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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(६७८)

कबीरपंथी—

होरी प्रारम्भ ।

होरी १—जिनको सत्संगति प्यारी । अहो खेलेत वसंत सुख-कारी ॥ टेक ॥ कथा अतर सरधा कस्तूरी, जतसत केशरलीनी ॥ भाव भक्तिकी गुलाल बनायी, भरि भरि सतगुरु दीनी ॥ ज्ञान भक्ति वैराग दयानिधि, मेलि अरगजा कीनो ॥ सील स्वातिको बन्यो कुमकुमा, ख्याल बन्यो रंग भीनो ॥ अनभय अचल भयो अभि अंतर, थकत भयो सब गाता ॥ भयो ज्ञान देह सुधि विसरी, सुनी खेलकी बाता ॥ ऐसो सतगुरु ज्ञान बतावे, जो कोइ शरनै आवे ॥ कहै कबीर ऐसो संत विवेकी, क्यों न परम पद पावे ॥

होरी २—काया नगर मंझार, संत खेले होरी । गावत राग सरस सुर सोहे, अति आनन्द भयोरी ॥ टेक ॥ चंदन सील सुगन्ध-अरगजा केसरि करनी गहरी ॥ अगर अगम सुगम करि लिन्हों, अभि डर अंतर धारी ॥ प्रीति फुलेल गुलाल ज्ञान करि, लेऊ जुगति भरि भोरी ॥ चोवा चित चेतन प्रकासा, आवत वास घनेरी ॥ त्रिकुटि महलमें बाजा बाजे, जग मग जोति उजैरी ॥ सहज रंग रंछि रह्यो सकल तन, छूटत नाहिं करोरी ॥ अनहद बाजा बजे मधुर धुनि, विन करताल तंबूरी ॥ बिन रसना जहाँ राग छतीसों, होत महों निधि पूरी ॥ सुन्न महल यक रंग मजलिस, कबहुँ टरत न टारी ॥ कहै कबीर समझि लेहो संतो, निरगुन कह्यो सदारी ॥

होरी ३—तुम होय निःशंक खेलो सम्हारी । मोह महा बल फंद रचो है, पकडत माया रसरी डारि ॥ टेक ॥ पाप पुन्य दोऊ मिलि खेलैं, कुबुद्धि सखा सब लिये लारि ॥ विसरावत सबहीनकी सुधि बुद्धि, काम क्रोधको गुलाल डारि ॥ डिम्भ कपट मुदंग

शब्दावली

(६७९)

डफ वीना, करम भरम बाजे करतार । अधर्म धर्म गावे राग रागिनी, मोह लियो सगरो संसार ॥ आसा मनसा संग सहेली, बडी अपरबल तीनऊँ नारी । वास लिये धावत जित तित ते, सुर नर मुनि डारे पछारि ॥ त्रिविधि तापकी कठिन ठगौरी, अपनी अपनी करत रारि । नाचत मन संग लिये इंद्रीयन, उपजावत अति विषय विकार ॥ आये विवेक ज्ञान संग लिये, सत शब्द गावे धमारि । शील संतोष भरि प्रेम पिचकारी, मदन मस्त को दियो बिगारि ॥ पांच पचीस खेले निरभय होय, हिल मिलिकै ये नौ सारी । रटना लगि सबै ये गावे, प्रेम आनंद होय मंगल चारी ॥ मिलि सतगुरु जहां होरी खेलेँ, आवागवन को दुख निवारि । कहैं कवीर छोड़ि भवसागर, बहुरि न आवे या संसार ॥

होरी ४—मन राजा खेलन चले रंग होरी हो । काया नगर मंझार राम रंग होरी हो ॥ टेक ॥ पांच पचीस मिलि खेलहि रंग होरी हो ॥ मन राजा सरदार राम रंग होरी हो ॥ इंगला पिंगला सुषुमना रंग होरी हो ॥ तिरवेनीके घाट राम रंग होरी हो ॥ ग्यान गली ठाढे भये रंग होरी हो ॥ सुरति निरति दोउ लार राम रंग होरी हो ॥ सील छमा छिडकत फिरे रंग होरी हो ॥ बाढचो रंग अपार राम रंग होरी हो ॥ मेर डंड छाजे चढों रंग होरी हो ॥ डडता प्रेम गुलाल राम रंग होरी हो ॥ अनहद बाजा बाजई बाजहि रंग होरी हो ॥ निरति करें सब नारि राम रंग होरी हो ॥ दास कवीर जहां खेलहि रंग होरी हो ॥ अविनासीके संग राम रंग होरी हो ॥

होरी ५—ऐसे खेलत फाग सबे नारी । जाके हाथ लकुटिया मुख गारी ॥ टेक ॥ यह यहते निकसी वन सुन्दर । भांति भांति पहरे सारी ॥ अबीर गुलाल लिये भरि झोरी । मिलन चली

(६८०)

कवीरपंथी-

पियाकी प्यारी ॥ अपने अपने झुंडन मिलिकै । गावत ब्रिघ तरुन बारी ॥ पहुँची जाय जहां हरि मन्दिर । बर बैठे मूरति धारी ॥ एकनि चंदन केसरि छिडकै । एकनि मुट्टी भरि भरि डारी ॥ एक सन्मुख ठाढी कर जोडै । एकनि हाथ चँवर ढारी ॥ को चितवै को बोलै कासों । निजीव रूप कहुँ कारी ॥ निहुरि निहुरि सब पांव पडत हैं । यह देखो अचरज भारी ॥ सब सहेली बहुरि चली घर । कोई न संग रही प्यारी ॥ आपु नहीं भुले नर नारी । प्रान पियाकी गति न्यारी ॥ यह सब भरम छाडिदे वारी । अब जिन जन्म जुवा हारी ॥ कहैं कवीर अपनपौ चीन्हो । सुखसागरमें सुखकारी ॥

