कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सठि हारेसौं । कालके करम जाल सब छुटैमिलि कवीर मत वारे सो ॥
होरी २०—खेलत फाग वसंत रैन दिन सहज सून्यमें होरी ॥ टेक ॥ सतगुरु दया साधुकी संगति त्रिकुटी महल रचोरी ॥ गुंजत भंवर कोकिला बोले सोहँ सोहँ सोरी ॥ बाजत ताल मृदंग झाँझि अगम निगमकी झोरी ॥ मानों कोटि भान ससि उगे जहां मनुवां विलगोरी ॥ सुरति सुहागिनि मन लिये मनुवां दिये सुमतिकी खोरी ॥ कहैं कवीर मगन भई विरहिनि ब्रह्मज्ञान झकझोरी ॥
होरी २१—हमारे को खेले ऐसी होरी, जामें आवागवन लागी डोरी ॥ श्रवण न सुनो नैन नहीं देखो, पिया पिय लागी लौरी । पंथ निहारत जनम सिरानो, प्रगट मिले नहीं चोरी ॥ जा कारन तुम गृह तज निकसे, लोक लाज कुल तोरी ॥ षट् दर्शन मिल स्वांग बनाये, लोगन लाग ठगोरी ॥ अंग भभूत गरे भृगछाला, कोइ लाये गुदर भर झोरी । चोवा चंदन अबीर अरगजा कपड़ा दे रंग रोरी ॥ जगन्नाथ बड़ी रामेश्वर, देश देशान्तर दौरी । अरसट तीरथ पृथी पैकरमा, पोहकर मैं लट बोरी ॥ वेद प्रमान भागवत गीता, चारों बरन टटोरी । कहैं कवीर सतगुरुके दया विन, भरम मिटे नहीं भौरी ॥
होरी २२—कैसी मजा कर डारी, ऐसे होरीके खिलारी ॥ भारी भ्रमकी सारी फारी, मानकी बेसर तोरी । लोभ मोहके कंकन फोरी, प्रेमके रंगमें बोरी ॥ ज्ञान गुलाल परो नैननमें, देखत नहीं जग सोरी । त्रिगुन बंद अंगिया टूटे, शब्द कुमकुमा मोरी ॥ नित्या नित्य देत है गारी, लाज सरम सब तारी । एकहि भाव बिलास करत है, कौन पुरुष को नारी ॥ पूरन प्रेमहि भूल गयो है, ऐसी न देख धमारी । साहेब कवीर परख रंगरंगिये, परखके कीन्हे न्यारी ॥