भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

होरी प्रारम्भ ।

होरी १—जिनको सत्संगति प्यारी । अहो खेलेत वसंत सुख-कारी ॥ टेक ॥ कथा अतर सरधा कस्तूरी, जतसत केशरलीनी ॥ भाव भक्तिकी गुलाल बनायी, भरि भरि सतगुरु दीनी ॥ ज्ञान भक्ति वैराग दयानिधि, मेलि अरगजा कीनो ॥ सील स्वातिको बन्यो कुमकुमा, ख्याल बन्यो रंग भीनो ॥ अनभय अचल भयो अभि अंतर, थकत भयो सब गाता ॥ भयो ज्ञान देह सुधि विसरी, सुनी खेलकी बाता ॥ ऐसो सतगुरु ज्ञान बतावे, जो कोइ शरनै आवे ॥ कहै कबीर ऐसो संत विवेकी, क्यों न परम पद पावे ॥

होरी २—काया नगर मंझार, संत खेले होरी । गावत राग सरस सुर सोहे, अति आनन्द भयोरी ॥ टेक ॥ चंदन सील सुगन्ध-अरगजा केसरि करनी गहरी ॥ अगर अगम सुगम करि लिन्हों, अभि डर अंतर धारी ॥ प्रीति फुलेल गुलाल ज्ञान करि, लेऊ जुगति भरि भोरी ॥ चोवा चित चेतन प्रकासा, आवत वास घनेरी ॥ त्रिकुटि महलमें बाजा बाजे, जग मग जोति उजैरी ॥ सहज रंग रंछि रह्यो सकल तन, छूटत नाहिं करोरी ॥ अनहद बाजा बजे मधुर धुनि, विन करताल तंबूरी ॥ बिन रसना जहाँ राग छतीसों, होत महों निधि पूरी ॥ सुन्न महल यक रंग मजलिस, कबहुँ टरत न टारी ॥ कहै कबीर समझि लेहो संतो, निरगुन कह्यो सदारी ॥

होरी ३—तुम होय निःशंक खेलो सम्हारी । मोह महा बल फंद रचो है, पकडत माया रसरी डारि ॥ टेक ॥ पाप पुन्य दोऊ मिलि खेलैं, कुबुद्धि सखा सब लिये लारि ॥ विसरावत सबहीनकी सुधि बुद्धि, काम क्रोधको गुलाल डारि ॥ डिम्भ कपट मुदंग

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