होरी ६-जग होरी मच रही है भारी । तुम संतो खेलौ संसारी ॥ टेक ॥ जड़ चैतन दोऊ रूप बनाये एक कनक दूजी नारी ॥ पांच पचीस संग लियै अबला हँसि हँसि मिलि गावै गारी ॥ डिम्भ कपट लिये करमें डफ हूँबड हूँबडकी तारी ॥ त्रिगुन ताल तबला बाजे आसा तूछना गति न्यारी ॥ पाप पुन्य दोऊ भरि पिचकारी छूटत है बारंबारी ॥ सन्मुख होय करि जो वह खेले, ताके छीट लगी कारी । चोवा चंदन अबीर अरगजा माथकी गार भरी ॥ षट दर्शन पाखण्ड छीयानवे पकडि किये सब वेगारी ॥ कुमति गुलाल डारि मुख मीडै काम कला पुटरी मारी ॥ सुर नर मुनिजन पीर औलिया भजि रही सब संसारी ॥ चतुरा फगुवा देदे छुटे मूरखको लागे प्यारी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू निर्गुन ग्यान गली न्यारी ॥

होरी ७-ऐसे खेले संत सदा होरी । जहां दुंद उपाधि नहीं कोरी ॥ टेक ॥ ताल मूल सुर साधि बाट घर । पश्चिम दिशा चढ़ि गहि डोरी ॥ खुले कपाट सहज घर पावों । सुंदर रूप सुरति

शब्दावली

(६८१)

गोरी ॥ जहाँ चतुर सखी नित गावहिं । बाजत वूर देत तारी ॥ सुर नर मुनि सब करत कौतूहल । ग्यान गुलाल उडत भारी ॥ कोइ निरगुन कोई सरगुन राचे । आप आप विसरे सबही ॥ कहैं कवीर चेत नर प्रानी । शब्द सरूप मिलै अबहीं ॥

होरी ८—म्हारको खेले ऐसी होरी । जामें आवा गवनकी है डोरी ॥ टेक ॥ श्रवन न सुनयो नैन नहीं देख्यो । पीया पीया लागि रही लौरी ॥ पंथ निहारत जनम सिरानो । प्रगट मिल्यो नहीं चोरी ॥ जा कारन गृह तजिकै निकसी । लोक लाज कुलकी तोडी ॥ चोवा चंदन अगर कुमकुमा का पर डारों रंग रोरी ॥ येकन तो मृगछाला वोडी येकन गुदरी अरु झोरी ॥ येकन बहु विधि स्वांग बनायी । लोगन लागी ठगोरी ॥ जगन्नाथ बढ़ी रामेश्वर । देश देशान्तर सब दौरी ॥ अरसठ तीरथ पृथ्वी प्रदक्षिना । पुहकर हूमें लट बौरी ॥ वेद पुरान भागवत गीता । चारिउवरन दंडोरी ॥ कहैं कवीर सद्वरु दया बिन । भरम न मिटि है ये बौरी ॥

होरी ९—आवो पीया संग खेलो होरी । सुरति शब्द सो लो जोरी ॥ टेक ॥ नाना रंग सबै बनि आवौ । ग्यान गुलाल भरे झोरी ॥ चित चरचा चंदन मन लावौ । केसरि भरि पिचकारी ॥ प्रेम प्रीति प्रकास परम गुरु । सत सुकृत वर पायोरी ॥ तब मन थिर भयो थिति पाई । आदि अंत दीप लायोरी ॥ तत पद सार संगति सतगुरुकी । कहैं कवीर सम आयोरी ॥

होरी १०—आओ पीया संग खेलो होरी । सुमति सखी मुनि मुनि दौरी ॥ टे० ॥ करम जंजीर काटि सतगुरु सब । जरा मरनको गयो भौरी ॥ सत संतोष शील मति थिर होय । खेलो फाग विचारोरी ॥ अग्र अमी अबीर ले आओ । काम क्रोध तजि दोउरी ॥ भाव भक्ति अरु सही सलामति । सो पद पायो नाम उधोरी ॥

(६८२)

कवीरपंथी—

सुख आनंद सब होरी खेलो । काल कठन भरम भयो हरी ॥ कुलकौ त्याग मान सब तोरी । कहैं कवीर पिया संग होरी ॥

होरी ११—हरि होरि हो हरि होरी । हरि होरि मैं हरि होरी ॥ कोई साधु संत खेलैं होरी । सतनामको डांडो रोप्यौ धरम धजा गहि जोरी ॥ टेक ॥ बाजत ताल मुदंग झांझ डफ । नाचत है तन मन तोरी ॥ वंसी बीन अनहद धुनि बाजे । जसि मति सुमति नाचे गोरी ॥ चोवा चंदन और कुमकुमा । अबीर लिये भरि भरि झोरी ॥ उडत गुलाल विसाल लाल रंग । रंग रही गगन गरक गोरी ॥ जब अंतर पट गांठि दइही । अब पायो है पट जोरी ॥ कहैं कवीर अखंडित फगुवा । जुग जुग पावो मति मोरी ॥

होरी १२—सतगुरु संग रचि है धमारि होरी मैं खेलूंगी ॥ टेक ॥ साधु संत मिलि मंगल गावें । लगी शब्दकी मार ॥ उडत गुलाल अरुन भयो अंबर । प्रेमकी परत फुहार ॥ चोवा चंदन और अरगजा । पिचकारिनकी मार ॥ दास कवीर स्वामी निरगुन गावे । संतो लेहु विचार ॥

होरी १३—मेरे सतगुरु दियो बताय मारग नामका ॥ नाम नाम करि जाये पहुँच । पाय अभय पद धामका ॥ टेक ॥ वा मारग मोहि ले चलि सजनी । जहां पियाको देस ॥ परसों चरन कमल नागरके । मेरो रहै सुहाग हमेश ॥ आयो फाग वसंत सखीरी । फूले आंब पलास ॥ कली कली कलियाँ खुली । सब संतन भयो विलास पांच पटे लनि खेलन निकसीं । सखी पचीसों साथ ॥ खेलै फाग वसंत पांच मिलि । अपने अपने हाथ ॥ ज्ञान गुलाल करनी करो । अन भौ करो अबीर ॥ अमृत पिचकारी भरो प्रेमसे । छिड़को सकल शरीर ॥ मैं हारी पीया मारग पायो । ले सतगुरुकी रीति ॥ कहैं कवीर सतलोक पहुँचे । साहेबकी प्रतीति ॥

