बाठी रागि । अंग उठि उठि लागे चपल नारि ॥ वह बडी जाके पांच हाथ । तेहि पहुँचनके पञ्चीस साथ ॥ पञ्चीस बतावैं और और । वे और बतावे कई ठौर ॥ सो अन्तर मध्ये अन्त लेह । झूक झोरी झेला जिव देह ॥ सब आपन आपन चाहें भोग । कहु कैसे पारि है कुशल जोग ॥ विवेक विचार न करै कोइ । सब खलक तमासा देखै सोइ ॥ मुख फारि हसैं सब राव रंक । तेहि धरन न पावै एक अंक ॥ नियरै बतावे खोजै दूरि । चहुँदिसि बागुलि रहल पूरि ॥ है लच्छ अहेरी एक जीव । ताते पुकारै पीव पीव ॥ अबकी बारि जो होइ चुकाव । कह कवीर ताकी पूरी दाव ॥
वसंत ६९-कर पल्लवके बल खेले नारि । पंडित होय सो लेह विचारि ॥ कपडा न पहिरे रहै उधारि । निरजीव सो धन अति पियारि ॥ उलटी पलटी बाजे तार । काहुहि मारै काहु उबार ॥ कह कवीर दासनके दास । काहुहि मुख दे काहु निरास ॥
वसंत ७०-सिव काशी कैसी भई तुम्हार । अजहुँ हा सिव देखु विचार ॥ चोवा चन्दन अगर पान । घर घर स्मृति होय पुरान ॥ बहु विधि भवनन लागैं भोग । अस नगर कोलाहल करते लोग ॥ बहु विधि परजा निरभय तोर । तेहि कारन चित्त है ठीठ मोर ॥ हमरे बालकको यहै ज्ञान । तोहरा को समुझावे आन ॥ जग जो जेहि सों मन रहल लाय । सो जिवके मरे कहु कहाँ समाय ॥ तहं जो कछु जाकर होइ अकाज । है ताहि दोष नहिं साहेब लाज ॥ हर हौषैत हो तब कहल भेव । जहं हमही हैं तहं दूसर केव ॥ दिना चार मन धरहू धीर । जस देखो तस कहहु कवीर ॥