शब्दावली

(६८३)

होरी १४-प्रीतम आइया हो मेरे सतगुरु दीन दयाल ॥ टेक ॥ बन्दी छोड़ मुक्तिके दाता । परम सनेही नाम ॥ साधु संतसो अति अभिलाषा सब विधि पूरन काम ॥ जैसे चातक स्वाति बुन्दको । रटत है आठों जाम ॥ जाकी सुरति लगी सतगुरुसे । विसरी सुखके धाम ॥ आनंद मंगलचार परम सुख । अमर करत है जीव ॥ सुमिरनदे सतलोक पठाये । ऐसे समरथ पीव ॥ चरन कमल सतगुरुकी सेवा । मन चित्ते अजुराग ॥ कहै कबीर ऐसी होरी खेले । जाके पूरन भाग ॥

होरी १५-ये होरी खेलूंगी मेरे साहेब आवेंगे आज ॥ हंस उबारन जीव निसतारन अधम उधारन नाम ॥ टेक ॥ करनी कलश से जोय सकल विधि । प्रीति पात्रदे डारि ॥ चरण प्रछालि चरणाभूत लेऊँ । मनकी मनी उतारि ॥ तन मन धन सब अरपन करिहुँ बहु विधि आरति साजि ॥ प्रेम मगन होय मंगल गाऊँ विसरी कुलकी लाज ॥ धोखा धूरि उड़ाय शरीरते ज्ञान गुलाल प्रकास ॥ पारस पान लेऊँ प्रीतमसों मेटि दूसरी आस ॥ दया धरमकी केसरि घोरों भाव भक्ति पिचकार ॥ सत सुकृत दोउ अबीर अरगजा देऊँ पिया पै डार ॥ साहेब कबीर मोहि मिले सतगुरु फगुवा दीनों है नाम ॥ आवागमनकी मिटि कलपना पाये सुखकी धाम ॥

होरी १६-होरी होरी रंग बोरी विरहा झकोरि मारी ॥ टेक ॥ चौवा चाल अरगजा रहनी करनी केसर घोरि ॥ प्रेम प्रीतिसों भरि पिचकारी हूंम हूंम रंगी सारी हमारी ॥ बाजत ताल मृदंग बिना कर बीना शब्द रसाली ॥ खेलत है कोइ सुघर खेलैया योग जुगति लगि तारी हमारी ॥ इंगला पिंगला रास रच्यो है सुखमनि बाट बुहारी ॥ सुरति निरति दोउ नाचन लागी बढयो रंग रति

(६८४)

कवीरपंथी-

अपारी ॥ मैं वारी ॥ या विधि होरी खेली संतो या होरी दिन थोरी ॥ गुरु कवीर आतम परमातम खेलेत बहियाँ जोरी ॥ मैं वारी ॥

होरी १७-होरी खेलेन न जाने यह मन निपट अनाडी ॥टेक॥ काम क्रोध मद लोभ मोहकी सिर घरि गागर भारी ॥ उठी पैठ सौदागर आयो का करै बनज व्यापारी ॥ येक भरे येक भरि भरि लै आवैं दूजे भरनकी वारी ॥ पियाकी सुहागिनी पिया संग खेलै। और सब भई न्यारी ॥ या घट भीतर पांच मवासी और पचीसों नारी ॥ इन्हें मारि होरी खेलैं पियारे काज सुधर जाय सारी ॥ छमा दयाको अबीर बनायो सुमतिकी भरि लई झोरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो या विधि खेलो होरी ॥

होरी १८-का संग होरी खेलिये हो वालम परदेसुवा ॥टे०॥आई ऋतु वसंतकी हो फूलन लागे केसुवा ॥ वसन गीले पहरन लागे विरहिन डारत आंसुवा ॥ भरि गये ताल तलैया सागर बोलन लागे देसुवा ॥ उमंगी नदी नाव कहाँ पै कौनी विधि लिखौ सँदेसुवा ॥ वहाँके गये बहुरे नहि हो कैसो है वा देसुवा ॥ आवत जात लखै नहि कोई या जिय बड़ अन्देसुवा ॥ बालापनकी अबलौं निवाही अब तो निवहै कैसुवा ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधो मिलि सतगुरु उपदेसुवा ॥

होरी १९-मन लागि रह्यो होरी सत्सुकृत नाम दुलारेसो ॥टेक॥ आवागवन मिटै जब प्रानी जब छुटै यम द्वारे सो ॥ एक नाम विनु पार न पैहो हिन्दू तुरुक नर नारी सों। स्वासा सार तार निस्सि- वासर उठत घोर झनकारे सो ॥ सतगुरु पद प्रतीत भई है अगर मुहंगम मारे सो ॥ सतगुरु दरश परस पद पड़है मिलि सुकृत

शब्दावली

(६८५)

सठि हारेसौं । कालके करम जाल सब छुटैमिलि कवीर मत वारे सो ॥

होरी २०—खेलत फाग वसंत रैन दिन सहज सून्यमें होरी ॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति त्रिकुटी महल रचोरी ॥ गुंजत भंवर कोकिला बोले सोहँ सोहँ सोरी ॥ बाजत ताल मृदंग झाँझि अगम निगमकी झोरी ॥ मानों कोटि भान ससि उगे जहां मनुवां विलगोरी ॥ सुरति सुहागिनि मन लिये मनुवां दिये सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि ब्रह्मज्ञान झकझोरी ॥

होरी २१—हमारे को खेले ऐसी होरी, जामें आवागवन लागी डोरी ॥ श्रवण न सुनो नैन नहीं देखो, पिया पिय लागी लौरी । पंथ निहारत जनम सिरानो, प्रगट मिले नहीं चोरी ॥ जा कारन तुम गृह तज निकसे, लोक लाज कुल तोरी ॥ षट् दर्शन मिल स्वांग बनाये, लोगन लाग ठगोरी ॥ अंग भभूत गरे भृगछाला, कोइ लाये गुदर भर झोरी । चोवा चंदन अबीर अरगजा कपड़ा दे रंग रोरी ॥ जगन्नाथ बड़ी रामेश्वर, देश देशान्तर दौरी । अरसट तीरथ पृथी पैकरमा, पोहकर मैं लट बोरी ॥ वेद प्रमान भागवत गीता, चारों बरन टटोरी । कहैं कवीर सतगुरुके दया विन, भरम मिटे नहीं भौरी ॥

होरी २२—कैसी मजा कर डारी, ऐसे होरीके खिलारी ॥ भारी भ्रमकी सारी फारी, मानकी बेसर तोरी । लोभ मोहके कंकन फोरी, प्रेमके रंगमें बोरी ॥ ज्ञान गुलाल परो नैननमें, देखत नहीं जग सोरी । त्रिगुन बंद अंगिया टूटे, शब्द कुमकुमा मोरी ॥ नित्या नित्य देत है गारी, लाज सरम सब तारी । एकहि भाव बिलास करत है, कौन पुरुष को नारी ॥ पूरन प्रेमहि भूल गयो है, ऐसी न देख धमारी । साहेब कवीर परख रंगरंगिये, परखके कीन्हे न्यारी ॥

(६८६)

कवीरपंथी—

होरी २३—ऐसी होरी खेलो, जामें डुरमत लाज रहोरी ॥ शील सिंगार करो मेरी सजनी, धीरज मांग भरोरी ॥ ज्ञान गुलाल उड़ाव सखीरी, सुमता फेंट गहोरी ॥ होत धमार नगर तेरेमें, अनहद बेन बजोरी । गुरुसे फगुवा मांग सखीरी, हृदया सत् करोरी ॥ संस्कृत भाषा पठ पठ आये, ज्ञानी लोग कहोरी । मोह मायामें बहि गये सजनी, जमके फंद परोरी ॥ खेती बनिज गऊ औ बाछा, चेला शिष्य करोरी । नाव लगी है पार लगनको, कालीदहमें परोरी ॥ मान मनीकी मटकी सिरपर, नाहक बोझ मरोरी । मटकी पटक मिलो सतगुरु सो, साहब कवीर कहोरी ॥

होरी २४—दिग अंजन नैन सँवार, काहूको मारोंगी ॥ टेक ॥ भौंह बनी बरछीकी नोके, नैन बने खरसान विरहके बान नैनसे छूटे, गोसा चढी कमान ॥ चंद्रबदन भृगलोचनी माया, कर सोरा सिंगार । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा, इनको कीन्ही यार ॥ नरसे नार कियो नारको पुत्रसे साठ पदार । भुंगीरिषि पारासर देवा, इनको कीन्हा ख्वार ॥ जीव उबारन सतगुरु आये, तेरो लगे नहि लार । कहें कवीर सुनो भाई साधू, इनसे रहोहुशियार ॥

होरी २५—ऐसा रंग बनाया, मेरे नैनोमें समाया ॥ टेक ॥ पहिला रंग नबीजीका आया, जिन उमंद बगसाया । अलीजीके नाम रौशन दुनियामें, जीव जीव कलमा पढ़ाया ॥ दीन उन्हीने बनाया ॥ दुसरा रंग सोहै हम नैनको, जिनोंने सहादत पाया ॥ वे रनसूर लडे रन भीतर, सन्मुख सौस कटाया ॥ शहर कर्वलेका बसाया । तीसरा रंग सोहै पंजतनका, हूरे मंगल गाया । सिर सेहरा मुख मकना बिराजे, नूरके छत्र फिराया ॥ हाथ कंगन बंधवाया ॥ चौथा रंग रंगीले साहबके, रंग सबके

शब्दावली

(६८७)

मन भाया । औलिया अंविया गौस कुतब, या सब मिल रंग बनाया ॥ ध्यान मौलासे लगाया ॥

होरी २६-मेरे साहब आवन हार, होरी खेलोंगी ॥ करनीके कलस संजोय सकल विध प्रीत पांवडे डार । चरन पस्वार चरनामृत लेहौं, मनकी मनी उतार ॥ तन मन धन सब अरपन करिहौं, बहु विधि आरती साज । प्रेम मगन होय मंगल गावों, बिसरी कुलकी लाज ॥ धोखा धूर उडाव शरीरसो, ज्ञान गुलाल प्रकास । पारस पान लेवे सतगुरु सो, मेट दूसरी आस ॥ दया धर्म तन केशर घोरों, भाव भगति पिचकार । सत सुकृत अवीर अरगजा, देउंगी पिया पर डार ॥ साहब कवीर मिले मोहि सतगुरु, फगुवा दीन्हो नाम । आवागमनकी मेट कल्पना, पायो आनन्द धाम ॥

होरी ८-मेरे सतगुरु दीन दयाल, प्रीतम आयो हो ॥ टेका ॥ हंस उबारन जिव निस्तारन, अधम उधारन नाम । बंदीछोर मुक्तिके दाता, परम सनेही नाम ॥ साधु सन्त औ अति अभिलाषा, सब विधि पूरण काम ॥ जैसे चात्रिक स्वातिबूंको रटत है आठों जाम ॥ जिनकी सुरत लगी सतगुरु सों, बिसरे सुख ग्रह धाम । सतगुरु दया करत जीवन पर, देकर अविचल विश्राम ॥ आनंद मंगल उचार परम सुख, अमर कहत है जीव । सुमिरन दे सतलोक पठाये, ऐसे समरथ पीव । चरन कमल सतगुरुके सेऊं, मन चित दे अनुराग । कहैं कवीर ऐसी होरी खेले, जाके पूरन भाग ॥

होरी ९-होरी खेलत लालनके संग प्यारी, हम देखी सुसक्यान ॥ टेक ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, प्रेम प्रीति पिचकार । क्षमा केशर ले छिरकन आई, सुरति-सोहागिन अविगतनार ॥

(६८८)

कबीरपंथी—

पांच सखी मिल संगल गावैं, सुषमन थार सँवार । चंद सूर दोउ दीपक बारैं, ब्रह्म जोत उनमुन उजियार ॥ मैं मेरे पियको नितउठ चाहों, जो पिया मोहिको चाहि । आवागमनके फेरे मिटावे, भौसागरमें बहुरि न आहि । शीलकी सेज सँवार महलमें, लौका सिंगार करोरी । साहब कबीर सुरत संयोग, ले, संतलोक गये रसभोगी ॥

होरी १०—कायानगरकी पौररी, मन खेलत होरी ॥ टेक ॥ सुरत ज्ञान डफ बाजन लागे, अनहदके घनघोर री । पांच पचीस बनिता बनि आयी, तेऊ रंगमें बोररी ॥ अबीर गुलाल हेत कर सजनी, प्रेमकी चाचर जोररी ॥ तन नारी औ मन है नारायन, प्रीतम अंग मरोररी ॥ खोल चुण्ट सन्मुख होय खेलो, होनी होय सो होयरी । कहैं कबीर औसर नहि पैहो, फगुवा लेउ न बोररी ॥

होरी ११—ऐसे खेलत फाग बसंत, निरंजन सहज सुन्नमें होरी ॥ टेक ॥ बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, अगम निगमकी डोरी । मन एक भँवर कोकिला गुंजे, सोहैं सोहैं सोरी ॥ अष्टकमल दल भीतर मनुवां, त्रिकुटी महल रचोरी । कोटि भानु जगमग उजियारो, जहैं मनुवां बिलमोरी ॥ मानसरोवर हंसा डोलै, अति घन पुहुप फुलोरी । जरा मरनकी ससै मेटो, जाति बग्न बिसरोरी ॥ सुरति सोहागिन संग लिये मनुवां, हाथ सुमतिकी डोरी । कहैं कबीर मगन भई बिरहिनि, ब्रह्म जलमें झकझोरी ॥

होरी १२—तुम संतो खेलो संभारी, जग या होरी मच रही भौभारी ॥ टेक ॥ जड चेतन दो रूप बनाये, एक कनक दूजी नारी । पांच पचीस लिये संग अबला, हँस हँस मिल गावैं गारी ॥ दुरमति डिंभ गहे करमें डफ, हों बड हों बड दे तारी । त्रिगुन तार तमूरा बाजे, आशा तृष्णा गत न्यारी ॥ चोवा चंदन अबीर

शब्दावली

(६८९)

अरगजा, मायाकी गागर भारी। षट् दृशन् पाखंड छानबे, पकर किये सब बेगारी॥ लोभ मोह दोउ भर पिचकारी, छूटत है बारं बारी। जो कोइ सनमुख होयके खेले, उनको छींट लगी कारी॥ कुमति गुलाल डाल मुख मींड़े, काम कला पुटरी मारी। सुर नर मुनि औ पीर औलिया, भीज रहे सब संसारी॥ चतुरन फगुवा दे दे छूटे, मूरखको लगी प्यारी। कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निरगुन ज्ञान गली न्यारी॥

होरी १३-ऐसी खेलत फाग सबै नारी, जाके हाथ लकूट मुखमें गारी॥ टेक॥ ग्रिह ग्रिह ते निकसी बनि सुंदरि, भांतिन भांति पहिर सारी। अबिर गुलाल लिये भरझोरी, मिलन चलीं पियको प्यारी॥ अपने अपने झुंडसों निकसीं, गावत तरुन ब्रिध बारी। बैठीं जाय हरिमंदिरमें जहां, बैठे वर मूरत धारी॥ एकन मूठी चोवा चंदन चरचे, एकन मूठी भर मारी॥ एक खड़े सनमुख कर जोरे, एकन हाथ चैंवर डारी। को बोले को चितवे कासों, निरजीव रूप कहो कारी॥ निहुर निहुरके पांय परत हैं, ये देखो अचरज भारी। सबै सहेलरी मुरक चली हैं, कोई न संग गई प्यारी॥ आपहिं नर नारी होय बैठे, प्रान पियाकी गत न्यारी॥ ये सब भर्म छोड़ दे बौरी, अबकी जन्म जुवा हारी। कहैं कवीर अपनपौ खोजो, सुखसागर सुखकी बयारी॥

होरी १४-अब कहां जात बेदरदा हो, मोपे गरदा झारके॥ टेक॥ आये बसंत सबै बन फूले, बन बन हो गये जरदा। जबसे लागी बसंत पंचमी, सब बन होगये मरदा। लोक लाज कुल कान बिसर गई, अंदर खुल गई परदा॥ चलोरी सखी मिल चौसर खेले, पासा परगये नरदा। कहे कवीर सुनो भाई साधू, गुरु चरननकी सरधा॥

(६९०)

कवीरपंथी—

होरी १५—जग या दुई खेलेत होरी, बनी हंसनकी जोरी ॥ टेक ॥ सतगुरु तो सतलोकसे आये, बांधोमें फाग मचोरी । धरमदास उठि चरनन लागे, ये दोई मेल रहोरी ॥ सो तो नहिं जात कहोरी—जग या दुइ—गुरु शिष्य मिल होरी खेले, संत खले चहुं ओरी । प्रीति परस्पर सांची कहिये, ज्ञान ग्रंथ गठजोरी ॥ सो तो सुरझावत कोरी—जग या दुइ—धर्मदास आमिन समुझावे, सब मिल चरन गहोरी । बडे भागसे सतगुरु आये, सब मिल चरन परोरी ॥ यामैं कछु नाहिंन खोरी—जग या दुइ—कहैं कवीर सुनो भाई साधू, जीवन भाग जगोरी । नाम पान परवाना पाये, फगुवा मिलो भरझोरी ॥ जनमसो तिलुका तोरी—जग या दुइ— बोलत होरी ॥

होरी १६—रंग खेलेत फाग सुघर नारी, हाथ सुमति लिये पिचकारी ॥ टेक ॥ पांच पचीस सखी संग निकसीं, सुकित रूप पहिर सारी । धीरज अंजन सीमाकी बेंदी, झीलसिंहूर मांग भरी ॥ बाजत ताल मृदंग झांझ डफ, सब मिल गावैं मंगल चारी । ज्ञान गुलाल अनंद अरगजा, सहजे अबीर उड़त भारी ॥ दया धरमको केसर घोरी, प्रेम प्रीति छुटे पिचकारी । शब्द छडी जबही कर लीन्हें, समुझे संत पर जाय मारी ॥ सुंदर फाग खेले चेतन सों, एक महलमें पिय प्यारी । कहैं कवीर छबि कहैं लग बरनो, सुमति पर कोटिन सुकता वारी ॥

होरी १७—रितु फागुन नियरानी, कोई पियाको मिलावो ॥ टेक ॥ सोई सुंदर जाके पियाको बरत है, सो पियके मन मानी । खेलेत फाग अंग नहिं मारे, सतगुरुसों मन ठानी ॥ पियका रूप कहाँ लग बरनो, पियके रूप लुभानी । सुर नर मुनि जाको ध्यान धरत हैं, सो संतन मिल जानी ॥ एकहि खेले गई गृह अपने,

शब्दावली

(६११)

एकहि कुल उरझानी । एकहि नाम बिना डहकावे, हो रही ऐंचा-तानी ॥ तुम जिन जानो एही फाग है, ये कछु अकथ कहानी । कहें कर्वार सुनो भाई साधू, बूझे बिरला ज्ञानी ॥

होरी १८-या मन निपट अनारी, होरी खेलन न जाने ॥ टेक ॥ काम क्रोध औ लोभ मोहकी, सिर पर गठरी भारी ॥ या नगरीमें पांच मवासी और पचीसों नारी ॥ इन्हें मार होरी खेलो पिया संग, बात सुधर जाय सारी ॥ सखी सहेली होरी खेलैं पिया संग, कुमति सखी रहु न्यारी ॥ कहें कबीर ऐसी होरी खेलो, हाथ सुमति लिये पिचकारी ॥

होरी १९-गगन मंडल उरझानी, नित फाग मची है ॥ टेक ॥ ज्ञान गुलाल अबीर अरगजा, सखियां ले ले धाई । उमैग उमैग रंग डार पिया पर, फगुवा दैव बहाई ॥ फगुवा नाम मिले मोहि सतगुरु, तनकी तपन बुझाई । शब्द डार जहां अगर उड़त है, शोभा बरनि न जाई ॥ गगन मंडलमें होरी मची है, गुरुगम झर लख पाई ॥ कहें कबीर मगन भई विरहिनि, आवागवन नसाई ॥

होरी २०-ऐसे नाम उजागर, होरी खेलन बर आये ॥ टेक ॥ कासीमें सतगुरु प्रगट भये हैं, नीरूके गृह आये । रामानंदके शिष्य भये हैं, निरगुन पंथ चलाये ॥ कथ निरगुन निज नाम अभय पद, सुन पंडित रिसियाये । षट् दरसन मिल बादको आये, जीत न काहू पाये ॥ एक दिना सब प्रपंच बहु कीन्हें, नारद आन लदाये । सबे लुटाय कछु नहीं राखी, लीन्हें साधु बुलाये ॥ कपड़ा बुने बैच ले आवें, तामें सबको देई । लाख टका कोई आन चढावे, ना काहूको लेई ॥ साह सिकंदर परचे लीन्हा, करामात दर्ई तीन्ह । कासी तज प्रभु मगहर आये, तब कछु

(६९२)

कबीरपंथी—

चितवन कीन्ह॥ जलमें बोर अगिनमें डारे, विनशत नाहिं शरीर । मस्ता हाथी आन झुकाये, निरभय सत्य कबीर ॥

होरी २१—बीतो जात बहार, होरी खेलन आई॥ टेक॥ पांच पचीस बनिता बन आई, खेलत धूम धमार । अपन पिया संग होरी खेलो, मेट सकल भ्रम जार॥ आतम रंग सुरंग बनाये, प्रेम प्रीति पिचकार । कहैं कबीर ऐसी होरी खेलो, आवागवन निवार॥

होरी २२—होरी खेलन तो जाग सखीरी, फिर ऐसा दाव न पाइये॥ टेक॥ मनको तार बिरहमिरदंग, बाजत हरिगुन गाइये॥ तन कर मटका मन कर केशर, झीलको रंग जमाइये ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, सांचेको टीको लाईये ॥ जप कर मंजन तप कर संजम, दर्शन फगुवा पाईये ॥ कहैं कबीर सुनो भाई साधू, नाम पदार्थ धाइये ॥

होरी २३—अपने पिया संग होरी खेलो, सुमति सखी संग लाय ॥ टेक॥ खेलों मैं होरी अंगना मेरो, तन मन सुरति लगाय । प्रीतम पास आस भई पूरन, राखों मैं हिरदै समाय ॥ दुबधा दुरमति दूर परानी, जब देखो निरताय । परसत अंग रंग भये अविचल, तनकी तपन बुझाय ॥ अजर अखंड अमान अभै पद, कौन सकै गुन गाय । गुनवंती निर्गुन गुन राखो, गुरुगम प्रीतम पाय॥ प्रीतम पास सेज सुख विलसो, यह सुख बरनि न जाय । धर्मदास ऐसी होरी खेलो, सब संशय मिट जाय ॥

होरी २४—हेरे प्रीतमजी की बाट, ठाढी अलबेली ॥ टेक॥ गंगा जमुना बहे सरस्वती, तिरवेनीको घाट । अर्ध उर्धके मध्यमें मूरख पाई सांट । सगरे पंथ बिच दोय गली जहां, भर केशरको मांट॥ कुमति करार होय रही अभागिन, मत कर मनकी आंट । पिया दरसनको प्यास भई है, चली जगतसे फाट॥ काम क्रोधकी मूठ

शब्दावली

(६९३)

त्यागके, जगसों भई उचाट । कहैं कवीर मिलो पिय प्यारी, सतगुरु खोल कपाट ॥

होरी २५—छाये प्रीतमजी परदेश, मैंने अब जानी ॥ टेक ॥ अंग बिभूति रमाऊं निसि दिन, स्वेत जटा भये केस । घर घर अलख जगावत डोले, धर जोगिनको भेश ॥ मैं भौसागर भूल रही हों, लिखना भयो संदेस । ऐसे सतगुरु नाहि मिलै, मेरी सुर्त करे परवेस ॥ जाकी ध्यान धरे ब्रह्मादिक, ध्यावत शंकर सेस । नाम लेत भौसागर छूटे, कट गये करम कलेस ॥ जेठ देवरके मोह त्यागके, पियसे बांधो लेस । कहैं कवीर मिलो पिया प्यारे, छूटे सकल अंदेश ॥

होरी २६—तू कैसे हूस रहीरी, नहि हूसन वारी ॥ टेक ॥ कबकी मैं ठाढी तोहि मनाऊं, तू नहि चितमें धारी । गगन मंडलमें धूम मची है उठ चल वेग संवारी ॥ ईगला पिगला हाथ छरी ले, सुषुमन केशर गारी । पांच पचीस भई एक ठौरी, गावे दे दे तारी ॥ जरद कसबका लैहंगा सोहै, और कसुंमल सारी । कहे कवीर ऐसी होरी खेलो, निरतत सुषुमन नारी ॥

होरी २७—खेलो खेलो सुहागिनि होरी ॥ टेक ॥ चरण सरोज पिया हित जौलों, रजकी केशर घोरी ॥ भरम अबीर उडाव सखीरी, लोक लाज कुल तोरी ॥ सोहम् नार जहाँ रंग राची, बीच सुषुमना डोरी ॥ पुरुष पंच गली एक जानो, एकहि संग ढंढोरी ॥ शब्द सजीवन रुयाल पीवका, गहि लीजे निज डोरी ॥ रंग अनंग सखी मत राचो, पियके पांव परोरी ॥ कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, भिटे जमके झगरोरी ॥

होरी २८—पियके रंग रंगी कोई, मेरो काह करेगो ॥ टेक ॥ पिया मेरे सजनी मैं पियकी, पियके पांव परोरी । पियकी सेज

(६९४)

कवीरपंथी—

सँवारत सजनी, सर्व सोहाग भरोरी ॥ कर सिगार मगन भई ठाठी, बिरहिन रूप खड़ी । साहब कवीर पिय पाये सजनी, सबको काज सरी ॥

होरी २९—कोई मोपै रंग न डारोरी, मैं तो भई हों बावरी ॥ टेक ॥ एक तो बौरी दूजी बिरहकी माती, तीजे नेह लगायोरी ॥ ज्ञान गुलाल अगर कस्तूरी, प्रेम प्रीति पिचकारोरी ॥ पांच सखी मिल होरी खेलैं, और सुहागिन नाररी ॥ अपने पिया संग होरी खेलो, यही वसंत यही फागरी ॥ कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, आवागमन निवाररी ॥

होरी ३०—अहो मन सा मदमाती खेलो रंग भरी ॥ टेक ॥ आस पास सब सखी विराजें, ता बिच आप खड़ी ॥ चंचल चपल चातुरी बोलैं, नैनन सैन करी ॥ इन्द्रहि जाय आप बस कीन्हे, ब्रह्मा चले पराई । तिनहुं जाय काम बस कीन्हा, सकुच रहे सिरनाई ॥ शंकर ध्यान छूटे ना कबहुं, बहु बिध कीन्ह उपाई । देखो रूप मोहनी केरे, पीछे काम जगाई ॥ सुर नर किन्नर जच्छ गुनीजन, कोई धरे नहिं थीर । साहब कवीर आप अविगत है, माया जीत शरीर ॥

होरी ३१—आज पियाके मिलनको मैं गेंद भई ॥ टेक ॥ घरसों निकस अँगन भई ठाठी, ले चौगानमें डार दई ॥ ज्ञानकी गेंद सुरतको डंडा, जित चाहो तित ढरक गई । पांच पचीस खेलैया ठाढे, घाट बाट फिर रोक लई ॥ सतगुरु ढोला दियो शब्दके, तैंतीसोंके बस न भई । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, निहाल भई जब हाथ लई ॥

होरी ३२—अहो सोई नार सयानी, प्रीतमके मन मानी ॥ टेक ॥ प्रीतम हमको पतिया पठाये, देखतही मुसकानी । पातीके बाँचत

शब्दावली

(६९५)

छाती जुड़ाई, रूपमें रूप समानी ॥ रंगमहलमें आय पुन वैठी, यही वस्तु निज जानी । गगन मंडलमें खेल रचो है, सोई देख ललचानी ॥ परमपुरुष अविगत अविनाशी, ताकी अकथ कहानी । कहैं कवीर सुनो भाई साधू, शब्दमें सुरति समानी ॥

होरी ३३-सतसुकृत खेलैं होरी; अभय नगर अस्थान ॥ टेक ॥ इतसों आये ज्ञान लाडले, उतसों आई मन बौरी । त्रिबेनी तट खेल रचो है, खेलत हो हो होरी ॥ इतसे पांच सखी उठ धाई, कोह स्यामल कोह गोरी । त्रिगुन पिचकारी हाथ लिखे सब, खेलत हो हो होरी ॥ इत सों क्षमा सखी उठ धाई, शील सुमति दोड जोरी । प्रेम पिचकारी रंग रोस सहित, झगरत खेलत होरी ॥ ताल मृदंग झांझ डफ बाजे, अनहद शब्द करोरी । सुषुमन नारी राग अलापत, गावत मंगल होरी ॥ सुरति निरति द्वै मता बनाये, चलो अगम संग होरी । मेरुदंडके छप्पे चढके, खेलत हो हो होरी ॥ मूल कमलते रंग बढो है, बंकनाल निज ठोरी । सुरतिनाल चढ बाहिर आये, खेलत हो हो होरी ॥ खेलत खेलत जहां गयी है, सतगुरु शब्द किये सोरी । साहब कवीर दयानिधि सागर, खेलत हो हो होरी ॥

होरी ३४-होरी खेलैं संत सुजान, आतम राम सों ॥ टेक ॥ घरि घरि पल पल छिन छिन खेलैं, निस दिन आठों जाम ॥ योगी खेलैं योग ध्यानमें, दुनियां भूत पखान ॥ पंडित खेलैं चार वेदसे, मुलना किताब कुरान ॥ पतिबरता खेलैं अपने पिया संग, वेश्या सकल जहान ॥ महा प्रचंड तेज मायाको, सब जग मारा बान ॥ कामी खेलैं कामिनिके संग, लोभी खेलैं दाम ॥ साहब कवीर खेले संतनसों, और न काहू काम ॥

होरी ३५-मेरी उमर आई होरी खेलनकी, पिया मोसे मिलके बिछुर गयेरी ॥ टेक ॥ पिय हमारे हम पियकी पियारी, पिय मोसे

(६९६)

कवीरपंथी-

अंतर कर गयेरी ॥ पिया मिलै तो जीऊं मोरी सजनी, पिय विन जियरा निकस गयेरी ॥ अबीर गुलाल लिये भर झोरी, पिय प्यारी संग रंग रहेरी ॥ धर्मदास बिरहिन पिय पाये, चरन कमल चित लाग रहेरी ॥

होरी ३६-प्रथम फाग वसंत पञ्चमी, सतगुरु मेहेर करोरी ॥ टेक ॥ अब पकडो छूटे नहिं कबहुँ, पियसों जाय मिलोरी ॥ प्रथम गुफामें बैठके सजनी, नाभी आड दईरी ॥ दूजे बंद कंठ ले छेदो, सूखी नाल भईरी ॥ करम भरमके बरुवा काटे, चेतन अगिन दईरी ॥ दियो जराय कुबुध कलेसको, उडके अकाश गईरी ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, केशर कीच भरोरी ॥ धीरज ध्यान प्रेम कुमकुमा, रंग सतसुधि न रहोरी ॥ आपहि खेल खेलारी साहब, आपहि ज्ञान गुनोरी ॥ दिना चार मायाको रूयालै, खेलत आप धनीरी ॥ इहँ उहँ बाहिर भीतर सबमें, जानै जान गुनीरी ॥ ज्ञान गुलाल लगावो सखीरी, सतगुरु संग चलोरी ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, एकहि फूल फुलोरी ॥

होरी ३७-या मन जालिम जोर रे, बरजो नहिं माने ॥ टेक ॥ निसि बासर सो चलत रहत है, सांझ गिनै नहिं भोररे ॥ कोटि जतन कर तनमें राखों, भागे सांकर तोररे ॥ सात द्वीप इकइस ब्रह्मांडलों, जहाँ लग याकी दोररे ॥ सुर नर मुनि औ पीर औलिया, काहू न पायो चोररे ॥ ब्रह्मा विष्णु महेसुर कहिये, एहि कटे चित चोररे ॥ कहैं कवीर जुगतसे राखो, गुरु चरननकी बोररे ॥

होरी ३८-ये फागुन दिन चारी, होरी खेल मनारे ॥ टेक ॥ दया धरमको केशर घोरी, प्रेम प्रीति पिचकारी । बाजत ताल श्रुदंग झांझ डफ, अनहद धुनि झनकारी ॥ उड़त गुलाल लाल भये बादर, बरसत रंग अपारी । बीच बीच मुरली धुनि बाजे,

शब्दावली

(६९७)

रोम रोम लगी तारी ॥ दस दरवाजे घेर मन पकरो, डुरमति खैंच उतारी । घूंघुटके पट खोल गये हैं, लोक लाज सब झारी ॥ होरी खेल उलट घर आवे, सो तिरिया पिय प्यारी । कहैं कवीर टरे नहिं टारी, परम पुरुषकी नारी ॥

होरी ३९-फागुन आयो दुख देन सखीरी, मेरो पिया घर नाही ॥ टेक ॥ अपने अपने भवनसो निकसे कामिन कंथ । मेरो पिया परदेस सखीरी, मोको कैसे बसंत ॥ चोवा चंदन अबीर अरगजा, का घसि लाँक अंग । सुध बुध मेरी गई सब सजनी, वाही पियाके संग ॥ तेरो पिया समीप सखीरी, तू तो हिलमिल खेल । नाहीं वर मेरोरी सजनी, गयो है ऊभी मेल ॥ एक संदेशा सुनरी सजनी, पिया घर आवैगे आज । दुबरी विरहिन भई बावरी, अजहुँ न आवे लाज ॥

होरी ४०-खेलो सइयां संग होरी, रंग भीनी पिया सों ॥ टेक ॥ निरगुन रूप लियो घट भीतर, मनसा हौदे भरोरी । चित चोवा बुध कैशर कहिये, भाव अरगजा घोरी ॥ शील संतोष ज्ञान उजियारो, पिचकारी भक्ति भरोरी । कहैं कवीर ऐसी होरी खेलो, जाते भाग जगोरी ॥

होरी ४१-फागुन मेरोरी मैं कैसे भरों दिन रैन ॥ टेक ॥ परकी फाग पिया संग खेली, अबीर गुलाल उड़ाय । आसोंकी फाग पिया घर नाही, खेलोंगी हमरी बलाय ॥ हमरे आंगन चंदनके बिरवा, जहैं चढ बोले काग । झूठे सगुन तुम्हार सखीरी, झूठे बनके काग ॥ उड़ उड़ काग सुलछना, जो पिय आवैगे आज । असी कोस मोरे पिया बसत हैं, सो कस आवैगे आज ॥ हमरे बालम फुलवारि लगाई, मृगा चुन चुन जाय । मारोंगी मृगा गुलेलसों, नयन कमान चढाय ॥ अपने बलमाको पतिया भेजों,